रांची: 2022 की गर्मियों की एक दोपहर, 11 साल की अनुष्का कुमारी स्कूल से लौटते वक्त एक खुले मैदान के पास रुक गईं. उनके गांव के कुछ लड़के फुटबॉल के साथ दौड़ रहे थे और हर बार कोई गेंद को जाल में मारता, तो खुश होकर चिल्ला उठते थे. वह उस ऊबड़-खाबड़ मैदान से पहले भी कई बार गुज़र चुकी थीं, जहां सख्त ज़मीन पर जगह-जगह पत्थर बिखरे हुए थे और उन्होंने लड़कों को वहां खेलते कई बार देखा था.
लेकिन उस दोपहर, वह आगे नहीं बढ़ीं.
अनुष्का ने कहा, “मैं बस वहीं खड़ी होकर उन्हें पूरी ताकत से खेलते हुए देखती रही और देखा कि वे कितने खुश थे. मैंने खुद से कहा, ‘मुझे यही चाहिए’.”
अगले दिन, वह फिर मैदान पर रुकीं—लड़कों को खेलते देखने के लिए नहीं, बल्कि उनके साथ खेलने के लिए. जल्द ही यह उनकी आदत बन गई और वह स्कूल से देर से घर आने लगीं.
तीन साल बाद, अब 14 साल की अनुष्का सिर्फ अपने गांव रुक्का मुंडा टोली ही नहीं, बल्कि पूरे झारखंड में एक स्टार बन चुकी हैं. राष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी पहचान तेज़ी से बढ़ रही है और उनके नाम के साथ एक निकनेम जुड़ता जा रहा है—“द गोल मशीन”.
सिर्फ सात अंतरराष्ट्रीय मैचों में 10 गोल के साथ, अनुष्का को भारत की सबसे अहम युवा स्ट्राइकरों में से एक माना जा रहा है. उनकी ताज़ा उपलब्धि अगस्त में भूटान में मिली, जहां उन्होंने 2025 सैफ अंडर-17 महिला चैंपियनशिप में आठ गोल के साथ टॉप स्कोरर के रूप में टूर्नामेंट खत्म किया. इसमें फाइनल में मेज़बान टीम के खिलाफ सिर्फ 19 मिनट में की गई हैट्रिक भी शामिल थी, जिसमें भारत ने 8-0 से जीत दर्ज कर लगातार तीसरी बार ट्रॉफी जीती.
26 दिसंबर को, उन्हें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
अनुष्का ने कहा, “मैंने फुटबॉल के लिए सब कुछ दे दिया. खेलने के लिए मैंने समाज से और यहां तक कि अपने परिवार से भी लड़ाई लड़ी. अब फुटबॉल मुझे पहचान और खुशी दे रहा है.” यह कहते हुए उन्होंने अपने बड़े भाई से फावड़ा लिया और पास में बने गड्ढे में रखे सीमेंट और पानी को मिलाने लगीं.
पांच लोगों का यह परिवार अपना नया घर बना रहा है, जहां वे अभी रहते हैं, उसके बगल में छोटी सी ज़मीन पर दो कमरों का मकान. अनुष्का की उपलब्धियों को देखते हुए राज्य सरकार डॉ. आंबेडकर आवास योजना के तहत कच्चा सामान यानी सीमेंट और ईंटें दे रही है. दो मजदूर भी लगाए गए हैं, लेकिन अनुष्का खुद भी काम में लगी हुई हैं और अपने भाई आशीष मुंडा (19) और मां रीता देवी (35) की मदद कर रही हैं. उनके पिता बीमार हैं और बिस्तर पर हैं, जबकि उनके छोटे भाई 11 साल के निखिल, जो चौथी क्लास में पढ़ते हैं, धीरे-धीरे अपनी बहन के आसपास की लोकप्रियता के साथ तालमेल बिठा रहे हैं.


