नई दिल्ली: बिहार के पूर्णिया जिले की सड़कों पर सैकड़ों लोग बांस की जलती मशालों के साथ एकत्र हुए. ‘कोसी-सीमांचल की हकमारी के खिलाफ हल्ला बोल’ से लेकर ‘पूर्णिया मांगे मखाना बोर्ड’ तक प्रदर्शनकारियों ने कटिहार और पूर्णिया जिलों में पूर्ण बंद से पहले कई जोशीले नारे लगाए.
केंद्रीय बजट में मखाना बोर्ड की घोषणा ने इन क्षेत्रों के बीच एक नई जंग छेड़ दी है. मखाना का केंद्र कहां है — दरभंगा या पूर्णिया? शुरू में जो आर्थिक फैसला था वह अब राजनीतिक तौर पर बदल गया है.
24 फरवरी को बंद का आह्वान करने वाले पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने कहा, “हम मखाना बोर्ड पर गंदी राजनीति बर्दाश्त नहीं करेंगे. पीएम लुक ईस्ट का नारा देते हैं और सीमांचल कोसी को नज़रअंदाज़ करते हैं — सबसे पिछड़ा क्षेत्र जो पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार है. अगर ऐसा चलता रहा तो हम जनयुद्ध शुरू करेंगे.”
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की हालिया घोषणा ने दरभंगा और पूर्णिया के लोगों को बांट दिया है. स्थानीय राजनेता, कार्यकर्ता, किसान नेता, मीडिया घराने, व्यापारी से लेकर मखाना उद्यमी मंत्रियों को पत्र लिखकर अपनी राय देने लगे हैं. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की दरभंगा में मखाना किसानों के साथ हाल ही में हुई बातचीत ने इन दूरियों को और बढ़ा दिया है.

पूर्णिया और उसका पड़ोसी जिला कटिहार बिहार में मखाना का सबसे बड़ा उत्पादक है. राज्य में मखाना की खेती के लिए उपयोग की जाने वाली 35,000 हेक्टेयर ज़मीन में से लगभग 14,000 हेक्टेयर इन दो क्षेत्रों में आती है.
मखाना विवाद के मूल में फायदों और मौकों का कथित असमान वितरण है. कुछ लोग मखाना बोर्ड को क्षेत्र की अर्थव्यवस्था के लिए वरदान मानते हैं, तो कुछ का दावा है कि यह पूर्णिया और दरभंगा के बीच मौजूदा आर्थिक और सामाजिक विषमताओं को और बढ़ाने का काम करेगा.
पूर्णिया के मखाना उद्यमी और फार्म2फैक्ट्री के संस्थापक मनीष कुमार ने कहा, “हम फैक्ट्स के आधार पर पूर्णिया में मखाना बोर्ड की मांग कर रहे हैं क्योंकि यह मखाना का सबसे बड़ा केंद्र है और हर साल लाखों लोग मखाना से जुड़े कामों के लिए जिले में आते हैं. इस पर वोट बैंक की राजनीति नहीं होनी चाहिए.”
दरभंगा बनाम पूर्णिया
बजट घोषणा के एक हफ्ते बाद, मखाना उद्यमी, स्थानीय व्यापारी और कार्यकर्ता पूर्णिया में मखाना बोर्ड की पैरवी करने में जुट गए.
20 फरवरी को मनीष कुमार और कुछ अन्य व्यापारियों ने राज्य की खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री लेशी सिंह से मुलाकात की और सात सूत्री ज्ञापन सौंपा.

कुमार ने कहा, “मंत्री ने हमें आश्वासन दिया है कि वे फैक्ट्स के आधार पर इन मांगों की जांच करेंगी.”
कुमार के अनुसार, दरभंगा और मधुबनी से दो लाख से अधिक लोग मखाना उद्योग में मौसमी नौकरियों के लिए हर साल पूर्णिया आते हैं. उन्होंने कहा, “वह यहां इसलिए आते हैं क्योंकि पूर्णिया में मखाना का बाज़ार फल-फूल रहा है. कोसी-सीमांचल क्षेत्र राज्य में 70 प्रतिशत से अधिक मखाना का उत्पादन करता है. 2015 के बाद, कई बड़ी कंपनियों ने यहां अपने गोदाम बनाए हैं.”

