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Monday, 22 April, 2024
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क्या GI टैग बदल पाएगा बिहार में मखाना बिजनेस का भविष्य, नए स्टार्ट-अप में क्यों बढ़ रहा आकर्षण

मखाना किसान तो अभी सिर्फ इसी बात से परेशान हैं कि बीते कई सालों के बाद इसका दाम करीब 50 प्रतिशत तक गिर गया है.

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मखाना अब भारत का नया सुपरफूड बनकर उभरा है और केंद्र सरकार से हाल ही में मिले भौगोलिक संकेतक (जीआई टैग) के बाद अब ये वैश्विक बाज़ार तक पहुंच बनाने को तैयार है. बिजनेस में तेजी के साथ ही बिहार में मखाना के क्षेत्र में अब नए स्टार्ट-अप और कारोबारी भी आने लगे हैं.

लेकिन मिथिला क्षेत्र में पीढ़ियों से जो किसान मखाना की खेती कर रहे हैं, वे बाजार में बढ़ती मांग और इसके प्रति लोगों के उत्साह से वाकिफ नहीं हैं. वे अभी भी कम श्रम पर पोखरों और खेतों में नंगे शरीर लिए पानी में गहरे उतरकर मखाना के कंटीले पत्तों को हटाकर गुड़ी (मखाना के बीज) को निकालते हैं.

Makhana seeds of different sizes | Photo: Krishan Murari | ThePrint
विभिन्न आकार के मखाने के बीज | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

मखाना किसान तो अभी सिर्फ इसी बात से परेशान हैं कि बीते कई सालों के बाद इसका दाम करीब 50 प्रतिशत तक गिर गया है. बाजार में पैदा हुई अनिश्चितता की स्थिति उनके लिए अभी सबसे बड़ा संकट है.

लेकिन इस फसल को लेकर इन दिनों बढ़ती चर्चाओं के बीच व्यापार और रिसर्च दोनों में ही तेजी देखने को मिली है. दरभंगा का चर्चित मखाना रिसर्च सेंटर आने वाले कुछ सालों में मखाना की एक नई वैरायटी लांच करने वाला है ताकि उत्पादन में वृद्धि हो सके. इसी सेंटर से मखाना की स्वर्ण वैदेही वैरायटी तैयार हुई है.

Makhana Research Centre, Darbhanga | Photo: Krishan Murari | The Print
मखाना अनुसंधान केंद्र, दरभंगा | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

मखाना के बिजनेस में बेहतर संभावनाओं को देखते हुए नए एंतरप्रेन्योर अपनी कोर्पोरेट की बड़ी-बड़ी नौकरियों को छोड़कर बिहार में आ रहे हैं.

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मिथिला नेचुरल्स के सीईओ मनीष आनंद भी ऐसे ही एक एंतरप्रेन्योर हैं जिन्होंने 2012 में अपनी कार्पोरेट की नौकरी छोड़ दी. पटना में पले-बढ़े आनंद ने नौकरी छोड़ने के बाद खेती-किसानी के क्षेत्र को समझने के लिए कुछ साल लगाए और अब उन्होंने मधुबनी के अरेर में एशिया की सबसे बड़ी मखाना फैक्ट्री खोली है.

आनंद कहते हैं, ‘पोखर से लोगों की प्लेट तक अच्छी क्वालिटी का मखाना पहुंचाने में मुझे गर्व महसूस होता है.’

मखाना अब सिर्फ पारंपरिक तरह से इस्तेमाल नहीं होता बल्कि बाजार की बढ़ती मांग को देखते हुए नए-नए फ्लेवर्स तैयार किए जा रहे हैं और बेहतर पैकेजिंग की मदद से घरेलू और वैश्विक बाजार तक पहुंचाया जा रहा है. अगर इसी तरह मांग बढ़ती रही तो बिहार के लिए आने वाले वक्त में मखाना एक बड़ी चीज़ साबित हो सकती है.

दरभंगा में सुमित्रा फूड्स की शुरुआत करने वाले श्रवण रॉय ने दिप्रिंट से कहा, ‘हम मखाना को अलग-अलग जायकों में लोगों तक पहुंचाते हैं. हमने मखाना के 18-19 जायके तैयार किए हैं, जैसे कि मखाना चाय, खीर, शेक, आदि. इसका मुख्य लक्ष्य जंक फूड का इस्तेमाल बंद कर सुपरफूड की तरफ लोगों को आकर्षित करना है.’

