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Wednesday, 14 January, 2026
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वेनेजुएला में अमेरिका का दखल सिर्फ ड्रग्स या तेल के लिए नहीं, बल्कि MAGA की चिंता से जुड़ा है

भारतीयों के लिए H1-B वीज़ा का MAGA द्वारा विरोध अब काफी जाना-पहचाना है, लेकिन हिस्पैनिक इमिग्रेशन के मुकाबले भारत का मुद्दा बहुत छोटा लगता है.

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वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को कराकास के एक हाई-सिक्योरिटी कैंपससे अमेरिका द्वारा पकड़ने, उन्हें हिरासत में लेकर न्यूयॉर्क ले जाने और ड्रग तस्करी के आरोपों में अमेरिका में पेश करने का बड़ा मतलब क्या है? यह नए साल की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय खबर है, हालांकि, जल्द ही ईरान से जुड़ी घटनाएं इसे पीछे छोड़ सकती हैं. इसके लिए हमें इंतज़ार करना होगा.

मादुरो की गिरफ्तारी का असर अमेरिका की घरेलू राजनीति पर भी है और वैश्विक व्यवस्था पर भी. इनमें से घरेलू असर ज्यादा अहम साबित हो सकता है, लेकिन पहले वेनेजुएला से जुड़े कुछ अहम तथ्यों को समझते हैं.

वेनेजुएला की नई सत्ता और यह बांग्लादेश जैसा क्यों नहीं है

1958 से 1998 के बीच, वेनेजुएला लैटिन अमेरिका के 20 देशों में से सिर्फ तीन स्थिर लोकतंत्रों में शामिल था. बाकी दो देश कोस्टा रिका और कोलंबिया थे. 1999 में, पूर्व सैन्य अधिकारी ह्यूगो चावेज़ के राष्ट्रपति बनने के साथ ही वेनेजुएला में लोकतंत्र कमज़ोर होना शुरू हुआ और वक्त के साथ हालात और बिगड़ते गए.

नागरिकों और मीडिया की आज़ादी पर सख्त पाबंदियां लगाई गईं और चुनाव व चुनावी कानूनों में हेरफेर कर सत्ता में बैठे लोगों को बनाए रखा गया. 2013 में, चावेज़ की कैंसर से मौत के बाद, मादुरो — जो पहले बस ड्राइवर और बाद में ट्रेड यूनियन नेता थे राष्ट्रपति बन गए. 2024 में मादुरो तीसरी बार ‘चुने’ गए, हालांकि, स्वतंत्र पर्यवेक्षकों को इसमें कोई शक नहीं था कि असली और वैध विजेता उनका विरोधी था.

3 जनवरी 2026 की तड़के, अमेरिकी सेना ने मादुरो और उनकी पत्नी को पकड़ लिया, लेकिन अमेरिका ने 2024 के चुनाव के विजेता को सत्ता में नहीं बैठाया. इसके बजाय, मादुरो की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज़ को कार्यवाहक राष्ट्रपति बना दिया गया और पूरा सिस्टम लगभग वैसा ही रहने दिया गया. इसलिए यह बांग्लादेश जैसा सत्ता परिवर्तन नहीं था.

राष्ट्रपति ट्रंप और खास तौर पर विदेश मंत्री मार्को रुबियो मादुरो को हटाने के पीछे लगे हुए थे और इस सैन्य लक्ष्य में वे पूरी तरह सफल रहे, भले ही इसके बाद क्या होगा, इसकी परवाह न की गई हो. आमतौर पर शासकों को हटाना ज्यादा मुश्किल नहीं होता, लेकिन संस्थानों को दोबारा खड़ा करना और अराजकता से बचना बेहद कठिन होता है.

अब हम इन घटनाओं के अमेरिका के घरेलू महत्व की ओर बढ़ते हैं.

MAGA की मूल चिंताएं

सबसे अहम मुद्दा मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (MAGA) आंदोलन की गहरी हिस्पैनिक या लैटिनो चिंता है और MAGA की बातचीत में इसे ट्रंप के वेनेजुएला कदमों से जोड़ा जा रहा है. जैसा कि सब जानते हैं, MAGA आंदोलन ट्रंप की ताकत का मुख्य आधार है.

भारत और भारतीय-अमेरिकी हलकों में, भारतीयों के लिए H1-B वीज़ा का MAGA द्वारा विरोध काफी जाना-पहचाना है, लेकिन हिस्पैनिक इमिग्रेशन के मुकाबले भारत का मुद्दा बहुत छोटा है. भारतीयों के विपरीत, हिस्पैनिक लोग आम तौर पर श्रम बल के निचले स्तर पर होते हैं, लेकिन उनकी जनसंख्या और राजनीतिक अहमियत बहुत बड़ी है. भारतीय-अमेरिकियों की संख्या ज्यादा से ज्यादा 50 लाख है, जबकि हिस्पैनिक करीब 6.8 करोड़ हैं.

आज अमेरिका की आबादी का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा हिस्पैनिक है. यानी हर पांचवां अमेरिकी हिस्पैनिक है. हिस्पैनिक या लैटिनो अब अमेरिका का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय हैं, जिन्होंने अफ्रीकी-अमेरिकियों को भी पीछे छोड़ दिया है. 1965 के बाद हुए इमिग्रेशन सुधारों का सबसे ज्यादा फायदा इन्हीं को मिला है. टेक्सास, न्यू मैक्सिको, एरिज़ोना और कैलिफोर्निया में हिस्पैनिक आबादी 30–35 प्रतिशत से ज्यादा है. फ्लोरिडा, न्यूयॉर्क और इलिनॉय जैसे कुछ अन्य बड़े राज्यों में यह हिस्सेदारी 20 प्रतिशत या उसके आसपास है.

