बंबई के जेवियर कॉलेज में 24 जनवरी, 1954 को आयोजित अखिल भारतीय साईं भक्त सम्मेलन में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने, एम.एस. पीएच-डी., बार-ऐट-लॉ द्वारा दिया गया उद्घाटन भाषण, उन्होंने कहा—
आपको सम्बोधित करने के लिए मुझे जो निमंत्रण दिया गया उसके लिए आप सबको बहुत-बहुत धन्यवाद. मैं इसके योग्य नहीं हूं. मैं उन लोगों में से नहीं हूं जो साईं बाबा के भक्तों के रूप में जाने जाते हैं. साईं बाबा से मिले या उनके दर्शन करने का मेरा सौभाग्य नहीं रहा. मैंने केवल उनके बारे में सुना है, यह ज़्यादा अच्छा होता यदि इस अवसर पर किसी ऐसे व्यक्ति को बोलने के लिए आमंत्रित किया गया होता जो उन्हें मुझसे बेहतर जानता होता, लेकिन चूंकि जो लोग मुझे निमंत्रित करने आए थे वे बार-बार कह रहे थे कि मुझे बुलाने का निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया है, इसलिए ‘ना’ कहना आसान नहीं था.
हालांकि, मेरे स्वास्थ्य की वर्तमान स्थिति को देखते हुए मैं आसानी से मना कर सकता था. जैसा कि मैंने पहले कहा, साईं बाबा के बारे में मेरा ज्ञान शून्य है और जो भी थोड़ा-बहुत मैं जानता हूं, वह उनके बारे में लोगों से सुनी हुई बातें हैं. कुछ समय पहले बाबा की मृत्यु हो गई है और मैं समझता हूं कि बाबा अपने पीछे अनुयायियों की जमात छोड़ गए हैं, जिनकी संख्या में बाबा की मृत्यु के बाद भी लगातार वृद्धि हो रही है. वह कई लोगों के धर्म गुरु के रूप में जाने जाते हैं.
भारत में धर्म ने कई तरह के रूप-रंग अख्तियार कर लिये हैं. अपने मूल रूप से धर्म व्यक्ति की आत्मा के मोक्ष का निजी मामला था. बाद में धार्मिक दृष्टिकोण एवं उद्देश्यों में काफ़ी परिवर्तन हुआ. अब इसके मायने केवल आत्मा का उद्धार न होकर उस मानवीय भाईचारे को कायम करना भी हो गया, जिसका आधार पारम्परिक रूप से मनुष्यों को नियंत्रित करनेवाले नैतिक नियम है. तब वह तीसरा चरण आया, जिसमें मनुष्य उन व्यक्तियों की आराधना करने के लिए प्रेरित हुए जो उनके जीवन के अभावों की तुष्टि करते थे. किसी को बच्चे चाहिए थे, किसी को सोना चाहिए था, कुछ थे जिन्हें मुसीबतों से छुटकारा चाहिए था. यदि कोई व्यक्ति लोगों की इन भौतिक आवश्यकताओं को पूरा कर देता था तो वह उनका ईश्वर बन जाता और वे उसकी आराधना करने लगते.
फिर आया चौथा दौर, जिसमें उस व्यक्ति की पूजा हुई जो किसी तरह का चमत्कार दिखा सकता हो, ऐसा चमत्कार जो जन-साधारण के ज्ञान के परे हो. और इस तरह का चमत्कार करनेवाले ईश्वर बन गए. यह सब हमें भारत में मिलता है. आज भारत में ऐसा कोई धर्म नहीं है, जिसमें मूर्तियों, साधुओं, संतों और चमत्कार दिखानेवालों की उपासना न होती हो. आज के हमारे धर्म में न तो ईश्वर है और न ही नैतिकता. मुझे कोई संदेह नहीं है कि यह स्थिति मानव-मस्तिष्क की पतित स्थिति है और आने वाली पीढ़ियों के लिए यह एक ज़िम्मेदारी है कि वे धर्म को उसके शुद्ध और दयालु स्थिति में वापस ले आएं.