Ruchi Mandal of Sumitra Foods doing packaging work with others | Photo: Special Arrangement
सुमित्रा फूड्स की रुचि मंडल दूसरे कर्मचारियों के साथ मिलकर पैकेजिंग का काम कर रही हैं | फोटो: विशेष व्यवस्था

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मखाना स्टार्ट-अप

मखाना में संभावना देख रहे एंतरप्रेन्योर ज्यादातर बिहार के ही हैं जो बचपन में इसे खाते और देखते हुए बड़े हुए हैं. मखाना की मांग तो बाजार में पहले से थी लेकिन कोरोना महामारी में इसमें काफी तेजी आई. और इसी ने नए स्टार्ट-अप्स को मखाना में वैल्यू-एड करने की तरफ बढ़ाया और पेरी-पेरी, दालचीनी वाले फ्लेवर के साथ इसे तैयार किया जाने लगा.

अब एंतरप्रेन्योर बिहार के बाहर भी मखाना के व्यापार का विस्तार कर रहे हैं और इसके लिए वे बड़े-बड़े एमएनसी की तर्ज पर अपने दफ्तरों को डिजाइन कर रहे हैं. मखाना क्षेत्र में नए लोगों के आने से युवाओं के लिए रोजगार की संभावनाएं भी बढ़ रही हैं.

मनीष आनंद कहते हैं, ‘पहले मुझे मखाना, खेती और फूड सेक्टर के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. रोटी, कपड़ा और मकान ऐसा सेक्टर है जो हमेशा रहेगा, खासकर रोटी. फूड सेक्टर की हमेशा मांग बनी रहेगी.’

कोलकाता के सेंट जेवियर्स कॉलेज से पढ़ाई कर चुके रचित और भुवन सरावगी ने मखायो नाम से स्टार्ट-अप शुरू किया है. दरभंगा के रहने वाले इन दो युवकों ने बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम न कर के मखाना के क्षेत्र को चुना.

रचित बताते हैं, ‘कोविड लॉकडाउन के समय 100-150 स्क्वायर फीट के दफ्तर से हमने काम शुरू किया था. तब मखाना को लेकर ज्यादा कोई जानकारी नहीं थी.’ लेकिन अब दोनों भाई मिलकर 150 से ज्यादा लोगों को रोजगार दे रहे हैं.

विश्व भर में मखाना का इस्तेमाल सुपरफूड के तौर पर किया जा रहा है. इसमें न केवल इम्यूनिटी को बढ़ाने की क्षमता है बल्कि कामोत्तेजक गुण भी हैं.

मखाना के सुप्रसिद्ध रिसर्चर और ‘मखाना’ नाम से ही किताब लिखने वाले डॉ. विद्यानाथ झा ने बताया कि मखाना शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द मख (पवित्र रिवाज़) और अन्न (अनाज) से हुई है जिसका अर्थ होता है यज्ञ का खाना.

मखाना बिहार का पांचवा ऐसा उत्पाद है जिसे जीआई टैग मिला है. इससे पहले भागलपुर के जर्दालु आम, कतरनी चावल, नवादा के मगही पान और मुज्जफ्फरपुर की लीची को यह टैग मिल चुका है.

पेशे से इंजीनियर श्रवण रॉय बताते हैं कि जब वे दक्षिण भारत में कॉलेज में थे तब उनके साथ पढ़ने वाले चार उत्तर भारतीयों के अलावा किसी को भी मखाना के बारे में जानकारी नहीं थी. अडाणी ग्रुप की नौकरी छोड़कर उन्होंने दरभंगा में मखाना क्षेत्र में स्टार्ट-अप शुरू किया, जिसका उद्घाटन सुपर-30 के संस्थापक और गणित के विद्वान आनंद कुमार ने किया था.

रॉय ने कहा, ‘मेरा पहला लक्ष्य लोगों के बीच मखाना को लोकप्रिय बनाना है क्योंकि किसी भी अन्य ड्राई फ्रूट्स से इसकी तुलना नहीं है. इसमें सबसे ज्यादा कैलोरिफिक वैल्यू है. इसलिए मैंने सोचा कि मखाना पर काम किया जाना चाहिए. यह इंडस्ट्री संगठित नहीं है और यहां काफी मौके उपलब्ध हैं.’

