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Tuesday, 28 April, 2026
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मेरी यात्रा अभी शुरू हुई है : हरिप्रसाद चौरसिया

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(मनीष सैन)

नयी दिल्ली, 22 फरवरी (भाषा) देश में सुविख्यात बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया का कहना है, ‘‘मैंने अभी सीखना शुरू किया है।’’

जीवन यात्रा के बारे में पूछे जाने पर चौरसिया (84) का कहना है कि उनकी यात्रा अभी शुरू हुई है और इस कला में महारत हासिल करने की सभी उम्मीदें अगले जन्म में ही पूरी हो सकती हैं।

चौरसिया ने ‘पीटीआई-भाषा’ को एक साक्षात्कार में कहा, ‘‘अब मैं यही उम्मीद कर सकता हूं कि अगले जन्म में कुछ हो। लेकिन मैं खुश हूं कि दुनिया भर में इतने सारे लोग मुझे इतना प्यार देते हैं।’’

शास्त्रीय और लोकप्रिय संगीत दोनों विधा में संतुलन बनाने वाले चौरसिया चौरसिया दर्शकों से मिलने वाली प्रशंसा के लिए उनका आभार जताते हैं। उन्होंने प्रसिद्ध संतूर वादक शिवकुमार शर्मा के साथ ‘‘शिव-हरि’’ की जोड़ी बनानकर ‘‘सिलसिला’’ जैसी कई फिल्मों के लिए लोकप्रिय धुन बनायी थी।

उन्होंने अपनी उम्र और पार्किंसंस रोग के साथ संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा, ‘‘आज वे (प्रशंसक) मुझसे मिलने आते हैं, चाहे मैं कितना ही अच्छा या कितना ही बुरा बांसुरी क्यों न बजाऊं। यह मेरे लिए उनका प्यार है जो उन्हें यहां लाता है।’’

मुंबई में रहने वाले संगीतकार ने कहा, ‘‘मैं बहुत खुशकिस्मत हूं कि मुझे इतना प्यार मिलता है, पता नहीं किसी और को इतना प्यार मिला है या नहीं। मैं कृष्ण को जानता हूं, लेकिन उन्हें सिर्फ लड़कियां ही प्यार करती थीं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मेरे पिता मुझसे कहा करते थे कि अगर मैं इसी रास्ते पर चलता रहा तो मेरी हालत भीख मांगने वाली होगी। लेकिन देखिए आज मैं कहां हूं और मुझे लोगों का कितना प्यार मिलता है। क्या यह संभव हो सकता था अगर मैं कुश्ती के क्षेत्र में बना रहता?’’

चौरसिया का जन्म 1938 में इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ। चौरसिया के पिता ने फैसला किया था कि उनका बेटा कुश्ती में उनके नक्शेकदम पर चलेगा। हालांकि, चौरसिया के दिमाग में कुछ अन्य चीजें थीं।

उन्होंने 15 साल की उम्र में पड़ोस के राजा राम नामक एक शास्त्रीय गायक से गुप्त रूप से प्रशिक्षण लेना शुरू किया। जल्द ही उन्हें बांसुरी की तरफ लगाव महसूस हुआ।

संगीतकार ने कई पुरस्कारों और सम्मानों जैसे संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्म विभूषण, पद्म भूषण और नीदरलैंड सरकार से ‘ऑफिसर इन द ऑर्डर ऑफ ऑरेंज-नासाउ’ की उपाधि के माध्यम से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान प्राप्त की। चौरसिया को फ्रांस द्वारा ‘नाइट इन द ऑर्डर ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स’ भी नियुक्त किया गया था।

शिव-हरि नाम से संगीतकार जोड़ी ने चांदनी (1989), लम्हे (1991), डर (1993) जैसी कई फिल्मों में यादगार संगीत दिया। आज के संगीत के दौर पर चौरसिया ने कहा, ‘‘ऐसा कहने के लिए मुझे माफ करें लेकिन आज की फिल्में और संगीत लोगों को छू नहीं पाते। क्या वे आज ‘मुगल-ए-आजम’ बना सकते हैं, या ‘अनारकली’, या ‘बैजू बावरा’? ऐसा सिनेमा बनाने की क्षमता किसी में नहीं है। आज वे दो घंटे चर्चा करते हैं और एक दिन में फिल्म बना लेते हैं।’’

भाषा आशीष माधव

माधव

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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