हिस्पैनिक लोग अमेरिकी सांस्कृतिक मुख्यधारा में भी साफ तौर पर जगह बना चुके हैं और कुछ कलाकार अब बड़े अमेरिकी सांस्कृतिक चेहरे बन गए हैं. हॉलीवुड फिल्मों में Stand and Deliver (1988) और Selena (1997) — दोनों ही हिस्पैनिक निर्देशकों द्वारा बनाई गईं — हिस्पैनिक जीवन पर केंद्रित थीं. वहीं No Country for Old Men (2007), जिसने कई ऑस्कर जीते, सीमा क्षेत्रों के संघर्ष पर गहराई से गई, लेकिन MAGA के लिए हिस्पैनिक लोगों का कला में योगदान मायने नहीं रखता.

MAGA के लिए ज्यादा चिंता की बात उनकी बढ़ती आबादी है, जो कई राज्यों में श्वेत बहुमत को खतरे में डाल रही है, या पहले ही डाल चुकी है. उतना ही अहम यह भी है कि MAGA ने लगातार हिस्पैनिक लोगों को अपराध की दुनिया से, खासकर ड्रग्स और नशीले पदार्थों की तस्करी से जोड़कर दिखाया है. और यही आरोप मादुरो को अमेरिका की अदालतों तक ले आया है. दखल देने की अपनी दलील में ट्रंप ने वेनेजुएला के बहुत कम इस्तेमाल हो रहे तेल भंडारों पर भी जोर दिया है, लेकिन हिस्पैनिक लोगों से जुड़े सांस्कृतिक और इमिग्रेशन मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

जब तक यह गिरफ्तारी अमेरिका द्वारा वेनेजुएला को ‘चलाने’ के लिए ज़मीन पर सैनिक उतारने तक नहीं पहुंचती, MAGA को जो हुआ उससे ज्यादा दिक्कत नहीं होगी. लेकिन अगर यह शुरुआती कदम, जिसे अपराध-विरोधी और हिस्पैनिक-विरोधी भी माना जा सकता है, लंबे समय तक अमेरिकी सैन्य मौजूदगी में बदल जाता है, तो वॉशिंगटन के वेनेजुएला अभियान के लिए MAGA का समर्थन जारी रहना मुश्किल है. MAGA का फोकस ज्यादा अंदरूनी मुद्दों पर है. तेल से होने वाले संभावित मुनाफे उसके लिए ज्यादा मायने नहीं रखते.

क्या इससे विश्व व्यवस्था टूट जाती है?

अब हम कुछ हलकों में उठे एक अहम अंतरराष्ट्रीय सवाल पर आते हैं. चाहे मादुरो कितने भी तानाशाह रहे हों, क्या उन्हें किसी बाहरी ताकत द्वारा सीधे हटाया और गिरफ्तार किया जा सकता है? क्या वेनेजुएला में किया गया दखल अंतरराष्ट्रीय कानून और विश्व व्यवस्था को गंभीर रूप से कमजोर करता है?

इस सवाल का जवाब अमेरिका और लैटिन अमेरिका के ऐतिहासिक रिश्तों को देखे बिना नहीं दिया जा सकता. मुनरो डॉक्ट्रिन (1823) से शुरू करते हुए, अमेरिका ने कई बार खुले तौर पर और अकेले ही लैटिन अमेरिकी राजनीति में दखल दिया है. 1945 तक, अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों पर आधारित कोई विश्व व्यवस्था नहीं थी. उस समय अंतरराष्ट्रीय राजनीति तथाकथित “प्रभाव क्षेत्रों” पर टिकी थी. कई देशों पर कब्जा किया गया और साम्राज्यवादी सोच के तहत उन्हें चलाया गया.

लेकिन 1945 के बाद, यानी गठबंधनों पर आधारित दौर में भी जो अब 80 साल से चल रहा है, अमेरिका ने लैटिन अमेरिका में ऐसे राष्ट्रपतियों को हटाया जो उसे पसंद नहीं थे. इसमें चिली के मार्क्सवादी राष्ट्रपति साल्वाडोर अलेंदे (1973) से लेकर पनामा के मैनुअल नोरिएगा (1989) तक शामिल हैं. दरअसल, मादुरो की तरह नोरिएगा को भी ड्रग तस्करी के आरोपों में गिरफ्तार कर अमेरिका लाया गया था, जहां उस पर मुकदमा चला और उसे दोषी ठहराया गया.

इसलिए 3 जनवरी को वेनेजुएला में जो हुआ, उसके उदाहरण सिर्फ 1945 से पहले ही नहीं, बल्कि उसके बाद भी मिलते हैं. इससे यह दखल सही नहीं ठहरता, लेकिन यह भी नहीं कहा जा सकता कि इससे विश्व व्यवस्था पूरी तरह टूट जाती है.

असल में, यूरोप में NATO का खत्म होना या एशिया में चीन द्वारा ताइवान पर कब्ज़ा, वेनेजुएला नहीं, 1945 के बाद बनी विश्व व्यवस्था की बुनियाद को घातक चोट पहुंचाएंगे. क्या ट्रंप के तहत अमेरिकी विदेश नीति उस दिशा में जा रही है? उनके राष्ट्रपति कार्यकाल के बाकी साल बेहद अहम हैं. दुनिया जल्द ही अपने भविष्य की दिशा के बारे में बहुत कुछ जान जाएगी.

(आशुतोष वार्ष्णेय इंटरनेशनल स्टडीज़ और सोशल साइंसेज़ के सोल गोल्डमैन प्रोफेसर और ब्राउन यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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