नए-नए एंतरप्रेन्योर सोशल मीडिया साइट्स जैसे कि लिंक्डइन, फेसबुक, इंस्टाग्राम के जरिए मखाना के प्रोडक्ट्स को लोगों के बीच ले जा रहे हैं. आकर्षित पैकेजिंग के जरिए मखाना के नए फ्लेवर्स को पेश किया जा रहा है.

हाल ही में सुमित्रा फूड्स ने जीआई महोत्सव में हिस्सा लिया जो कि वाराणसी के बड़ा लालपुर के दीन दयाल उपाध्याय ट्रेड फेसीलिटेशन सेंटर में सरकार की तरफ से आयोजित कराया गया था.

मखायो ने करीब 75 परिवारों को घर बैठे नौकरी दी है जो मखाना को अपने घर से प्रोसेस करते हैं. वहीं फैक्ट्री में काफी संख्या में महिलाएं काम करती हैं और चारों तरफ पड़े मखाना के ढेर में से अलग-अलग साइज के मखाना को अलग कर पैक करती हैं.

रचित बताते हैं, ‘जीआई टैग मिलने के बाद डिमांड के स्तर पर मार्केट में फर्क देखने को मिला है. लोग जहां मखाना को नहीं जान रहे थे, वहां भी जानने लगे हैं. अलग-अलग देशों से मखाना के बारे में पूछा जा रहा है. मखाना मिथिला की इकोनामी को बहुत आगे लेकर जा सकता है. इसमें इतनी ताकत है कि ये पूरे मिथिला में रोजगार पैदा कर सकता है.’

सहरसा के लालगंज गांव के रहने वाले बीडियो मुखिया मखाना किसान हैं जो इन दिनों रात के 2 बजे से लेकर सुबह के 6 बजे तक मखाना के बीज (गुड़ी) को फोड़ने का काम करते हैं. उनका पूरा परिवार भी इसी काम में लगा रहता है. सुबह करीब 7 बजे मखाना के बीज को घर के आंगन में चटाई पर फैलाते हुए उन्होंने कहा, ‘अचानक से इस बार गुड़ी और लावा का दाम गिर गया. इस साल बहुत नुकसान हो गया है. जितना पैसा फसल में लगाया उतना भी इस बार वापस आने की उम्मीद नहीं है.’

वीडियो मुखिया की पत्नी चूल्हे पर खाना पकाते हुए सारी बातचीत सुन रही है और अचानक से बांस के फट्टों के बीच में से झांकते हुए कहती है कि इस साल मखाना की खेती में जितना रुपए लगाया उतना ही वापस नहीं आ पाया है. लेकिन फ्री में तो इसे फेंक भी नहीं सकते. हम सब गरीब हैं इसलिए इतनी परेशानी झेलनी पड़ती है.

Graders are used to differentiate the sizes of makhana seeds. Locally, it is called chalna | Photo: Krishan Murari | The Print
मखाना के बीजों के आकार में अंतर करने के लिए ग्रेडर्स का उपयोग किया जाता है। स्थानीय भाषा में इसे चालना कहते हैं | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

सहरसा के ही कमल किशोर चौधरी पूर्णिया के खुश्कीबाग में मखाना का व्यापार करते हैं. उन्होंने बताया कि पिछले साल मखाना का उत्पादन काफी हो गया था जो कि बिक नहीं पाया, इसलिए इस साल मखाना का दाम काफी कम है.

मिथिला क्षेत्र में मखाने का न सिर्फ सांस्कृतिक महत्व है बल्कि ये हजारों परिवारों की अर्थव्यवस्था को भी चलाता है. खेतों और पोखरों से मखाना निकालने का काम सबसे जटिल माना जाता है. अगस्त से लेकर नवंबर तक मिथिला में हर तरफ मखाना निकालने वाले लोग मिल ही जाएंगे. बड़े-बड़े गांज और हांडी लिए मखाना किसान घंटों सफर कर के मखाना निकालने जाते हैं लेकिन इस बार उनके चहरे पर मायूसी छाई रहती है.

नंद किशोर मंडल और अजब लाल मंडल इन दिनों रोज 60-70 किलोमीटर की यात्रा कर के कटिहार से अररिया मखाना निकालने के लिए जाते हैं. उनके साथ टैम्पू में 10-12 लोग और होते हैं और सभी के गांज और हांडी गाड़ी से बंधे होते हैं.