इस बीच हमें तथ्यों को उस रूप में दृष्टिगत करना होगा जैसे वे हैं. हम धर्म के मामले में केवल भटक ही नहीं गए हैं, बल्कि धर्म के नाम पर पैसा उगाह कर उसे ऐसी चीज़ों के लिए बर्बाद करना एक व्यवसाय बन गया है, जिसका कोई सामाजिक स्पष्टीकरण नहीं है. संसार में इतनी निर्धनता, इतना दुख है कि धर्म के नाम पर पैसा इकट्ठा करना और उसे ब्राह्मणों एवं तीर्थ यात्रियों को खिलाकर बर्बाद करना अपराध है.
बुद्ध ने इस प्रश्न पर भली-भाँति विचार किया है. अपनी नैतिक संहिता में बुद्ध ने पंचशील, अष्टांग मार्ग और निब्बान का उपदेश दिया. लेकिन इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने अनुयायियों को दस गुण विकसित करने की भी शिक्षा दी—(1) प्रज्ञा, (2) शील, (3) नेखम्म, (4) दान, (5) वीर्य, (6) खन्ति, (7) सच्च, (8) अधित्थान, (9) मैत्री, (10) उपेक्खा.
प्रज्ञा का अर्थ है बुद्धि, ज्ञान का वह प्रकाश जो अज्ञान या अविद्या का अन्धकार समाप्त करती है, मोह नव-विज्ञान है. शील का अर्थ नैतिक स्वभाव है, अच्छा होने का और बुरा न करने का स्वभाव. नेखम्म सांसारिक सुखों का परित्याग करता है. दान का अर्थ बिना कुछ पाने की इच्छा किये अपनी समस्त भौतिक उपलब्धियों से लेकर शरीर एवं जीवन का दान कर देना. वीर्य का अर्थ है सच्चा प्रयत्न—पीछे हटने के बारे में सोचे बिना जो कुछ भी आपने करने का जिम्मा लिया है, उसको अपनी पूरी शक्ति से करना. खन्ति का आशय है सहिष्णुता, घृणा का उत्तर घृणा से न देना. सच्च है सत्य, किसी व्यक्ति को कभी भी झूठ नहीं बोलना चाहिए जो वह कहता है वह केवल सत्य होना चाहिए, सत्य के सिवाय कुछ भी नहीं. अधित्थान का तात्पर्य लक्ष्य प्राप्त करने का दृढ़ निश्चय है. मैत्री का तात्पर्य है सभी जीवों से प्रेम करना, केवल मित्रों से ही नहीं, बल्कि शत्रुओं से भी, केवल मनुष्यों से नहीं, बल्कि सभी जीवों से. उपेक्खा का अर्थ वैराग्य है जो कि उदासीनता से अलग है. इसका अर्थ है मन की वह दशा, जिसमें न तो आसक्ति है और न विरक्ति, परिणामों से अविचलित रहकर कार्य साधना में लीन रहना. इसलिए पालि साहित्य में उन्हें पारमिताएं कहा जाता है.
भले ही बुद्ध ने दान पारमिता का उपदेश दिया था, किन्तु उन्होंने ख़ासतौर पर यह उल्लेख किया है कि दान सुपात्र को ही किया जाना चाहिए. दान देते समय यह दाता को जब श्रेष्ठ बनाती हो तो पानेवाले को यह पतित न करती हो. दान उन लोगों को दी गई सहायता है, जो गिर गए हैं ताकि वे जीवन के मार्ग पर स्वावलंबित होकर चल सकें.
यदि आपने उस संत के नाम पर पैसा इकट्ठा किया है, जिनका आप सम्मान करते हैं तो आपको यह पैसा ऐसे कार्यों में लगाना चाहिए जो पारमिताओं में बताए गए हैं. संसार में इतना दुख, इतनी अज्ञानता और इतने कष्ट हैं कि जैसा कि मैंने कहा, सम्पन्न लोगों को खिलाने के लिए इसका प्रयोग करना निर्दयता होगा.