इस बीच, पूर्णिया में किसान नेता उत्पादकों को मखाना बोर्ड की महत्ता समझाने में व्यस्त हैं.
जिला किसान संघ के संस्थापक अनिरुद्ध मेहता ने कहा, “हमने अब तक कई बैठकें की हैं और किसानों को जागरूक कर रहे हैं कि पूर्णिया में मखाना बोर्ड का गठन कितना ज़रूरी है. पूर्णिया मखाना का केंद्र बिंदु बन गया है. हम किसी भी परिस्थिति में दरभंगा में बोर्ड का गठन नहीं होने देंगे.”
मेहता ने कहा कि बोर्ड से मखाना के उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.
मखाना फसल की व्यावसायिक खेती मुख्य रूप से उत्तर बिहार के कटिहार, दरभंगा, सुपौल, किशनगंज, पूर्णिया, सहरसा, अररिया, मधेपुरा और मधुबनी जिलों तक सीमित है.
बिहार के पारंपरिक मखाना उत्पादक क्षेत्रों दरभंगा और मधुबनी से आगे निकलकर कोसी-सीमांचल क्षेत्र 3,000 करोड़ की इंडस्ट्री में इसकी खेती करने वाला अग्रणी क्षेत्र बन गया है.
2022 में पूर्णिया स्थित बिहार एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के भोला पासवान शास्त्री एग्रीकल्चर कॉलेज की कोशिशों से मिथिला मखाना को जीआई टैग दिया गया. अब पूर्णिया में मखाना बोर्ड बनाने की भी मांग की जा रही है.
भोला पासवान शास्त्री एग्रीकल्चर कॉलेज के प्रिसिंपल डीके महतो ने कहा, “हमने मखाना के लिए जीआई टैग हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. हमारे पास समर्पित मखाना रिसर्च टीम है, जिसने सबौर मखाना-1 किस्म विकसित की है और अब एक और किस्म पर काम कर रही है. अगर पूर्णिया में मखाना बोर्ड बनता है, तो सीमांचल के किसानों की आर्थिक स्थिति बदल जाएगी.”
लेकिन दरभंगा के मखाना उद्यमियों के अनुसार, जीआई टैग मिथिला के नाम पर दिया गया है, न कि कोसी या सीमांचल के नाम पर.
कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान अपनी स्नैक कंपनी मखायो शुरू करने वाले रचित सरावगी ने कहा, “बोर्ड का गठन तो दरभंगा में होना चाहिए. मखाना की उत्पत्ति दरभंगा-मधुबनी में हुई है और यहां से लाखों लोग जिन्हें फोडिया कहा जाता है, मखाना लावा फोड़ने के लिए पूर्णिया जाते हैं.”
सरावगी ने कहा कि बोर्ड मखाना उद्योग को संगठित करेगा और उत्पाद की कीमत में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करेगा.
राजनीति ने बढ़ाई बहस
मखाना बोर्ड को लेकर विवाद तब और बढ़ गया जब केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान दरभंगा दौरे पर आए.
दरभंगा में मखाना उत्पादकों से बात करते हुए चौहान ने कहा, “अगर बिहार में मखाना बोर्ड बनता है तो किसान भाइयों की सलाह पर बनेगा. हमारे मखाने को पूरी दुनिया में लोकप्रिय बनाने की कोशिश की जाएगी.”
पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने चौहान पर निशाना साधते हुए उन्हें कोसी-सीमांचल में “असली मखाना किसानों” से मिलने के लिए आमंत्रित किया.