Traditional setup for popping makhana seeds | Photo: Krishan Murari | ThePrint
मखाना बीज पॉपिंग के लिए ट्रेडिशनल सेटअप | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

मखाना निकालने की प्रक्रिया काफी मुश्किल और चुनौती भरी है लेकिन मल्लाहों खासकर बनपर समुदाय के लोगों में आशंका है कि मशीनों के प्रवेश से उनके रोजगार पर संकट छा सकता है.


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जीआई टैग, विवाद और रणनीति

चार साल के लंबे संघर्ष के बाद मिथिला मखाना को जीआई टैग मिला है. मखाना को विशेष पहचान दिलाने के लिए काफी समय से इसकी मांग चल रही थी. आखिरकार 20 अगस्त को वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने ट्वीट कर इसकी घोषणा की.

मखाना को मिथिलांचल मखाना उत्पादक संघ के नाम पर जीआई टैग मिला है जो कि अगले 10 सालों के लिए रहेगा. उसके बाद फिर से इसको रीन्यू कराना होगा.

हालांकि इस बात को लेकर विवाद की स्थिति थी कि बिहार मखाना या मिथिला मखाना में से किस नाम से जीआई टैग के लिए आवेदन भेजा जाए. क्योंकि ऐतिहासिक प्रमाणों की इसमें जरूरत होती है. लेकिन लाइब्रेरी और पुराने दस्तावेजों तक पहुंच इतनी आसान नहीं थी. इसलिए जानबूझकर एक रणनीति अपनाई गई जिसने विवाद पैदा कर दिया. और इन सब के पीछे भोला पासवान शास्त्री कृषि कॉलेज, पूर्णिया में जूनियर सांइटिस्ट और सहायक प्रोफेसर अनिल कुमार थे, जिन्होंने जीआई टैग के आवेदन से जुड़े सारे दस्तावेज तैयार किए.

कुमार ने दिप्रिंट को बताया, ‘डाक्युमेंटेशन के पहले चरण में ऐतिहासिक पहलुओं को खोजना बहुत मुश्किल हो रहा था, इसके लिए दरभंगा गए जहां लाइब्रेरी में प्रवेश नहीं मिला. फिर वहां के विद्वानों से मिले तो उन्हें लगा कि अगर हम इसके बारे में जानकारी दे देंगे तो कहीं हम बहुत बड़ी बात तो नहीं बता देंगे. उन्होंने कोई जानकारी नहीं दी. फिर हमने एक रणनीति बनाई. और बिहार मखाना के नाम से प्रेस नोट निकाल दिया. इसके जारी होते ही कोहराम मच गया. इसके बाद सभी लोग खुद से ही इसके ऐतिहासिकता के बारे में जानकारी देने लगे.’

यह रणनीति सफल रही और आखिरकार टैग मिथिला क्षेत्र के नाम से ही मिला, जो कि बिहार और मिथिला दोनों के लिए ही जश्न की बात थी.


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मखाना को बढ़ावा दे रही है सरकार

किसी वक्त दरभंगा को बिहार की मखाना राजधानी कहा जाता था लेकिन आज के समय यह स्थिति एकदम बदल चुकी है. अनिल कुमार ने बताया कि पिछले 10-12 सालों में कोसी-सीमांचल क्षेत्र में मखाना की खेती दोगुनी बढ़ी है और दरभंगा-मधुबनी में अब सिर्फ कुल उत्पादन का 30 प्रतिशत ही होता है. बता दें कि बिहार में विश्व का 85-90 प्रतिशत मखाना होता है, जिनमें खासकर मधुबनी, दरभंगा, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णिया, कटिहार, अररिया जिले शामिल हैं.

पहले मखाना की खेती तालाबों यानि कि पोखरों में होती थी लेकिन अब खेतों में भी 1.5 से 2 फीट पानी में इसका उत्पादन आसानी से हो जाता है. विद्यानाथ झा बताते हैं, ‘जंगली किस्म में यह उत्तरी भारत, कोरिया, जापान और चीन में पाया जाता है. मिथिला क्षेत्र में इसकी खेती शुरू हुए हजार साल से भी ज्यादा हो गए हैं.’