इस तरह के दान स्वरूप प्राप्त धन का प्रयोग अस्पतालों के लिए, शिक्षा के लिए, छोटे-छोटे उद्योग लगाने के लिए जिससे बेसहारा लोगों, विधवाओं को काम मिल सके, के लिए किया जाना चाहिए. अगर आप लोग मेरे विचारों से सहमत हैं तो इसके अतिरिक्त भी कई उदाहरण हैं जिनका अनुसरण आप कर सकते हैं, आपको बस व्यावहारिक उदाहरणों के लिए अपने आसपास देखने की आवश्यकता भर है.
मुझे याद है कि मैंने आप लोगों के चिन्तन के लिए कुछ विचार दे दिये हैं. यदि आपने पैसा एकत्रित किया है तो इसका प्रयोग वैसे ही करें जैसा मैंने बताया है. इससे आपका ही भला होगा, इसमें साईं बाबा का नाम भी उज्ज्वल होगा.
आपके बनाए विहार में बुद्ध की प्रतिमा की स्थापना कीजिए
पुणे ज़िले के देहू रोड इलाक़े में संत चोखोबाराय और बुद्ध वाचनालय बनाया जा रहा है. इस विहार के लिए आज तक कुल 1200 रु. इकट्ठे हुए हैं. इस रकम में विहार का कलश और आधे से अधिक कामकाज होना है. इस विहार में मूर्ति की स्थापना करने के लिए डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर लोणावला आए थे. उस वक्त मन्दिर के कुछ सदस्यों ने उनसे मुलाक़ात की. इस अवसर पर डॉ. बाबासाहेब ने बौद्ध धर्म के बारे में विस्तार से जानकारी दी. बौद्ध धर्म के प्रसार की बेहद ज़रूरत है यह लोगों को समझाते हुए कहा—
आपने चोखोबाराय का मन्दिर बनाया है. उन चोखोबा की जो अपने जीवनकाल में कुछ कर नहीं पाए थे, जिनका रूप आपमें से किसी ने देखा नहीं है. ऐसे चोखोबा के बारे में आस्था रखना हित में नहीं है. इसलिए हम अब जिस भावना से प्रेरित हुए हैं, उस भावना को आज के युग में पैरों तले रौंद नहीं सकते.
अपने कार्य का एक हिस्सा अगर मैं इस बात के लिए रखता तो इस बात के लिए लोगों में आदर पैदा होता और मेरे उद्देश्य की बातें दुनिया भर में फैलतीं. लेकिन मेरे साथ कई काम जुड़े हुए हैं, सो मैं इस काम के लिए थोड़ा समय भी नहीं दे पाया.
धर्म, प्रचलित रूढ़ियों की शिकार दलित जनता अन्धविश्वास के कारण अधोगति को प्राप्त हुई है. हिन्दू धर्म के तैंतीस करोड़ देवताओं की पूजा करते हुए हज़ारों बारिश उन्होंने झेलीं. धर्म के प्रति गर्व के कारण आज तक यह भोली जनता उसी बात का पालन करती आई है. लेकिन सत्य, अहिंसा, परोपकार के त्रिवेणी संगम का झरना बहानेवाली नदी पर शंकराचार्य ने बाँध बनाया. और आज वही नदी समंदर बन गई है.
उस समंदर में कुछ अन्धभक्त लोग पूजनीय भावना मन में लिए स्नान कर अपने पापों का क्षालन कर रहे हैं. जिस धर्म में इंसानियत नहीं, उस धर्म के भगवान के बारे में भी अपनापन महसूस होना ठीक नहीं. इसलिए अब से आगे हमें अलग भाव से या उद्देश्य से अगले कार्य की रूपरेखा बनानी होगी. इसीलिए मुझे आपको यह सलाह देने का मन हो रहा है कि आपके बनाए मन्दिर में आप बुद्ध की मूर्ति की स्थापना कीजिए.
आख़िर विहार समिति द्वारा मूर्ति की स्थापना डॉ. बाबासाहेब के ही हाथों करने की इच्छा उनके सामने प्रकट की. तब मूर्ति की स्थापना के लिए उपस्थित रहने का आश्वासन उन्होंने दिया. साथ ही अपने मित्र से बुद्ध मूर्ति दिलाने का भी वचन दिया.
