नयी दिल्ली, 10 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि हिरासत में लेकर पूछताछ या जांच अन्वेषण एजेंसियों के हित में सबसे महत्वपूर्ण अधिकार है और किसी आरोपी को अपने आचरण से न्यायिक प्रक्रिया को विफल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
शीर्ष अदालत ने पिछले साल सितंबर में कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दायर अपील पर यह फैसला सुनाया। सीबीआई ने उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें दंड प्रक्रिया संहित (सीआरपीसी) की धारा- 167(2) के तहत आरोपी को कानूनी व स्वत: जमानत के तहत रिहा करने को कहा गया था।
न्यायमूर्ति एम आर शाह और न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार की पीठ ने विशेष न्यायाधीश द्वारा 16 अप्रैल 2021 को पारित आदेश के आधार पर सीबीआई को आरोपी की चार दिन की हिरासत लेने की अनुमति दे दी। विशेष न्यायाधीश ने सीबीआई को आरोपी की सात दिन की हिरासत दी थी लेकिन वह ढाई दिन ही पूछताछ कर सकी और पूरे सात दिन पूछताछ करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकी।
शीर्ष अदालत ने मामले से जुड़े तथ्यों को ‘बहुत ही स्पष्ट’ करार देते हुए कहा कि विशेष न्यायाधीश द्वारा 16 अप्रैल 2021 को आरोपी की सात दिन की हिरासत पुलिस (सीबीआई) को दी गई थी जबकि आरोपी 18 अप्रैल 2021 को अस्पताल में भर्ती हो गया और 21 अप्रैल 2021 को अंतरिम जमानत ले ली जिसका विस्तार आठ दिसंबर 2021 तक हो गया।
अदालत ने रेखांकित किया कि अंतरिम जमानत विशेष न्यायाधीश ने तब रद्द की जब पाया कि आरोपी उसे दी गई आजादी का दुरुपयोग कर रहा है और जांच एजेंसी से सहयोग नहीं कर रहा है।
पीठ ने कहा कि आरोपी ने विशेष न्यायाधीश द्वारा दी गई पुलिस हिरासत के पूर्ण अनुपालन से ‘सफलतापूर्वक बचा’।
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘ किसी भी आरोपी को जांच प्रक्रिया या अदालत प्रक्रिया से खेलने की अनुमति नहीं दी जा सकती। किसी भी आरोपी को अपने आचरण के जरिये न्यायिक प्रक्रिया को असफल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।’’
पीठ ने कहा, ‘‘ इसमें कोई विवाद नहीं हो सकता है कि हिरासत में लेकर पूछताछ या जांच का अधिकार सच्चाई सामने लाने के लिए जांच एजेंसियों के हित में महत्वपूर्ण अधिकार है, जिसे आरोपी ने जानबूझकर और सफलतापूर्वक निष्फल किया।’’
शीर्ष अदालत ने कहा कि यह सच है कि अनुपम जे कुलकर्णी मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि गिरफ्तारी के दिन से पुलिस हिरासत 15 दिन से अधिक नहीं होनी चाहिए।
पीठ ने कहा, ‘‘हमारी राय है कि अनुपम जे कुलकर्णी मामले में इस अदालत ने जो रुख अपनाया, उस पर पुनर्विचार करने की जरूरत है।’’
भाषा धीरज माधव
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