जयपुर, सात अप्रैल (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को कहा कि देश के दक्षिण प्रांतों में हिंदू आध्यात्मिक गुरुओं द्वारा किए गए समाज सेवा कार्य मिशनरियों के काम की तुलना में कहीं अधिक हैं। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि यह कोई स्पर्धा की बात नहीं है।
भागवत जयपुर के जामडोली में केशव विद्यापीठ में राष्ट्रीय सेवा भारती के सेवा संगम के उद्घाटन कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि समाज सेवा कार्यों की बात आने पर देश के प्रबुद्धजन आमतौर पर (ईसाई) मिशनरियों की बात करते हैं।
उन्होंने कहा, “समाज सेवा की बात आने पर देश के प्रबुद्धजन सामान्यतः मिशनरियों का नाम लेते हैं। दुनिया भर में मिशनरी अनेक स्कूल, अनेक अस्पताल चलाते हैं यह सबको पता है। हिंदू समाज के संत-सन्यासी भी ऐसा कर रहे हैं। इसी सोच के साथ चेन्नई में हिंदू सेवा मेले का आयोजन किया गया। दक्षिण के कन्नड़-भाषी, तेलुगु-भाषी, मलयालम-भाषी और तमिल-भाषी चार क्षेत्रों में … केवल आध्यात्मिक क्षेत्र के हमारे आचार्य मुनि, सन्यासी सब मिलाकर जो सेवा करते हैं वह मिशनरियों के सेवा कार्यों से कई गुणा ज्यादा है।”
भागवत ने आगे कहा, “मैं स्पर्धा की बात नहीं कर रहा। उनसे ज्यादा, उनसे कम, यह मेरा पैमाना नहीं है। यह सेवा का पैमाना हो ही नहीं सकता।”
उन्होंने कहा कि सेवा से स्वस्थ समाज बनता है लेकिन स्वस्थ समाज तैयार करने से पहले वह पहले हमें स्वस्थ करती है।
भागवत ने कहा, “सेवा मनुष्य के मनुष्यत्व की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।”
इसके साथ ही भागवत ने समाज के पिछड़े वर्ग पर जोर देते हुए कहा कि हमें सबको समान मानकर इस पिछड़ने को दूर करना होगा।
समाज में व्याप्त पिछड़ेपन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘ हमारे समाज का केवल एक वर्ग पिछड़ा नहीं है बल्कि उसके कारण हम सब लोग पिछड़ गए हैं। हमें यह पिछड़ापन दूर करना है। हमें सभी को समान, अपने जैसा मानकर सेवा के माध्यम से उन्हें अपने जैसा बनाना है। हम इसके लिए संकल्प ले सकते हैं, सेवा कर सकते हैं।’’
भागवत ने कहा,‘‘ हम सभी से मिलकर समाज बना है। यदि हम एक नहीं रहेंगे तो हम अधूरे हो जाएंगे। सबसे साथ मिलकर रहने से हम पूर्ण बनेंगे। लेकिन दुर्भाग्य से यह विषमता आई है। हमको यह विषमता नहीं चाहिए।’’
उन्होंने कहा कि हमारे देश में एक घुमंतू समाज है, जिसने देश की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी। वो झुका नहीं। घुमंतू समाज के लोग कहीं न कहीं घूमते रहते हैं। अंग्रेजी शासकों ने उनकी पहचान मिटा दी। दुर्भाग्यवश स्वतंत्रता के बाद भी उनकी वही स्थिति रही। उनके पास कोई मतदात पहचान पत्र नहीं है, राशन कार्ड नहीं और अधिवास प्रमाण पत्र भी नहीं है। संघ के सेवा कार्य वहां भी जारी हैं।
इससे पहले वाल्मीकि धाम उज्जैन के पीठाधीश्वर संत बालयोगी उमेशनाथ महाराज ने कहा कि हमारे ऋषि, मुनियों व संतों महात्माओं ने इस देश को बंटने से रोका, अलगाव से रोका और इस सनातन धर्म की मजबूती को बनाए रखा।
उन्होंने कहा, “लेकिन हमारा दुर्भाग्य यह रहा कि हमारे ही देश के कुछ घुसपैठियों के कारण इस देश में शंख और घड़ी व घंटालों नगाड़ों की आवाज बंद हो गई। सुबह से लेकर शाम तक पांच बार की नमाज की आवाजें लाउडस्पीकर के जरिए हमारे काम को बाधित करने लगीं।”
समाज से छुआछूत व ऊंच नीच की भावना को खत्म करने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि यह भावना खत्म नहीं होने की वजह से ही इस देश में ‘लव जिहाद’ आया है। वह खत्म नहीं होने की वजह से आज के कॉलेज जाने वाले लड़के और लड़कियां प्रेम विवाह के लिए तैयार हैं। इसलिए आज समाज के जितने भी रूढिवादी लोग हैं वे रूढिवादिता को खत्म करके समाज को गले लगाने का काम करें।
बाद में भागवत ने अपने उद्बोधन में संत उमेशनाथ के संबोधन की ओर इशारा किया।
उन्होंने कहा, “महाराज जी ने जो कहा है, एक एक बात, बहुत स्पष्ट कही है। आपको क्या लगा मुझे पता नहीं … लेकिन उन्होंने जो कहा एक एक बात सत्य है। इन बातों पर आज नहीं तो कल हमें अमल करना ही पड़ेगा। हम प्रयास कर रहे हैं कि ऐसा आज ही हो जाए क्योंकि यही स्वस्थ समाज का लक्षण है।”
हालांकि, भागवत ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वह संत उमेश नाथ महाराज के भाषण के किस हिस्से का समर्थन कर रहे हैं।
कार्यक्रम में पीरामल समूह के चेयरमैन अजय पीरामल मुख्य अतिथि थे। सेवा भारती के इस तीन दिवसीय संगम में देश भर से 800 से अधिक स्वैच्छिक सेवा संगठनों के हजारों प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं।
भाषा पृथ्वी कुंज
जोहेब
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