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Wednesday, 14 January, 2026
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नड्डा के बाद नितिन नबीन ही क्यों? PM मोदी के फैसले के पीछे कई दलीलें, मगर असली कारण एक

धर्मेंद्र प्रधान से लेकर भूपेंद्र यादव और शिवराज सिंह चौहान तक, जब पार्टी के टॉप पद के लिए किसी ऑर्गनाइज़ेशनल व्यक्ति को चुनने की बात आई, तो पीएम नरेंद्र मोदी के पास कई विकल्प थे.

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‘मोदी है तो मुमकिन है’ काफी समय से भारतीय जनता पार्टी का नारा रहा है. 14 दिसंबर को बिहार के मंत्री नितिन नबीन इस नारे का एक तरह से चेहरा बन गए. राजनीति में मुश्किल से 20 साल पूरे करने वाले 45 वर्षीय नितिन नबीन 45 साल पुरानी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने जा रहे हैं.

घोषणा का दिन एनर्जी कंजर्वेशन डे था. मेरे जैसे पत्रकार के लिए यह एक और संकेत था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अगले कदमों को लेकर अटकलों में ऊर्जा बर्बाद मत कीजिए. हमें हैरानी होने की आदत पड़ चुकी है. क्योंकि हमें लगभग हर बार पीएम मोदी से हैरान होना सीखना पड़ चुका है. इससे एक अहम सवाल उठता है. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की पात्रता क्या है. नितिन नबीन को बीजेपी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है और अगले महीने जेपी नड्डा के उत्तराधिकारी के रूप में औपचारिक रूप से ताज पहनाए जाने की संभावना है.

बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए पात्रता

पार्टी नेता नितिन नबीन के चयन को सही ठहराते हुए कहते हैं कि अध्यक्ष को युवा और ‘संगठन का आदमी’ होना चाहिए. बिल्कुल.

पार्टी भारतीय जनसंघ के दौर से ही युवा नेताओं को आगे बढ़ाती रही है. श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1951 में 50 साल की उम्र में जनसंघ के पहले अध्यक्ष बने. अटल बिहारी वाजपेयी 44 साल के थे और एलके आडवाणी 46 साल के, जब वे जनसंघ अध्यक्ष बने. नितिन गडकरी 52 साल की उम्र में बीजेपी के सबसे युवा अध्यक्ष बने. बाद में अमित शाह ने 49 साल की उम्र में यह रिकॉर्ड तोड़ा. अब नितिन नबीन शाह का रिकॉर्ड तोड़ने जा रहे हैं. वाजपेयी-आडवाणी से लेकर मोदी-शाह दौर तक पार्टी ने संगठन और सरकार, दोनों स्तरों पर युवा नेताओं को आगे बढ़ाया है. इस मानव संसाधन नीति का पार्टी को काफी फायदा मिला है.

नितिन नबीन निस्संदेह ‘संगठन के आदमी’ हैं. भारतीय जनता युवा मोर्चा में उन्होंने कई पद संभाले. इसके बाद 2019 में उन्हें सिक्किम विधानसभा चुनाव का प्रभारी बनाया गया. उस चुनाव में बीजेपी को शून्य सीटें मिलीं और वोट शेयर 1.62 प्रतिशत रहा.

2021 में बीजेपी ने डी पुरंदेश्वरी और नितिन नबीन को छत्तीसगढ़ का प्रभारी और सह-प्रभारी बनाया. सितंबर 2022 में पुरंदेश्वरी की जगह वरिष्ठ नेता ओम प्रकाश माथुर को लाया गया. नवंबर 2023 के विधानसभा चुनाव से चार महीने पहले माथुर को चुनाव प्रभारी बनाया गया और मनसुख मांडविया को सह-प्रभारी. 3 दिसंबर को नतीजे आए, जब बीजेपी ने सभी अनुमानों को गलत साबित करते हुए कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया. इसके बाद माथुर को जीत का शिल्पकार बताया गया.

“असंभव कहते थे सब, कर दिया,” माथुर ने उस दिन एक्स पर लिखा.

नितिन नबीन की छत्तीसगढ़ जीत में भूमिका पर काफी चर्चा हो रही है, खासकर उनके राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद. संभव है माथुर मुस्कुरा रहे हों. 2024 के लोकसभा चुनाव में नितिन नबीन चुनाव प्रभारी थे, जब बीजेपी ने छत्तीसगढ़ की 11 में से 10 सीटें जीतीं. यह बड़ी उपलब्धि थी, क्योंकि उन्हें मतदान के पहले चरण से सिर्फ तीन हफ्ते पहले प्रभारी बनाया गया था.

