नई दिल्ली: जब 28 वर्षीय सतनाम सिंह ने कृषि स्नातक डिग्री कॉलेज में दाखिला लिया, तो उन्होंने ठान लिया था कि वे अवैज्ञानिक खेती के तरीकों का शिकार नहीं बनेंगे और ‘आधुनिक कृषि शिक्षा’ के प्रति समर्पित रहेंगे. उनका सपना था कि वे पंजाब के फिरोजपुर में अपने परिवार की खेती को 21वीं सदी के अनुकूल बना सकें.
लेकिन उत्तर प्रदेश के मेरठ स्थित तिवारी एग्रीकल्चर इंस्टीट्यूट से बीएससी (कृषि) और एमएससी (एग्रोनॉमी) की पढ़ाई के दौरान उन्हें वही पुरानी बातें सिखाई गईं, जो भारत की ग्रीन रिवोल्यूशन के दौर में प्रचलित थीं.
जब वे व्यावहारिक रूप से खेती में उतरे, तो उन्हें महसूस हुआ कि किसान उनकी किताबों से कहीं ज्यादा जानते हैं.
“मैंने किसानों के साथ काम करके आधुनिक खेती के बारे में ज्यादा सीखा है, बनिस्बत क्लासरूम में बैठकर,” सिंह ने कहा.
उनकी शिक्षा केवल पुराने सिलेबस और क्लास तक ही सीमित थी, जिसमें रोजगारपरक कौशल की कमी थी—जो भारतीय कृषि शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता को उजागर करता है.
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सिंह का अनुभव भारत की कृषि शिक्षा की खस्ता हालत को दर्शाता है, जहां पाठ्यक्रम अब भी केवल फसल उत्पादन बढ़ाने पर केंद्रित है. हालांकि, समय-समय पर संशोधन प्रस्तावित किए गए हैं, लेकिन संस्थान इन्हें अनिवार्य न होने के कारण नजरअंदाज कर देते हैं.
आधुनिक कृषि को लेकर नीतिगत खामियां शिक्षा प्रणाली से ही शुरू होती हैं.
जब 2019 में सिंह अपने गांव लौटे, तो उन्हें लगा कि वे किसानों के लिए “मसीहा” बन जाएंगे. उन्होंने ‘एग्री-मंत्र’ नाम के एक स्टार्टअप की स्थापना की, जिसका उद्देश्य छोटे और मध्यम जोत वाले किसानों को कृषि उपकरण सुलभ कराना था.
लेकिन बीते कुछ वर्षों में, वही किसान उन्हें आधुनिक तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, वैश्विक बाजार, नए बीज और जलवायु अनुकूलन रणनीतियों के बारे में सिखा रहे हैं.
अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (IFPRI) के वरिष्ठ शोधकर्ता अविनाश किशोर का कहना है कि भारतीय कृषि संस्थान “एक बंद दायरे” में फंसे हैं, जहां शिक्षक वही पढ़ा रहे हैं, जो उन्होंने दशकों पहले सीखा था.
हालांकि, अब चीजें बदल सकती हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने पाठ्यक्रम में व्यापक सुधार की सिफारिश की है, ताकि इसे आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जा सके.
नए सुधारों के तहत कौशल विकास पाठ्यक्रम, उद्यमिता के अवसर, और स्नातक स्तर पर अनिवार्य इंटर्नशिप जोड़ी जा रही हैं, जिससे छात्रों को प्रतिस्पर्धी नौकरी बाजार के लिए तैयार किया जा सके.
विशेषज्ञों का मानना है कि ये सुधार जलवायु परिवर्तन, जनसंख्या वृद्धि, मिट्टी की गिरती गुणवत्ता, तकनीकी प्रगति, और निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका जैसी चुनौतियों का समाधान करने में मदद कर सकते हैं.
किशोर ने कहा, “आज की स्थिति में, मैं कहूंगा कि किसी अच्छे विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र की डिग्री लेने वाला छात्र कृषि अर्थशास्त्र, सामाजिक विज्ञान और बाजार व्यवस्था के बारे में अधिक सीख रहा है, बनिस्बत कृषि विज्ञान के छात्र के.”
उन्होंने आगे बताया कि संस्थानों ने उपकरणों के मामले में प्रगति तो की है, लेकिन शिक्षण पद्धति में सुधार की जरूरत है.
उन्होंने कहा, “अधिकांश भारतीय कृषि संस्थान शिक्षा और अनुसंधान केंद्र दोनों हैं, जिनमें प्रयोग आधारित प्रणाली विकसित करने की अपार क्षमता है. लेकिन यह अब तक नहीं हो रहा.”
