एक गोल्डन रूल है: किसी भी घटना के होते ही उसके दीर्घकालिक महत्व का आकलन करने की कोशिश कभी नहीं करनी चाहिए. नतीजों को सामने आने में वक्त लगता है और जब कोई घटना अभी-अभी हुई हो, तो उसके असर को गलत समझ लेने की संभावना ज्यादा होती है.
इसलिए संभव है कि मैं यह लिस्ट थोड़ा जल्दी बना रहा हूं, लेकिन मेरे लिए ये 2025 की सबसे अहम राजनीतिक घटनाएं रहीं.
ऑपरेशन सिंदूर
कई वजहों से ऑपरेशन सिंदूर इस साल की सबसे अहम घटना है. पहली वजह यह कि इसकी शुरुआत एक बेहद खूनी आतंकी हमले से हुई—ऐसा हमला, जिसके बारे में हमें लगने लगा था कि अब ऐसा नहीं होगा. दूसरी वजह यह कि हमने ऐसे हालात में वही किया, जो आमतौर पर करते हैं. हमने आत्मरक्षा के अपने अधिकार का इस्तेमाल किया और पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर बमबारी की.
लेकिन इस बार सब कुछ योजना के मुताबिक नहीं हुआ. हमारे हमले सफल रहे और आतंकी ठिकाने तबाह हुए, लेकिन हमें एक नए तरह के युद्ध का सामना करना पड़ा, जो ज़्यादातर मिसाइलों और ड्रोन के जरिए लड़ा गया. हमारी पारंपरिक ताकत सेना और नौसेना पर बहुत कम भरोसा किया गया. इससे हमारी कुछ बढ़त कम हो गई. इसके बावजूद हम जीते, लेकिन हमें वायुसेना के कुछ विमानों के नुकसान और डोनाल्ड ट्रंप के हस्तक्षेप की वजह से परेशानी भी झेलनी पड़ी.
ज्यादातर रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह युद्ध एक दिन और चलता, तो हम पाकिस्तान को भारी नुकसान पहुंचा सकते थे, लेकिन युद्ध जल्दी रुक जाने से पाकिस्तान को किसी तरह की जीत का दावा करने का मौका मिल गया और वह ट्रंप की मेहरबानी की आड़ ले सका.
ऑपरेशन सिंदूर के कई लंबे वक्त तक असर दिखने वाले नतीजे होंगे. सबसे पहले, यह साफ नहीं है कि इससे पाकिस्तान कितना डरा या रुका है. इसके अलावा, इसने एक नए तरह के युद्ध को सामने रखा है, जिसमें हमें अपनी पूरी श्रेष्ठता साफ तौर पर स्थापित करनी होगी.
और जब तक डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान के लिए ‘फेयरी गॉडमदर’ की भूमिका निभाते रहेंगे, हमें एक अलग वैश्विक माहौल में काम करना सीखना होगा.
मोदी–ट्रंप ‘केमिस्ट्री’
अब लोग यह भूल जाते हैं कि नरेंद्र मोदी और बराक ओबामा के बीच कितनी अच्छी ‘केमिस्ट्री’ थी. कई मायनों में, मोदी को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने वाले ओबामा ही थे. उन्होंने उस असहजता की यादों को मिटाने में भी मदद की, जो तब बनी थी जब अमेरिका ने शुरुआत में मोदी को वीज़ा देने से इनकार कर दिया था.
इसके उलट, हिंदुत्व समर्थकों ने जल्दी ही डोनाल्ड ट्रंप को अपनाया और उन्हें ‘ग्रेट व्हाइट साहब’ जैसा दर्जा दे दिया. इसकी मुख्य वजह यह थी कि ट्रंप ने अमेरिका में मुसलमानों के प्रवेश पर रोक लगाने की बात कही थी, जो मोदी के कुछ समर्थकों में मौजूद कट्टर लोगों को पसंद आई.
इससे भी बुरा यह हुआ कि सरकार के पसंदीदा टीवी चैनलों ने यह कहानी गढ़ दी कि ट्रंप मोदी का कितना सम्मान करते हैं और दोनों के बीच की ‘केमिस्ट्री’ इतनी ज़बरदस्त है कि चीन और पाकिस्तान इस नए गठजोड़ से डर गए हैं.