युवा संगठनात्मक नेताओं का दुर्भाग्यपूर्ण समूह

पार्टी के शीर्ष पद के लिए संगठनात्मक व्यक्ति चुनने में पीएम मोदी के पास विकल्पों की कमी नहीं थी. 66 साल के शिवराज सिंह चौहान या 68 साल के नितिन गडकरी जैसे नेताओं की बात छोड़ ही दीजिए.

56 वर्षीय केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को ही देख लीजिए. वह बिहार के चुनाव प्रभारी थे, जहां एनडीए ने अब तक का बेस्ट प्रदर्शन किया. इससे पहले हरियाणा में उन्होंने बीजेपी के लिए असंभव दिखने वाली जीत हासिल करवाई. 2022 में वह उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के प्रभारी थे. राज्यों की सूची लंबी है, जहां उन्होंने कुशल संगठनकर्ता के रूप में अपनी छाप छोड़ी. ओडिशा विधानसभा चुनाव में उन्होंने पार्टी को पहली बार जीत दिलाई, लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया.

भूपेंद्र यादव, 56 वर्ष, भी कई राज्यों में चुनाव प्रभारी के रूप में सफल रहे हैं. हाल ही में महाराष्ट्र में 2024 विधानसभा चुनाव में बीजेपी की अप्रत्याशित जीत उनके खाते में गई. अब उन्हें पश्चिम बंगाल का चुनाव प्रभारी बनाया गया है.

पार्टी सूत्रों के मुताबिक चौहान, गडकरी, प्रधान और यादव सभी शुरुआती सूची में थे. आरएसएस को इन नामों पर कोई आपत्ति नहीं थी. लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने 45 से 55 साल के नेताओं की नई सूची तैयार करने का फैसला किया. कई नेता इस उम्र की शर्त को लेकर उत्सुक हैं. 35-45 या 40-50 क्यों नहीं.

नई सूची में कौन-कौन था, यह मुझे नहीं पता. आरएसएस ने, जैसा बताया गया है, फैसला मोदी-शाह पर छोड़ दिया. आखिर कितने दिन तक रस्साकशी चलती.

संगठनात्मक काम को अगर मानदंड माना जाए, तो कुछ और नाम भी देखे जा सकते हैं. बिप्लब देब को लीजिए. वह पश्चिम बंगाल के सह-प्रभारी हैं. इससे पहले हरियाणा में संगठन प्रभारी और सह-चुनाव प्रभारी थे. हरियाणा के नतीजे सबको पता हैं. इससे पहले त्रिपुरा में बीजेपी अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने 2018 में वामपंथ को सत्ता से बाहर किया. यह पहली बार था जब बीजेपी ने त्रिपुरा में जीत दर्ज की. देब मुख्यमंत्री बने, लेकिन 2023 चुनाव से पहले उन्हें हटा दिया गया.

जब नितिन नबीन युवा मोर्चा में थे, तब उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और पूनम महाजन थे. 51 वर्षीय अनुराग ठाकुर, जो पांच बार सांसद रह चुके हैं, संभावित उम्मीदवार हो सकते थे. वह मोदी-शाह के समर्थक और आक्रामक नेता माने जाते हैं. वह केंद्रीय मंत्री बने, लेकिन बाद में हाशिये पर चले गए. संभव है उन्हें नड्डा के लिए जगह छोड़नी पड़ी हो. क्या नड्डा संगठन में ठाकुर के लिए जगह छोड़ सकते थे. आदर्श दुनिया में क्यों नहीं. लेकिन राजनीति आदर्श नहीं होती.

पूनम महाजन, जो प्रमोद महाजन की बेटी हैं और नितिन नबीन से करीब छह महीने छोटी हैं, 2024 चुनाव में टिकट से वंचित रहीं. उनकी जगह उज्ज्वल निकम को उतारा गया, जो चुनाव हार गए. बाद में निकम को राज्यसभा भेज दिया गया और महाजन को हाशिये पर छोड़ दिया गया.

महाजन सोच रही होंगी कि उनसे क्या चूक हुई. उनके बाद युवा मोर्चा अध्यक्ष बने तेजस्वी सूर्या, जो 35 साल के हैं. वह शायद चाहते होंगे कि अध्यक्ष के लिए उम्र सीमा 35-45 कर दी जाए. आखिर 45 साल के पक्ष में दिए गए तर्क 35 साल पर भी लागू होते हैं. मैंने इन संगठनात्मक नेताओं के उदाहरण यह समझने के लिए चुने कि बीजेपी अध्यक्ष बनने की असली कसौटी क्या है. मुझे अब भी पूरी तरह समझ नहीं आया.