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कृषि शिक्षा की स्थिति
भारत में, नई दिल्ली का भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) सबसे बड़ा कृषि शिक्षा संस्थान है. यहां आधुनिक प्रयोगशालाएं, नए तकनीकी उपकरण और अच्छे कैंपस प्लेसमेंट की सुविधाएं हैं. लेकिन IARI के बाद के दूसरे संस्थान इसकी सुविधाओं और पाठ्यक्रम के स्तर तक नहीं पहुंच पाते, जिससे अच्छी कृषि शिक्षा सिर्फ इसी एक संस्थान तक सीमित रह गई है.
यह असमानता नवीनतम राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग रूपरेखा (NIRF) रैंकिंग में साफ झलकती है. ‘गुणवत्ता प्रकाशन’ पैरामीटर (40 अंकों का) में IARI को 38.69 अंक मिले हैं. इसे मंजूर किए गए पेटेंट के लिए 15 में से 10.50 अंक भी मिले.
तीसरे स्थान पर रही पंजाब कृषि विश्वविद्यालय को प्रकाशन गुणवत्ता के लिए केवल 29.87 अंक और पेटेंट मंजूरी के लिए 4.5 अंक मिले.
छोटे संस्थानों की स्थिति और भी खराब है. पश्चिम बंगाल के उत्तर बंग कृषि विश्वविद्यालय को प्रकाशन गुणवत्ता के लिए मात्र 5.87 और पेटेंट मंजूरी के लिए शून्य अंक मिले हैं.
डेटा से पता चलता है कि छात्र बेहतर शिक्षा के लिए तेजी से विदेश जा रहे हैं. फॉरेन एडमिट्स के अनुसार, 2020 के बाद से विदेशी विश्वविद्यालयों में कृषि पाठ्यक्रमों के लिए पूछताछ में प्रति वर्ष 30 प्रतिशत वृद्धि हुई है, जबकि 2023 में यह उछाल 75 प्रतिशत था.
कनाडा, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश एग्रीबिजनेस, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कोर्स के लिए डेस्टीनेशन बनते जा रहे हैं.
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टेक्स्टबुक्स की स्थिति और भी चिंताजनक है.
सिंह की पहली वर्ष की पाठ्यपुस्तक, 2015 की ‘प्रिंसिपल्स एंड एप्लिकेशन ऑफ एग्रीकल्चरल मेटियोरोलॉजी’, आधुनिक पूर्वानुमान तकनीकों को नजरअंदाज करती है और जलवायु परिवर्तन को संबोधित नहीं करती. इसमें ‘ऐल्टोस्ट्रेटस बादलों’ का उपयोग मानसून की भविष्यवाणी के लिए करने की बात कही गई है—जबकि भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, पिछले दस सालों से ये बादल गर्म जलवायु वाले इलाकों (उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों) में नहीं दिखे हैं.
अन्य किताबें, जैसे 1972 की ‘इंट्रोडक्शन टू प्लांट बायोकैमिस्ट्री’ (TW Goodwin) और 2004 की ‘इंट्रोडक्टरी सॉइल साइंस’ (DK Das), कृषि के एक बीते हुए दौर की निशानियां भर हैं.
आईसीएआर सुधार: भारतीय कृषि का आधुनिकीकरण
यमुना के बाढ़ क्षेत्र में, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के बीएससी कृषि के तीसरे साल के छात्र ध्रुव सिंह, जो कीटों, मिट्टी और कृषि रसायन के विशेषज्ञ हैं, मिट्टी पर एक लोहे की छड़ी घुमा रहे हैं. यह एक छोटे, पेजर जैसे उपकरण से जुड़ा है, जिसे उनकी कक्षा ने नमी और पोषक तत्वों की मात्रा का पता लगाने के लिए डिजाइन किया है.
“यह उपकरण किसानों को उनकी फसल लगाने से पहले मिट्टी की स्थिति का आकलन करने में मदद कर सकता है,” सिंह ने कहा. यह डिवाइस अभी परीक्षण चरण में है, लेकिन यह वही नवाचार है जिसे आईसीएआर के पाठ्यक्रम सुधार प्रोत्साहित करना चाहते हैं.
छठी डीन समिति की रिपोर्ट के तहत, आईसीएआर ने कौशल विकास पाठ्यक्रम पेश किए, इंटर्नशिप को अनिवार्य किया और कृषि पाठ्यक्रमों में मशीन लर्निंग, एआई और रोबोटिक्स को शामिल करने का प्रस्ताव दिया.
इसका मकसद रोजगार की संभावनाओं में सुधार, व्यावहारिक ज्ञान को बढ़ावा देने और उद्यमशीलता कौशल विकसित करना है.
रिपोर्ट जारी होने के बाद, कुछ छोटे संस्थानों ने पहले ही इन सिफारिशों को अपनाना शुरू कर दिया है.
