नयी दिल्ली, 27 अक्टूबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने सोमवार को कहा कि वह न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति तारा वितस्ता गंजू के स्थानांतरण पर बार की भावनाओं से सहमत हैं।
न्यायमूर्ति मोंगा और न्यायमूर्ति गंजू को क्रमशः राजस्थान उच्च न्यायालय और कर्नाटक उच्च न्यायालय में स्थानांतरित किया गया है। उनके स्थानांतरण, विशेष रूप से न्यायमूर्ति गंजू के स्थानांतरण का विभिन्न बार संगठनों ने कड़ा विरोध किया।
दिल्ली उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन (डीएचसीबीए) की महिला वकीलों और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास पाहवा सहित विभिन्न बार के सदस्यों ने भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बीआर गवई को पत्र लिखकर न्यायमूर्ति गंजू के स्थानांतरण पर अपना विरोध जताया था।
न्यायमूर्ति मोंगा और न्यायमूर्ति गंजू को विदाई देने के लिए पूर्ण न्यायालय में आयोजित बैठक में मुख्य न्यायाधीश उपाध्याय ने कहा, “सबसे पहले मैं आपके समक्ष यह कहना चाहता हूं कि मैं इस अदालत से हमारे सहयोगियों के स्थानांतरण पर बार के सदस्यों की भावनाओं का सम्मान करता हूं… मैं पुनः अपने दोनों सहयोगियों के प्रति शुभकामनाएं व्यक्त करता हूं। मैं आज (डीएचसीबीए) अध्यक्ष के माध्यम से व्यक्त की गई बार की भावनाओं से सहमत हूं।”
उन्होंने कहा कि यह सही कहा गया है कि एक न्यायाधीश को सार्वजनिक रूप से नहीं बोलना चाहिए तथा उसके निर्णय ही उसके लिए बोलने चाहिए।
न्यायमूर्ति उपाध्याय ने कहा, “एक न्यायाधीश की असली आवाज उसके संबोधनों या व्यक्तित्व में नहीं, बल्कि उसके निर्णयों में निहित तर्क, संयम और चिंतन में होती है। वे शब्द, एक बार लिखे जाने के बाद, कानून और उसे मानने वालों के साथ हमारी एक मौन बातचीत बन जाते हैं।”
न्यायमूर्ति मोंगा ने कहा कि प्रत्येक निर्णय में केवल पाठ ही नहीं होता, बल्कि उसमें न्यायाधीश का दृढ़ विश्वास, उसकी निष्पक्षता की भावना, मानव स्वभाव की उसकी समझ और जीवन के प्रति उसके विचार भी होते हैं।
सभा को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति गंजू ने कहा कि न्यायपालिका केवल विवादों में मध्यस्थ नहीं है, बल्कि संवैधानिक वादे, सभी के लिए स्वतंत्रता, समानता और न्याय के वादे की संरक्षक भी है।
भाषा प्रशांत पारुल
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