यह सब काफी बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया और कई बार पूरी तरह काल्पनिक भी था, लेकिन चिंता की बात यह है कि हमारी विदेश नीति से जुड़ी व्यवस्था ने भी इस मिथक पर भरोसा कर लिया.
जब ट्रंप पाकिस्तान के दोस्त और संरक्षक बनकर सामने आए, तो दिल्ली में सचमुच झटका, हैरानी और डर का माहौल था. इसके बाद से अमेरिका लगातार भारत के हितों के साथ भेदभाव करता रहा है और हमारे पास धैर्य रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा.
धैर्य शायद काम आ जाए, क्योंकि ट्रंप को पल भर में नीतियां बदलने के लिए जाना जाता है, लेकिन तब तक हम बहुत खतरनाक हालात में हैं.
विधानसभा चुनावों में जीत
जब पिछले आम चुनाव में बीजेपी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, तो विपक्ष ने दावा किया कि मोदी युग खत्म हो रहा है. अब साफ हो गया है कि यह बात बहुत जल्दबाज़ी में कही गई थी. उपलब्ध चुनावी आंकड़े इसके उलट तस्वीर दिखाते हैं. विपक्ष दो ऐसे राज्य हार गया, जिन्हें उसे जीतना चाहिए था (हरियाणा और महाराष्ट्र), और बिहार में, जहां बीजेपी गठबंधन के मुश्किल में होने की खबरें थीं, वहां उसने भारी जीत दर्ज की.
इसके बहुत बड़े असर हैं, क्योंकि यह भावना कि नरेंद्र मोदी लंबे समय तक सत्ता में रहेंगे, कई सोच बदल देती है. नौकरशाह, जज, पुलिस, पत्रकार और मीडिया मालिक यह मान लेते हैं कि अगर यही भविष्य है, तो बेहतर है इसे स्वीकार कर लिया जाए. इससे केंद्र सरकार का काम और आसान हो जाता है; अब कोई किसी बात पर आपत्ति नहीं करता.
चुनाव आयोग
जब इस दौर का इतिहास लिखा जाएगा, तो यह याद रखा जाएगा कि यह पहली बार था जब चुनाव आयोग इतने विवादों में घिरा. उसे एक संवैधानिक संस्था की बजाय एक राजनीतिक संस्था के रूप में देखा जाने लगा. मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त के पास वह कद और सम्मान नहीं है, जो उनके ज्यादातर पूर्ववर्तियों को मिला था.
संभव है, जैसा कि सरकार कहती है, कि हारने वाले अक्सर रेफरी को दोष देते हैं और विपक्ष की शिकायतें बेबुनियाद हों.
लेकिन आयोग की साख को फिर से मजबूत होने में समय लगेगा.
कल्याणकारी योजनाएं
हालांकि, हम अक्सर इसे इस तरह नहीं देखते, लेकिन मोदी सरकार भारत की अब तक की सबसे ज्यादा कल्याणकारी सरकार है. बीजेपी शासित राज्यों में महिलाओं और कमजोर वर्गों को मिलने वाली मदद इतनी पक्की और नियमित कर दी गई है कि मुझे शक है कि भविष्य की कोई भी सरकार इन्हें बंद करने की हिम्मत कर पाएगी.
इसके पीछे एक दिलचस्प कहानी है. 2004 में, जब यूपीए सत्ता में आई, तो सोनिया गांधी ने तर्क दिया कि बाज़ार उदारीकरण से मिलने वाले फायदे गरीबों तक पहुंचाने का सही तरीका नहीं है. उन्होंने मनमोहन सिंह को ऐसी योजनाएं शुरू करने के लिए राजी किया, जिनमें पैसे सीधे गरीबों तक पहुंचाए जाएं (इनमें सबसे मशहूर NREGA थी).
उस समय ये कदम लोकप्रिय नहीं थे. बीजेपी ने इनमें से कुछ का विरोध किया. ‘पिंक पेपर्स’ ने यह बताते हुए लंबे लेख लिखे कि गरीबों को सीधे पैसा देना व्यवस्था को बिगाड़ता है.
मोदी ने इस कल्याण के विचार को समझदारी से अपनाया और यूपीए के मॉडल से कहीं आगे बढ़ाते हुए इसका दायरा बहुत बढ़ा दिया.