अनुष्का का घर अब गांव में आकर्षण का केंद्र बन गया है. एक तरफ उनकी मां और भाई मजदूरों के साथ नए घर पर काम कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ रिश्तेदार और पड़ोसी इकट्ठा होकर अनुष्का को मीडिया को इंटरव्यू देते, पंचायत अध्यक्ष से मिलते और जिला अधिकारियों से बातचीत करते हुए देख रहे हैं.
हमें लगा था कि वह एक-दो दिन आएगी और फिर खुद ही रुक जाएगी, लेकिन उसने कभी नहीं छोड़ा
— सचिन, गांव के फुटबॉलर
वह लड़की, जिसने मैदान नहीं छोड़ा
दुनिया भर में ज्यादातर बच्चे लियोनेल मेसी या क्रिस्टियानो रोनाल्डो को अपना आदर्श मानते हुए बड़े होते हैं, लेकिन अनुष्का के फुटबॉल हीरो उनके अपने मोहल्ले के लड़के थे.
20 साल के सचिन ने कहा, “हमें लगा था कि वह एक-दो दिन आएगी और फिर खुद ही खेलना छोड़ देगी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और जब वह मैदान पर दिखना बंद हुई, तो हमने उसे राष्ट्रीय स्तर पर खेलते हुए देखा.”
सचिन उन लड़कों में से एक हैं, जिनके साथ अनुष्का मैदान में खेला करती थी.
वे पहले ही दिन से उनसे प्रभावित थे, जब 11 साल की अनुष्का नंगे पांव लगातार पूरी ताकत से गेंद मारने की कोशिश कर रही थीं—ठीक वैसे ही, जैसा उन्होंने उन्हें (लड़कों को) करते देखा था और उन्होंने गोल भी कर दिया था.
सचिन ने इंस्टाग्राम पर अनुष्का की रील्स दिखाते हुए कहा, “अब वह इस गांव और पूरे देश की हीरो है. पहले हम उसे मैदान में खेलते देखते थे. अब हम उसे स्क्रीन पर देखते हैं.”
हालांकि, उनके परिवार को उनकी स्कूल के बाद की इस ‘मुहिम’ के बारे में कुछ पता नहीं था, लेकिन जल्द ही यह बात फैल गई कि गांव की एक लड़की लड़कों के साथ शॉर्ट्स पहनकर फुटबॉल खेल रही है. जब यह खबर घर पहुंची, तो उनकी मां गुस्से में मैदान पर गईं और उन्हें खींचकर घर ले आईं. साथ ही सख्त चेतावनी दी कि वह फिर कभी लड़कों के साथ फुटबॉल खेलती हुईं न दिखे.
उनके भाई आशीष ने कहा, “हमारा सबसे बड़ा डर यह था कि अगर खेलते वक्त उसके हाथ या पैर में चोट लग गई, तो उससे शादी कौन करेगा?”
गांव वालों ने भी बातें शुरू कर दी थीं—‘लोग क्या कहेंगे?’
मैदान पर इस बागी लड़की को देखने के लिए भीड़ बढ़ने लगी और तानों की संख्या भी बढ़ती गई, लेकिन अनुष्का के लिए इन बातों का कोई मतलब नहीं था.
मैं मार, डांट और धमकियों के लिए हमेशा तैयार थी और मैंने कभी मैदान जाना नहीं छोड़ा
— अनुष्का कुमारी
इस दौरान वह कुछ ईंटें उठाकर जाती हुई अपनी मां की ओर देखती हैं.

फुटबॉल के लिए जगह बनाना
अनुष्का के पुराने घर के अंदर, एक कमरा रसोई का भी काम करता है, जबकि दूसरे कमरे में पूरा परिवार रहता है.
चार खानों वाली एक कोने की शेल्फ में कपड़े रखे हैं, जिनमें एक हिस्सा अनुष्का की उपलब्धियों के लिए रखा गया है—मेडल, ट्रॉफियां और सर्टिफिकेट.
एक लोहे का बक्सा, जिसमें पहले नए कपड़े और कीमती सामान रखा जाता था, अब उनकी जर्सी, ट्रैकसूट और फुटबॉल के जूते रखने के काम आता है, जिन्हें धूल से बचाने के लिए करीने से सजाया गया है.
अनुष्का हंसते हुए कहती हैं, “मेरी मां, जो कभी चप्पल लेकर मुझे मारने के लिए मेरे पीछे दौड़ती थीं, अब मेरे फुटबॉल के जूते बड़े ध्यान से सजाती हैं.”
वे याद करती हैं कि कैसे उनके परिवार ने उन्हें फुटबॉल खेलने से रोकने की हर कोशिश की थी.
देवी ने माना कि वह अपनी बेटी के लिए बस एक ही चीज़ चाहती थीं—वह पढ़ाई करे और एक अच्छी नौकरी पाए.
मां ने कहा, “हमने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वह घर आकर फुटबॉल खेलने के लिए हमसे लड़ने लगेगी.”
मेरी मां, जो कभी चप्पल लेकर मुझे मारने के लिए मेरे पीछे दौड़ती थी, अब मेरे फुटबॉल के जूते सलीके से रखती है
— अनुष्का कुमारी

