मेरठ (उप्र), 30 सितंबर (भाषा) हांगझोउ एशियाई खेलों में भारत का एथलेटिक्स में खाता खोलने वाली गोला फेंक एथलीट किरण बालियान की मां चाहती हैं कि उनकी बेटी जल्द ही ओलंपिक में खेले और पदक जीतकर देश का नाम रोशन करे।
किरण शुक्रवार को एथलेटिक्स प्रतियोगिता के शुरुआती दिन कांस्य पदक जीतकर 72 वर्षों में एशियाई खेलों की गोला फेंक स्पर्धा में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला एथलीट बन गयीं।
किरण (24 वर्ष) ने दिन के अपने सर्वश्रेष्ठ तीसरे प्रयास में 17.36 मीटर दूर गोला फेंका। इस उपलब्धि के बाद किरण के मेरठ स्थित घर में उत्सव का माहौल है और उनकी मां बॉबी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘हमारा सपना है कि बेटी जल्दी से ओलंपिक में खेले और देश का नाम रोशन करे, ताकि हमारी तपस्या सफल हो जाए। ’’
किरण की मां ने कहा, ‘‘बेटी की इस कामयाबी का पता परिवार को टीवी देखने के बाद लगा। इसके बाद खुद किरण ने घर पर फोन करके अपनी उपलब्धि की जानकारी दी। ’’
किरण एशियाई खेलों में महिलाओं की गोला फेंक स्पर्धा में बारबरा वेबस्टर के बाद पदक जीतने वाली दूसरी भारतीय बन गयीं। मुंबई की एंग्लो-इंडियन बारबरा ने 1951 में नयी दिल्ली में एशियाड के पहले चरण में कांस्य पदक जीता था।
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले की पुरबालियान गांव की निवासी किरण मेरठ के एकता नगर में रहती हैं और पिछले साल खेल कोटे से उनका चयन राजस्थान पुलिस की ‘आइबी’ में इंस्पेक्टर पद पर हुआ।
उन्होंने कहा कि उनकी बेटी की कामयाबी में उनके पति (किरण के पिता) का बहुत योगदान रहा जिन्होंने परिवार और समाज की बातों की परवाह नहीं की।
किरण शॉट पुट में राष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीत चुकी हैं। उनके पिता सतीश बालियान पीएसी गाजियाबाद में तैनात हैं। किरण ने मेरठ में कोच रोबिन के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण लिया है।
इस गोला फेंक एथलीट की मां ने कहा, ‘‘परिवार और समाज के लोग किरण के खेल के खिलाफ थे और वे लोग किरण के पिता को भी कहा करते थे कि बेटी को इन खेल-वेल के पचड़ों में ना डालो। लेकिन उन्होंने कभी उनकी परवाह नहीं की। ’’
बॉबी ने कहा, ‘‘उनका (उनके पिता) बस यही लक्ष्य रहा कि बेटी खेल के मैदान में कामयाबी हासिल कर पूरी दुनिया में देश का नाम करे। हमारी आर्थिक हालत कोई अच्छी नहीं थी, लेकिन फिर भी हमने अपनी बेटी के सपनों को पूरा करने में कोई कमी नहीं आने दी। ’’
किरण को यहां तक पहुंचाने में उनकी मां का भी बहुत योगदान रहा है जो उनके साथ रोज स्टेडियम जाती और महिला ट्रेनर के नहीं होने पर खुद ही स्ट्रेचिंग करवाती थीं। बॉबी केवल बेटी को व्यायाम नहीं करातीं, बल्कि वीडियो बनाकर उनकी गलतियां भी बताती थीं।
इस खिलाड़ी की मां ने कहा, ‘‘असुरक्षा जैसी अड़चनों से निपटने के लिए मैं रोजाना स्कूटी पर किरण के साथ स्टेडियम जाती थीं। हम सुबह सवा छह से आठ बजे तक स्टेडियम में रहते थे। इसके बाद शाम चार से साढ़े छह बजे तक फिर अभ्यास के लिए स्टेडियम जाते थे। ’’
आठवीं पास बॉबी का कभी खेलों से ताल्लुक नहीं रहा, लेकिन बेटी के साथ आते-आते वह मंझे हुए कोच की तरह बन गयी। उन्होंने कहा, ‘‘महिला ट्रेनर नहीं होने की वजह से किरण को स्ट्रेचिंग करने, अभ्यास करने में दिक्कत आती थी, इसमें लड़कों की मदद नहीं ले सकते थे इसलिए मैं ये सब खुद ही करवाती थी। ’’
बेटी के साथ रोजाना स्टेडियम जाकर बॉबी इस खेल की सभी बारीकियों को समझ चुकी हैं।
जिला एथलेटिक्स संघ के पदाधिकारियों के अलावा क्षेत्रीय क्रीड़ा अधिकारी योगेन्द्र पाल सिंह ने भी किरण को बधाई दी।
भाषा सं. आनन्द नमिता आनन्द
आनन्द
यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.