जम्मू-कश्मीर का शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, आईसीएआर के संशोधित पाठ्यक्रम को अपनाने वाला पहला कृषि कॉलेज है. यह आधुनिक खेती पर केंद्रित नए विभाग शुरू करने की योजना बना रहा है और विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ आदान-प्रदान कार्यक्रमों की संभावनाएं तलाश रहा है.
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तेलंगाना के वारंगल में स्थित एसआर विश्वविद्यालय ने छात्रों को लचीलापन देने के लिए एक मल्टी-एंट्री और एग्जिट सिस्टम पेश किया है, साथ ही प्रयोगशालाओं का आधुनिकीकरण और डिजिटल संसाधनों को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया है.
“यह सुधार सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल में महत्वपूर्ण योगदान देगा, जिससे अगली पीढ़ी के कृषि नवप्रवर्तकों और नीति निर्माताओं को सशक्त बनाया जा सकेगा,” एसआर विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर के प्रमुख एम. मोहना कीर्ति ने कहा.
ग्रीन रिवोल्यूशन का शिक्षा पर प्रभाव
आईएआरआई के शोधकर्ताओं द्वारा 2021 में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि ज्यादातर कृषि संस्थान राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 का पालन नहीं करते. NEP का उद्देश्य शिक्षा प्रणाली में आधुनिक तरीकों को अपनाकर स्कूल और उच्च शिक्षा में सुधार करना है.
सटीक खेती, बिग डेटा एनालिटिक्स और जीन एडिटिंग जैसे विज्ञान में हुए नए विकास के बावजूद, ये विषय अधिकांश संस्थानों के पाठ्यक्रम में शामिल नहीं हैं.
अध्ययन में कहा गया, “कृषि विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के प्रशिक्षण आवश्यकताओं पर ध्यान नहीं दिया जाता, मूल्यांकन प्रणाली छात्रों की रचनात्मकता को बढ़ावा नहीं देती, और पाठ्यक्रम में विज्ञान में हुए नए विकास को शामिल नहीं किया जाता.”
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1947 से 1960 के बीच, भारत की खाद्य उत्पादन क्षमता बढ़ती जनसंख्या के लिए पर्याप्त नहीं थी. तब हर व्यक्ति के लिए प्रति दिन केवल 417 ग्राम भोजन उपलब्ध था, जिससे अकाल की स्थिति बन रही थी और किसान भारी कर्ज में थे.
इस चुनौती से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग शुरू हुआ और अधिक उपज देने वाली फसलों पर जोर दिया गया. इस परियोजना की सफलता ने भारत की कृषि नीतियों को प्रभावित किया, जिसमें शिक्षा और शोध के क्षेत्र में बदलाव हुए. लेकिन ग्रीन रिवोल्यूशन से जुड़े सुझाव केवल एक अस्थायी संकट के समाधान के लिए थे, न कि हमेशा के लिए कृषि नीति तय करने के लिए.
मुंबई स्थित ट्रेड मार्केट विश्लेषक और कृषि नीति विशेषज्ञ प्रद्युमन किशोरी ने कहा कि “आज कृषि केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बागवानी, वानिकी, लिंग-संबंधित पहलू, जल प्रबंधन और अन्य विषय भी शामिल हैं. लेकिन भारत में कृषि शिक्षा अभी भी एकतरफा दृष्टिकोण अपनाए हुए है.”
उन्होंने आगे कहा कि नए पाठ्यक्रम इस समस्या का समाधान कर सकते हैं.
कृषि विश्वविद्यालय: आधुनिक कृषि तकनीक अपनाएं
भारत के बड़े संस्थान नया रास्ता दिखा रहे हैं.
आईएआरआई करीब 800 तरह के कोर्स चलाता है, जिनमें छोटे जीवों का अध्ययन (सूक्ष्म जीवविज्ञान), आनुवंशिकी (जीन्स से जुड़ी पढ़ाई), फूलों की खेती (पुष्पकृषि), कंप्यूटर से जुड़ी जैविक जानकारी (जैव सूचना विज्ञान) और खेती से जुड़े आंकड़ों (कृषि सांख्यिकी) की पढ़ाई शामिल है.
“हम अपने पाठ्यक्रम को अपडेट करते समय छोटे विश्वविद्यालयों और संस्थानों के लिए एक उदाहरण पेश करने की कोशिश करते हैं, ताकि वे हमारे मॉडल को अपनाकर अपने पाठ्यक्रमों में सुधार कर सकें,” आईएआरआई के निदेशक एके सिंह ने कहा.
बेंगलुरु के यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज में सात स्नातक पाठ्यक्रम, 26 परास्नातक और 17 डॉक्टरेट कार्यक्रम उपलब्ध हैं, जो मधुमक्खी पालन, रेशम उत्पादन और जैविक खेती जैसे विशिष्ट विषयों को कवर करते हैं.