Makhana plants cultivation practice | Krishan Murari/ThePrint
मखाना के पौधे की खेती पद्धति | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

मखाने की हार्वेंस्टिंग एक मुश्किल काम है क्योंकि इसके पत्ते कांटों से भरे होते हैं. इसलिए इसका वैज्ञानिक नाम युरेल फेरोक्स है जो कि ग्रीक के दंतकथाओं में यूरेल नाम की एक देवी पर पड़ा है जिसका चेहरा भयानक डरावना है. इसलिए एक मैथिली कहावत भी है- मखानक पात सन मुंह पोछब (मखाने के पत्ते से मुंह पोछना).

मखाना खेती की तरफ किसानों को आकर्षित करने के लिए बिहार सरकार ने मखाना विकास योजना शुरू की है जिसके तहत सबौर मखाना-1 और स्वर्ण वैदेही किस्मों पर 75 फीसदी की सब्सिडी दी जाएगी. गौरतलब है कि भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय ने सबौर मखाना-1 विकसित की है जिसे तालाबों और खेत दोनों में किया जा सकता है. वहीं दरभंगा स्थित मखाना रिसर्च सेंटर ने भी स्वर्ण वैदेही वैरायटी विकसित की है. इन दोनों का ही लक्ष्य मखाना के उत्पादन को बढ़ाना है.

सबौर मखाना-1 वैरायटी से देशी वैरायटी की तुलना में 10-12 क्विंटल उत्पादन ज्यादा होता है. इसके अलावा देशी वैरायटी में लावा बनने की क्षमता 35-40 प्रतिशत है लेकिन सबौर मखाना में ये 55-60 प्रतिशत है.

वर्तमान में बिहार में मखाना की खेती 35 हजार हेक्टेयर में होती है जिसमें तकरीबन 73,500 मेट्रिक टन मखाना के बीज निकलते हैं और प्रोसेसिंग के बाद सिर्फ 40 प्रतिशत ही लावा बनता है.

मखाना और मिथिला के अलग-अलग कर के नहीं देखा जा सकता है. मिथिला पहले के विदेह साम्राज्य का हिस्सा है जिसमें उत्तरी बिहार और नेपाल का तराई क्षेत्र आता है. इस इलाके में पानी की काफी उपलब्धता ने इसे मखाना की खेती के लिए उपयुक्त बनाया और यहां सदियों से इसकी खेती की जा रही है.

अनिल कुमार ने कहा, ‘मखाना सिर्फ इलीट लोगों की थाली तक रह गया है. जब तक ये गरीब लोगों की थाली में जगह नहीं बनाएगा तब तक इसके पोटेंशियल का सही इस्तेमाल नहीं होगा. इसलिए प्रोडक्शन लेवल को बढ़ाना और प्रोडक्शन की लागत को कम करना ही अभी लक्ष्य है ताकि आम लोगों तक इसकी पहुंच हो जाए.’

मखाना की बढ़ती मांग ने इसका फलक बिहार के बाहर तक पहुंचा दिया है.

ओडिशा सरकार ने 2017 में बिहार के एंतरप्रेन्योर को आमंत्रित किया था और राज्य में मखाना की खेती शुरू करने को कहा था. मयूरभंज और केंदूझार जिलों में अभी काफी कम क्षेत्रफल में मखाना की खेती की जाती है.

एंतरप्रेन्योर्स का कहना है कि वर्तमान में मखाना इंडस्ट्री 3 हजार करोड़ रुपए की है. मार्केट इंटेलीजेंस रिपोर्ट के मुताबिक, मखाना का बाजार 2019-23 के बीच 7 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है और उम्मीद है कि 2019-23 के बीच यह 72.5 मिलियन डॉलर तक पहुंच जाए.

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने 2027-28 तक 10 हजार फार्मर्स प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (एफपीओ) बनाने और इस पर 6800 करोड़ रुपए निवेश करने का लक्ष्य रखा है. वहीं दरभंगा को ‘एक जिला, एक उत्पाद’ के तहत मखाना के क्षेत्र में अच्छा काम करने के लिए पीएम मोदी ने पुरस्कृत भी किया है.

हालांकि मखाना की खेती के लिए एक नई चुनौती भी उभर रही है. दरभंगा स्थित मखाना रिसर्च सेंटर के हेड और प्रधान वैज्ञानिक इंदू शेखर सिंह ने दिप्रिंट को बताया कि जहां पर भी वेटलैंड होता है, वहां का इलाका ठंडा होता है. यह न सिर्फ गर्मी कम करता है बल्कि बारिश का भी निर्माण करता है. उन्होंने कहा, ‘वेटलैंड पृथ्वी का एक बहुत ही स्टेबल सिस्टम है जो ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को कम करता है. जहां पर प्राकृतिक वेटलैंड है, उसे बचाने और उसके पोटेंशियल को टैप करने की भी जरूरत है.’