अनुष्का ने स्टील के बक्से के पास रखे जूतों के रैक में अपने हाथ घुमाए—नारंगी, हरे, नीले और काले रंग के जूतों के बीच.
नंगे पांव खेलने के शुरुआती दिनों को याद कर उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई, या फिर सीनियर्स से जूते उधार लेने की याद. अब वह अपने जूते टीम की दूसरी खिलाड़ियों को देती हैं.
अनुष्का ने कहा, “जब मैंने सब-जूनियर नेशनल फुटबॉल चैंपियनशिप जीती, तब मेरी मां ने मेरे लिए पहले नारंगी जूते खरीदे थे. उन्होंने मजदूरी करके जो पैसे बचाए थे, उसी से खरीदे थे.”
उन्होंने बताया कि भूटान चैंपियनशिप के बाद उन्हें कई तोहफे मिले हैं, जिनमें जूते, जर्सी और जिला मजिस्ट्रेट के कार्यालय से एक इलेक्ट्रिक साइकिल भी शामिल है.
और ठीक उसके परिवार की तरह, गांव भी धीरे-धीरे बदल गया.
16 साल की रीमा मुंडा ने, जो अपने घर के बाहर हैंडपंप पर बर्तन धो रही थीं, उन्होंने कहा, “अब माता-पिता चाहते हैं कि उनकी बेटियां अनुष्का जैसी बनें.”

अब माता-पिता चाहते हैं कि उनकी बेटियां अनुष्का जैसी बनें
— रीमा मुंडा, गांव की निवासी
सिर्फ पड़ोसी, रिश्तेदार और अनुष्का का परिवार ही यह नहीं देख रहा था कि वह फुटबॉल छोड़ने को तैयार नहीं है. गांव के बाहर किसी ने इसमें कुछ और देखा—हिम्मत और प्रतिभा.
जब सोनी कुमारी की पहली बार अनुष्का से मुलाकात हुई, तो उन्होंने सबसे पहले उनके माता-पिता को मनाने की कोशिश नहीं की. इसके बजाय, उन्होंने उस किशोरी से कहा कि उसका खेल ही सब कुछ बोले.
हजारीबाग में स्थित रेजिडेंशियल गर्ल्स फुटबॉल सेंटर की कोच सोनी ने कहा, “मैंने उससे कहा कि घर में लड़ाई मत करो, बस खेलो और जीतो.”
रुक्का से करीब 80 किलोमीटर दूर इस इलाके में न तो कोई प्रैक्टिस ग्राउंड था और न ही कभी किसी लड़की ने लड़कों के साथ फुटबॉल खेला था.
उसी साल, अनुष्का ने अपने स्कूल के स्पोर्ट्स डे में हिस्सा लिया और कई रेस में मेडल जीतकर लौटीं. उनकी स्कूल टीम ने फुटबॉल मैच भी जीता.
इन नतीजों से घर में बातचीत आसान हो गई. सोनी के मार्गदर्शन में, अनुष्का ने अपना पहला औपचारिक कदम उठाया—फुटबॉल ट्रेनिंग सेंटर में दाखिला लिया.
12 साल की उम्र में वह हजारीबाग के सेंटर में शामिल हुई. वे हॉस्टल में रहती थीं, स्कूल जाती थीं और रोज़ ट्रेनिंग करती थीं.
अनुष्का ने कहा, “सेंटर में जाने के बाद मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. मैंने झारखंड के लिए सब-जूनियर नेशनल फुटबॉल चैंपियनशिप खेला. वहां स्काउट्स आए थे. मैंने अच्छा परफॉर्म किया और वहीं से मेरा सिलेक्शन नेशनल कैंप के लिए हो गया.”
मैंने उससे कहा कि घर में लड़ाई मत करो, बस खेलो और जीतो
— सोनी कुमारी, कोच
सोनी ने शुरू में ही समझ लिया था कि अनुष्का प्रेशर संभाल सकती है.
30 साल की सोनी ने कहा, “फुटबॉल में नाम बनाने की उसकी ज़िद्द और परिवार व समाज के दबाव से लड़ने की उसकी हिम्मत ने उसे अलग बनाया और उसे पहचान दिलाई.”
‘अनुष्का जैसा बनना चाहती हूं’
दो साल की ट्रेनिंग के बाद, 2024 में नेपाल में हुए साउथ एशियन फुटबॉल फेडरेशन (SAFF) अंडर-16 महिला चैंपियनशिप में अनुष्का ने भारत की ब्लू जर्सी पहनी. 13 साल की उम्र में उन्होंने हर मैच में गोल किया और पांच गोल के साथ संयुक्त रूप से टॉप स्कोरर रहीं.
उन्होंने कहा, “भारत के लिए खेलना किसी भी खिलाड़ी का सबसे बड़ा सपना होता है. ट्रायल में सैकड़ों खिलाड़ी आते हैं और कुछ ही चुने जाते हैं. टीम का हिस्सा बनना और इस तरह जीतना, सपना पूरा होने जैसा है.”
अनुष्का ने शुरुआत अटैकिंग मिडफील्डर के तौर पर की थी, जहां उनकी रफ्तार और पास में गेंद पर कंट्रोल साफ दिखता था. जैसे-जैसे वह राज्य और राष्ट्रीय आयु वर्ग की टीमों में आगे बढ़ीं, कोचों ने उन्हें गोल के और करीब खिलाना शुरू किया. स्ट्राइकर के तौर पर अनुष्का हमले का मुख्य केंद्र बन गईं—डिफेंडरों पर दबाव बनाना, बैकलाइन के पीछे दौड़ लगाना और मौके को भरोसे के साथ गोल में बदलना.
उनकी कोच सोनी ने कहा, “भले ही वह टीम में सबसे छोटी उम्र की और सबसे कम कद की हैं, लेकिन उनकी ताकत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. जिस तरह वह गेंद पर शॉट मारती हैं, उससे गोल निकलता है.”