इस विश्वविद्यालय के 22 वर्षीय छात्र सेल्वराजू का कहना है कि कृषि वैज्ञानिकों द्वारा किया गया कार्य पूरे देश के लिए फायदेमंद है, लेकिन सरकारें उन्हें नए अवसर और प्रशिक्षण देने में असफल रही हैं.
उन्हें उम्मीद है कि पाठ्यक्रम सुधार छात्रों को आगे बढ़ने में मदद करेगा.
“ऐसा लग रहा था जैसे हमें नंगे पैर ओलंपिक दौड़ने के लिए धकेला जा रहा हो. लेकिन अब जब हमें जूते मिल गए हैं, तो शायद हम नया रिकॉर्ड बना सकें,” उन्होंने कहा.
भारतीय कृषि और शिक्षा पर प्रमुख प्रश्न
1. आज भारतीय कृषि में क्या ग़लत है?
भारत की कृषि को पुराने तरीके, कम उत्पादकता और मानसून पर अधिक निर्भरता जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. हालांकि, एक बड़ी अनदेखी समस्या भारतीय कृषि शिक्षा प्रणाली है, जो अक्सर आधुनिक खेती तकनीकों और टिकाऊ तरीकों से पीछे रह जाती है.
2. कृषि शिक्षा भारत में खेती के परिणामों को कैसे प्रभावित करती है?
पाठ्यक्रम आधुनिक विधियों, शोध-आधारित समाधानों या बाजार रणनीतियों को नहीं सिखाते, तो किसान उन नवाचारों से वंचित रह जाते हैं जो उत्पादन बढ़ा सकते हैं, कृषि जोखिम कम कर सकते हैं और लाभ में सुधार कर सकते हैं. यह अंतर कम उत्पादकता के चक्र को बनाए रखता है और किसानों को नए बाजारों और तकनीकों तक पहुंचने से रोकता है.
3. भारतीय कृषि शिक्षा पुरानी क्यों हो गई है?
4. कृषि संस्थानों के लिए आईसीएआर की नई सिफारिशें क्या हैं?
आईसीएआर ने पाठ्यक्रम में जलवायु-अनुकूल खेती, जैव प्रौद्योगिकी और कृषि व्यवसाय प्रबंधन पर पाठ्यक्रम शामिल करने के लिए संशोधन का प्रस्ताव दिया है. इन परिवर्तनों का उद्देश्य स्नातकों को उद्योग की बदलती मांगों और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए अधिक सक्षम बनाना है.
5. भारत में कौन से विश्वविद्यालय आधुनिक कृषि पाठ्यक्रम प्रदान करते हैं?
तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय (TNAU), पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) और कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, बेंगलुरु जैसे संस्थानों ने आधुनिक जरूरतों के हिसाब से खुद को ढालना शुरू कर दिया है. वे टिकाऊ कृषि, सटीक खेती और कृषि-तकनीक नवाचार पर विशेष पाठ्यक्रम प्रदान करते हैं.
6. क्या पाठ्यक्रम सुधार से भारत का कृषि उत्पादन बेहतर हो सकता है?
हां, पाठ्यक्रम को समकालीन प्रथाओं को शामिल करने के लिए अपडेट करने से भविष्य के कृषिविदों को मिट्टी के क्षरण, जल प्रबंधन और बाजार तक पहुंच जैसे मुद्दों को संबोधित करने के लिए उपकरण मिल सकते हैं. यह ज्ञान सीधे अधिक कुशल और टिकाऊ कृषि प्रथाओं में तब्दील हो सकता है.
7. भारतीय कृषि शिक्षा सुधार में नीति निर्माताओं की क्या भूमिका है?
नीति निर्माता वित्तपोषण, शोध प्राथमिकताओं और विश्वविद्यालय के अधिदेशों को प्रभावित करते हैं. पाठ्यक्रम सुधारों को लागू करने, सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देने और कृषि समुदायों में ज्ञान प्रसार को बढ़ावा देने के लिए उनका समर्थन महत्वपूर्ण है.
8. भारत कृषि आधुनिकीकरण और पारंपरिक ज्ञान में संतुलन कैसे बना सकता है?
पारंपरिक प्रथाओं को आधुनिक नवाचारों के साथ मिलाना महत्वपूर्ण है. कृषि विश्वविद्यालयों को ऐसे शोध को बढ़ावा देना चाहिए जो सिंचाई, फसल सुधार और बाजार पूर्वानुमान जैसी नई तकनीकों को जोड़ते हुए पारंपरिक खेती के तरीकों को बेहतर बनाएं, ताकि खेती अधिक संतुलित और लचीली हो सके.
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