RSS और ABVP से जुड़ाव

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए एक समय तक यह बड़ी पात्रता मानी जाती थी कि उम्मीदवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस की शाखाओं में वैचारिक प्रशिक्षण लिया हो. बीजेपी में नितिन नबीन के आरएसएस या उसकी छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी से जुड़ाव को लेकर चर्चाएं हैं. इसकी वजह यह है कि बीजेपी की वेबसाइट पर नितिन नबीन की “यात्रा” या बायोडाटा में आरएसएस या एबीवीपी का जिक्र नहीं है, जबकि अन्य बीजेपी अध्यक्षों के मामले में ऐसा होता रहा है. नितिन नबीन की शैक्षणिक योग्यता इंटरमीडिएट है, इसलिए यह साफ नहीं है कि उन्होंने एबीवीपी में कब और किस भूमिका में काम किया. हालांकि यह संभव है कि उन्होंने कैंपस के बाहर संगठन के लिए काम किया हो.

इन चर्चाओं के मुताबिक पार्टी की वेबसाइट पर नितिन नबीन का आरएसएस से जुड़ाव दर्ज होना चाहिए था. लेकिन क्या यह वाकई मायने रखता है. उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा भारतीय जनसंघ में थे. संभव है कि वे अपने बेटे को आरएसएस की शाखाओं में ले जाते हों, जैसा कि संघ के स्वयंसेवक करते हैं. यह सिर्फ समय की बात है कि कई लोग आगे आकर एबीवीपी और आरएसएस शाखाओं में नितिन नबीन के साथ बिताए दिनों की बातें साझा करेंगे. तब ये चर्चाएं खत्म हो जाएंगी. वैसे भी, जनसंघ के पहले अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी आरएसएस से नहीं, बल्कि हिंदू महासभा से जुड़े थे.

नितिन नबीन के पिता चार बार विधायक रहे, जिससे नितिन नबीन पहले ऐसे राजनीतिक वंशज बनते हैं जो बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनेंगे. हालांकि अब बीजेपी में यह कोई बड़ी बात नहीं रह गई है.

बीजेपी नेता नितिन नबीन के चयन को समझाते हुए उनकी ‘न्यूट्रल जाति’ कायस्थ का भी जिक्र कर रहे हैं. कायस्थ एक संख्यात्मक रूप से छोटी उच्च जाति है, जिससे किसी दूसरे समूह में नाराजगी नहीं पैदा होती. बांगारू लक्ष्मण, जो दलित थे, बीजेपी के एकमात्र गैर-उच्च जाति के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं. सवाल यह है कि नितिन नबीन का कायस्थ होना उच्च जातियों को खुश करने के लिए है या गैर-उच्च जातियों को नाराज न करने के लिए. क्योंकि बीजेपी को उच्च जातियों को खुश करने की जरूरत नहीं है. विपक्षी दलों के तेज होते सामाजिक न्याय के नारों के बीच उनके पास जाने के लिए और कोई जगह नहीं है. अगर मकसद गैर-उच्च जातियों को नाराज न करना था, तो फिर किसी गैर-उच्च जाति नेता को ही क्यों नहीं चुना गया. उदाहरण के लिए शिवराज सिंह चौहान, जो उच्च जातियों को भी नाराज नहीं करते. चौहान एक गैर-प्रभावशाली या कहें ‘न्यूट्रल’ किरार समुदाय से आते हैं, जो ओबीसी है.

नितिन नबीन के चयन के पीछे

नितिन नबीन का चयन यह दिखाता है कि मोदी-शाह ने संघ प्रमुख मोहन भागवत की उस बात को अक्षरशः लिया है कि आरएसएस शाखाएं चलाना जानता है और सरकार व पार्टी अपने-अपने काम खुद जानती हैं. कोई एक-दूसरे को यह नहीं बता सकता कि उसे अपना काम कैसे करना है. 2024 लोकसभा चुनाव से पहले जेपी नड्डा ने कहा था कि बीजेपी अब अपने काम खुद संभालने में सक्षम है. मतलब कि उसे इसके लिए आरएसएस की जरूरत नहीं है. नितिन नबीन की नियुक्ति इस के पीछे की मंशा को दिखती है.

नितिन नबीन अमित शाह के करीबी माने जाते हैं. जब केंद्रीय गृह मंत्री अक्टूबर में छठ के दौरान उनके पटना स्थित आवास पर गए थे, तब किसी ने इसके संकेत नहीं समझे. बिहार के बाहर बीजेपी में शाह के अलावा बहुत ज्यादा नहीं रखते हैं. इस कारण वह और वफादारी के लिए जाने जाने वाले नेता के रूप में नितिन नबीन, नड्डा से भी बेहतर विकल्प बन जाते हैं.

असल में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी संगठन पर पूरा नियंत्रण अमित शाह के पास बनाए रखने के पक्ष में साफ तौर पर फैसला किया है. यह तथ्य कि नितिन नबीन कम से कम 2029 के लोकसभा चुनाव तक इस पद पर रहेंगे, उन्हें निर्णायक मौकों पर एक बेहद अहम खिलाड़ी बनाता है.

डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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