मैचों से दूर, हजारीबाग सेंटर पर भी उनका फोकस बना रहता है. ट्रेनिंग सेशन के बाद जूनियर खिलाड़ी और कभी-कभी सीनियर भी, उनसे मिलने आते हैं. कोई बधाई देता है, तो कोई खेल की रणनीति पर बात करता है.
उनकी अंडर-17 टीम की साथी सुचिता ने कहा, “अब बहुत सी लड़कियां अनुष्का जैसी बनना चाहती हैं. हम भी वही करना चाहते हैं जो उसने किया है—अपने माता-पिता और देश को गर्व महसूस कराना.”
जहां अनुष्का को ट्रेनिंग के लिए अपना गांव छोड़ना पड़ा, वहीं उनसे प्रेरित होकर उनके रास्ते पर चलने वाली दूसरी लड़कियों को ऐसा नहीं करना पड़ेगा. जल्द ही रुक्का गांव में एक ट्रेनिंग स्पोर्ट्स ग्राउंड बनाया जाएगा.
ओरमांझी के जोनल अधिकारी उज्ज्वल सोरेन ने कहा, “हमारे बीच कई अनुष्काएं हैं, जिनकी प्रतिभा बुनियादी ढांचे की कमी के कारण बाहर नहीं आ पाती. अनुष्का ने कई लड़कियों और युवा खिलाड़ियों को प्रेरित किया है और यह ट्रेनिंग ग्राउंड उन्हें आगे बढ़ने में मदद करेगा.”

जब उनसे पसंदीदा फुटबॉल खिलाड़ियों के बारे में पूछा गया, तो अनुष्का ने किसी वैश्विक स्टार का नाम नहीं लिया. वह लेन लेस्टन को फॉलो करती हैं, जो अमेरिकी कॉलेज सॉकर और यूथ क्लबों में अपने प्रदर्शन के लिए जाने जाते हैं. अनुष्का को मैदान पर उनकी मूवमेंट और लीडरशिप देखना पसंद है.
उन्होंने कहा, “वह बहुत मशहूर नहीं हैं, लेकिन मुझे उन्हें खेलते देखना अच्छा लगता है. एक दिन वह मशहूर होंगे और मैं सबको बताऊंगी कि मैं उन्हें शुरुआत से फॉलो कर रही थी.”
अनुष्का का अगला गोल सीनियर नेशनल टीम में जगह बनाना है. वहां पहुंचने पर वह कौन सा जर्सी नंबर पहनेंगी, यह भी वह जानती हैं.
उन्होंने कहा, “मेरा सपना है कि मैं नंबर सात वाली नीली जर्सी पहनूं, गोल करूं और हर मैदान पर भारत को जिताऊं.”
दरअसल, यह नंबर क्रिकेटर एमएस धोनी और फुटबॉलरों क्रिस्टियानो रोनाल्डो, डेविड बेकहम और जॉर्ज बेस्ट ने पहना है.
अपने पुराने घर के पास बन रहे नए कमरों की ओर इशारा करते हुए, अनुष्का ने एक और प्लान के बारे में बताया.

उन्होंने कहा, “एक दीवार पर मेरी सारी उपलब्धियां और पहचान होंगी—मेरी ड्रीम वॉल. मेरे सारे मेडल और सर्टिफिकेट वहीं होंगे. मुझे यह समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी कि मैंने कहां से शुरुआत की थी.”
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