सिंह ने बताया, ‘हीटवेव मखाना के उत्पादन के लिए ठीक नहीं है. अगर गर्मी ज्यादा होगी तो इसके उत्पादन पर असर पड़ेगा. लेकिन ग्लोबल वार्मिंग का इतना असर अब तक मखाना पर नहीं देखा गया है लेकिन इसी तरह गर्मी बढ़ती गई तो इस पर भी फर्क पड़ेगा.’

सिंह बताते हैं कि यहां की जमीन की उत्पादकता के लिए बाढ़ का आना काफी जरूरी है. ‘यहां तालाब मेनटेन नहीं हो सका और न ही उसका रिवाइवल हो पाया. इस कारण फर्टिलिटी कम हुई है. उत्पादन में कमी आई है. साथ ही लोग अपने घरों का कचरा भी इसी में डालते हैं. 1970-80 के दशक में जिन तालाबों में 20-25 टन मखाना निकल जाता था आज वो 12-13 टन पर आ गया है.’


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पग पग पोखर……और मैथिली संस्कृति

मल्लाह जाति में सात उपजातियां हैं जिन्हें मखाना की खेती में विशेषज्ञता हासिल है. विद्यानाथ झा बताते हैं, ‘मखाना की खेती की तकनीक को मल्लाह समुदाय कई पीढ़ियों से सहेजते हुए आगे बढ़ा रहे हैं.’

मखाना न केवल इस क्षेत्र में आर्थिक तौर पर जुड़ा है बल्कि धार्मिक और सामाजिक तौर पर भी इसका काफी महत्व है. मखाने का इस्तेमाल शुभ से लेकर अशुभ तक में किया जाता है. हाल के वर्षों में तो राजनीतिक रैलियों में भी नेताओं को मखाना की माला पहनाई जाने लगी है.

सांस्कृतिक तौर पर मैथिली में एक कहावत है जो इस पूरे क्षेत्र की तस्वीर को भी रेखांकित करता है:

पग पग पोखर माछ मकान
सरस बोल मुश्की मुख पान
विद्या वैभव शांति प्रतीक
सरस क्षेत्र मिथिलांचल थीक

हालांकि मिथिला के राजा शिव सिंह ने कई पोखरों को खुदवाने का आदेश दिया था जिन्हें रजोखर के नाम से जाना जाता है. अब उनकी स्थिति ठीक नहीं है लेकिन अभी भी इन रजोखरों में मखाने की खेती होती है. विद्यानाथ झा बताते हैं कि राजा शिव सिंह मिथिला के महाकवि विद्यापति के शिष्य थे. विद्यापति ने अपनी कविताओं के जरिए शिव सिंह को अमर बना दिया. उन्होंने अपने शासन के दौरान कई पोखर खुदवाए.

एक प्रसिद्ध मैथिली कहावत के बारे में झा बताते हैं, ‘पोखेर रजोखर अरसब पोखरा, राजा शिव सिंह और सब छोकरा.’

झा बताते हैं कि मखाने के बिना मिथिला क्षेत्र में शरद पूर्णिमा के दिन मनाए जाने वाले कोजगरा पर्व की कल्पना ही नहीं की जा सकती. वे बताते हैं, ‘शादी के पहले साल में लड़की वालों की तरफ से लड़के वालों को मखाना भिजवाया जाता है. लोक व्यवहार में अगर कोई चीज है तो मतलब है कि कोई न कोई वैज्ञानिक बात है इसके पीछे.’

मखाना की भले ही पूरी दुनिया में पहचान है लेकिन अब विश्व मार्केट में अब जब भी इसकी चर्चा होगी तो मिथिला मखाना के नाम से होगी. झा बताते हैं, ‘कोई भी चीज जिसमें थोड़ा भी गुण है, वो काफी दिनों तक छुपी नहीं रह सकती. मखाना तो बहुत समय से पैदा होता है लेकिन उसके गुण का प्रचार प्रसार आज के समय में हो रहा है.’

(इस फीचर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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