नागपुर, 21 मार्च (भाषा) केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने मंगलवार को कहा कि सामाजिक एवं आर्थिक समानता लाना सरकार का प्रमुख लक्ष्य है और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ दुनिया में सभी के लिए समान विकास को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता का संकेत देता है।
उन्होंने कहा कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’, भारत की जी20 अध्यक्षता के एक शक्तिशाली संदेश का प्रतीक है।
गडकरी महाराष्ट्र के नागपुर में आयोजित ‘सिविल 20 इंडिया’ (सी-20) सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे।
सी-20, जी-20 के आधिकारिक समूहों में से एक है जो जी-20 के वैश्विक नेताओं तक अपनी बात पहुंचाने के दुनिया भर के नागरिक समाज संगठनों को एक मंच प्रदान करता है।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि मूल्य आधारित शिक्षा और मूल्य आधारित परिवार व्यवस्था भारत की सबसे बड़ी शक्ति है। उन्होंने कहा कि अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना और उसके जीवन को सार्थक बनाना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
इससे पहले दिन में, सम्मेलन के दूसरे दिन दुनिया में, विशेष तौर पर उप सहारा अफ्रीका में बढ़ती असमानताओं पर चर्चा हुई।
उप-सहारा अफ्रीका में बड़ी संख्या में स्कूली शिक्षा से वंचित बच्चे मजदूरी करने को मजबूर हैं।
सम्मेलन का विषय ‘नागरिक समाज संगठन और मानव मूल्यों का संवर्धन’ था।
‘100 मिलियन अभियान’ के वैश्विक निदेशक ओवेन जेम्स ने एक सरकारी विज्ञप्ति में कहा कि 2015 के बाद से 2.15 डॉलर प्रति दिन से कम पर गुजारा करने वाले उप-सहारा अफ्रीकियों की संख्या में वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि उप-सहारा अफ्रीका में बाल श्रम और स्कूली शिक्षा से वंचित बच्चों की संख्या भी बढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि महाद्वीप में बेहतरीन प्राकृतिक संसाधन हैं, लेकिन अभी भी अविकसित है क्योंकि मुनाफे को दूसरी जगह स्थानांतरित किया जा रहा है।
विज्ञप्ति के मुताबिक, बैठक में ‘‘सेवा की भावना, परोपकार और स्वयंसेवा, वसुधैव कुटुम्बकम-विश्व एक परिवार है, विविधता, समावेशन, पारस्परिक सम्मान और मानव अधिकारों पर चर्चा की गई।’’
‘सेवा इंटरनेशनल’ के वैश्विक समन्वयक श्याम परांडे ने कहा कि सम्मेलन में भाग लेने वालों को गौतम बुद्ध के ‘‘अप्पो दीप भव (स्वयं प्रकाश बनो)’’ के संदेश का अनुसरण करना चलना चाहिए।
परांडे ने कहा, ‘‘भारत में मूल्यों का एक लंबा इतिहास रहा है और ये भारतीय मूल्य वैश्विक मूल्यों से मेल खाते हैं।’’
‘भारतीय सामाजिक उत्तरदायित्व नेटवर्क’ के सीईओ संतोष गुप्ता ने कहा, ‘‘जब हम सेवा करते हैं, तो हमारी आत्मा में यह भावना होती है कि हमें किस वजह के लिए काम करना चाहिए। स्वयंसेवा और परोपकार से बेहतर है सेवा और इसे (सेवा को) दुनिया के प्रमुख धर्मों में परिभाषित किया गया है।’’
भाषा शफीक पवनेश
पवनेश
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