इससे बीजेपी को चुनाव जीतने में मदद मिलती है, और मौजूदा मीडिया माहौल को देखते हुए ‘पिंक पेपर्स’ भी अब इन योजनाओं का विरोध नहीं करते. उल्टा, वे इन्हें मास्टरस्ट्रोक बताते हैं.
मिडिल क्लास
मिडिल क्लास नरेंद्र मोदी का शुरुआती आधार था. बीजेपी को अब भी उसका समर्थन मिलता है, लेकिन असंतोष और निराशा बढ़ रही है. बड़ी वजह यह है कि मिडिल क्लास को लगा था कि मोदी उन्हें ‘न्यू इंडिया’ के केंद्र में रखेंगे और विकास का इंजन बनाएंगे. मोदी के साथ मिलकर वे भारत को सुपरपावर बनाएंगे.
मोदी आज भी मिडिल क्लास के समर्थन को महत्व देते हैं, लेकिन उन्होंने एक सच्चाई स्वीकार कर ली है: मिडिल क्लास से चुनाव नहीं जीते जाते, इसलिए बेहतर है गरीबों पर ध्यान दिया जाए, जो मिलने वाली हर चीज़ के लिए ज्यादा आभारी होते हैं.
गरीबों पर ध्यान देने का एक और फायदा यह है कि उनकी उम्मीदें कम होती हैं. मोदी समर्थक कहते हैं कि मिडिल क्लास बहुत ज्यादा मांग करता है—जैसे कम टैक्स, गिरते रुपये पर रोक वगैरह.
यह बात आंशिक रूप से सही है. मिडिल क्लास की नाराज़गी की असली वजह टैक्स नहीं, बल्कि खराब शासन है. वे ऊंचे टैक्स पर इसलिए आपत्ति करते हैं क्योंकि हर दिन अखबारों में नेताओं की भव्य शादियों और छोटे-मोटे अफसरों के घरों से बरामद सैकड़ों करोड़ रुपये की खबरें छपी रहती हैं.
मिडिल क्लास ने एक साफ-सुथरे भारत की उम्मीद की थी, लेकिन उन्हें वैसा नहीं मिला. उन्होंने ‘मिनिमम गवर्नमेंट’ का वादा माना था, लेकिन हकीकत में शायद ही कभी इतना ज्यादा ‘इंस्पेक्टर राज’ रहा हो, जहां भ्रष्ट और घमंडी अधिकारी अच्छे लोगों को परेशान करते हैं.
और शासन का स्तर भी नीचे गया है. सरकार ने एक ही एयरलाइन को भारत की 65 प्रतिशत उड़ानों का संचालन करने दिया. जब उस एयरलाइन ने पर्याप्त पायलट रखने से इनकार किया और संकट तय हो गया, तो सरकार में किसी ने ध्यान नहीं दिया. यात्रियों को भारी परेशानी झेलनी पड़ी, लेकिन किसी बड़े अधिकारी को न हटाया गया और न ही जिम्मेदार ठहराया गया.
दिल्ली की प्रदूषण समस्या के लिए किसी एक सरकार को दोष देना ठीक नहीं है. लेकिन यह तो साफ है कि जब हवा हमारे बच्चों के फेफड़ों को ज़हर दे रही हो, तब हम बीजेपी से ज्यादा उम्मीद करते हैं, क्योंकि केंद्र, राज्य और नगर निगम तीनों उसी के हाथ में हैं. जब कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो सवाल उठता है: क्या इन्हें चिंता नहीं है? या फिर ये बस अयोग्य हैं और जानते ही नहीं कि करना क्या है?
भविष्य
मुझे नहीं लगता कि नरेंद्र मोदी कहीं जाने वाले हैं. और आने वाले साल में उन्हें भारत–अमेरिका संबंधों में कुछ सामान्य स्थिति लौटानी चाहिए, पाकिस्तान को उसकी जगह पर रखना चाहिए, अपनी सशस्त्र सेनाओं को फिर से मजबूत करना चाहिए और देश के भीतर शासन पर थोड़ा ज्यादा ध्यान देना चाहिए. यही वे साफ और ज़रूरी कदम हैं, जो उठाए जाने चाहिए.
(वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)
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