पप्पू यादव पूर्णिया के लिए मखाना बोर्ड की जोरदार मांग कर रहे हैं, जबकि सांसद गोपाल ठाकुर और विधायक संजय सरावगी दरभंगा के लिए इसकी मांग कर रहे हैं. चौहान से मुलाकात के दौरान ठाकुर ने दरभंगा में बोर्ड बनाने की मांग की.
चौहान के दौरे से कुछ दिन पहले विधायक सरावगी ने गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को पत्र लिखकर बोर्ड के मुख्यालय के रूप में दरभंगा का चयन करने का अनुरोध किया था.
हालांकि, केंद्र सरकार ने अभी तक यह खुलासा नहीं किया है कि बिहार में मखाना बोर्ड कहां बनेगा.
मामले से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “यह मुद्दा राजनीतिक हो गया है. पूर्णिया और दरभंगा दोनों जगहों से मांग बढ़ रही है. इसलिए सरकार जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेने जा रही है, क्योंकि यह चुनावी साल है. चौहान का दरभंगा दौरा मौजूदा माहौल को समझने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा सकता है.”
स्थानीय प्रेस में मखाना बोर्ड पर बहस तेज़ है.
एक हेडलाइन में लिखा है: ‘मखाना बोर्ड पर अंदर ही अंदर फूट रहा लावा, उत्पादन में पूर्णिया अव्वल’. एक अन्य में था: ‘मखाना बोर्ड के लिए सड़क पर उतरेगा किसान संघ’. राजनेता भी खबरों की कतरनें शेयर कर रहे हैं. वहीं सोशल मीडिया पर #MakhanaBoardPurniame जैसे हैशटैग की भरमार है.
मल्लाह वोट
व्यापारियों और राजनेताओं के अलावा मल्लाह समुदाय के लोग भी मखाना बोर्ड पर पैनी नज़र रख रहे हैं. मल्लाह समुदाय में मखाना की खेती के पारंपरिक विशेषज्ञ शामिल हैं, जिन्हें यह कला अपने पूर्वजों से विरासत में मिली है.
हर साल दरभंगा-मधुबनी से इस समुदाय के लाखों लोग पूर्णिया आते हैं. उन्हें उम्मीद है कि बोर्ड के गठन से उनकी ज़िंदगी में कुछ बदलाव आएगा.
मल्लाह समुदाय से आने वाले संजय साहनी ने कहा, “हमारे काम करने की स्थिति बहुत खराब है. हमें कई महीनों तक परिवार के साथ घर से बाहर रहना पड़ता है. बोर्ड के गठन के वक्त हमारी राय पर भी विचार किया जाना चाहिए.”
2023 के बिहार जाति सर्वेक्षण के अनुसार, मल्लाह समुदाय की राज्य में 2.61 प्रतिशत आबादी है, जो इसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है. बिहार विधानसभा की लगभग 40 सीटें कोसी-सीमांचल क्षेत्र से आती हैं.
नाम न बताने की शर्त पर राज्य के एक वरिष्ठ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता ने कहा, “नरेंद्र मोदी सरकार के इस फैसले से मल्लाह समुदाय मजबूत होगा. अभी तक किसी ने इन पर ध्यान नहीं दिया.”
2003 में छपी किताब “मखाना” के सह-लेखक और प्रख्यात मखाना रिसर्चर विद्यानाथ झा ने हल सुझाने से पहले दोनों क्षेत्रों की अलग-अलग भौगोलिक स्थितियों की ओर इशारा किया. उन्होंने कहा, “दरभंगा में पानी की लगातार कमी है, जबकि कोसी-सीमांचल में ऐसी कोई स्थिति नहीं है, जिसके कारण वहां मखाना की खेती बढ़ रही है.”
झा के अनुसार, इस बात पर विचार करना होगा कि दरभंगा-मधुबनी के लोगों का मखाना की कटाई और उत्पादन पर एकाधिकार है, जबकि पूर्णिया इसका सबसे बड़ा बाज़ार है.
उन्होंने कहा, “दोनों जगहों पर बोर्ड की अलग-अलग शाखा बनाकर इस बहस को खत्म किया जा सकता है.”
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