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Sunday, 19 April, 2026
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महिलाओं के दर्द को ‘दर्द’ ही नहीं समझा जाता- कैसे सुनाएं अपनी पीड़ा

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(एनालिस वेकेसर मेडिकल एंथ्रोपोलॉजी में रीडर, बर्मिंघम सिटी यूनिवर्सिटी)

बर्मिंघम,13 सितंबर (द कन्वरसेशन) जब आप चिकित्सक के पास जाते हैं तो आप उम्मीद करते हैं कि वे आपकी समस्याओं को सुनेंगे तथा उनका निदान करेंगे। लेकिन बहुत सी महिलाओं के साथ इससे उलट स्थिति होती है, खासतौर पर वे महिलाएं जो पुराने दर्द से पीड़ित हैं। इससे महिलाओं को जरूरी उपचार मिलने में कठिनाई आती है।

उदाहरण के तौर पर शोधकर्ताओं ने जब एंडोमेट्रियोसिस से पीड़ित महिलाओं से बातचीत की और चिकित्सकों के संबंध में उनके अनुभव जानने चाहे तो पता चला कि महिलाओं को उस तरह की जरूरी मदद पाने में काफी कठिनाई आई। एंडोमेट्रियोसिस गर्भाशय से जुड़ा एक विकार है।

शोध में शामिल एक महिला ने कहा कि, ‘‘ वे (डाक्टर) आप पर विश्चास करें इसके लिए आपको बहुत मेहनत करनी पड़ती है क्योंकि वे आप पर विश्वास नहीं करते। आपको समझ में आ जाएगा कि उन्होंने तुरंत आप पर विश्वास नहीं किया।

ब्रिटेन में ‘वेलबीइंग ऑफ वीमन्स चैरिटी’ की ओर से किए गए इस सर्वेक्षण में पाया गया कि आधी से अधिक महिलाओं ने इस बात को महसूस किया कि किसी न किसी मौके पर स्वास्थ्य देखभाल विशेषज्ञों ने या तो उनके दर्द की अनदेखी की या उनकी समस्या पर यकीन ही नहीं किया । उत्तरी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप सहित दुनिया के अन्य हिस्सों में भी महिलाओं के अनुभव कमोबेश एक से ही रहे।

महिलाओं और पुरूषों के दर्द के उपचार में यह लैंगिक भेदभाव स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है। उदाहरण के लिए पुरुषों की तुलना में महिलाओं को एंजाइना तथा मांसपेशियों से जुड़े दर्द की पुरानी समस्याओं के इलाज में कम फायदा होता है।

इंग्लैंड और वेल्स में 2003-2013 के बीच दिल का दौरा पड़ने के बाद पुरुषों की तुलना में महिलाओं को सही उपचार नहीं मिला और इसके कारण 8,243 मौतों ऐसी हुईं,जिन्हें रोका जा सकता था।

दर्द के संदर्भ में लैंगिक भेदभाव

महिलाओं के दर्द को कम आंकने का एक प्रमुख कारण लैंगिक रूढ़िवादिता है। यहां तक कि स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर भी व्यापक रूप से प्रचलित इन रूढ़िवादी विचारों का ही पालन करते हैं। ये रूढ़िवादी सोच कहती है कि दर्द की स्थिति में पुरूष ‘शांत और स्थिर’ रहते हैं जबकि महिलाएं ‘हो-हल्ला’ ज्यादा मचाती हैं ।

ऐसा माना जाता है कि पुरुष दर्द होने पर भी तुरंत डाक्टरों के पास नहीं भागते और इसलिए जब वे ऐसा करते हैं, तो उनकी बात पर तवज्जो दी जाती है। लेकिन हकीकत में यह यह सही नहीं है। शोध से पता चलता है कि महिलाओं के समान ही पुरुषों में भी दर्द होने पर उनके डॉक्टर के पास जाने की उतनी ही संभावना होती है।

यह भी माना जाता है कि महिलाएं चूंकि मासिक धर्म और प्रसव पीड़ा झेल लेती हैं इसलिए इनमें दर्द सहने की अधिक क्षमता होती है।

ये रूढ़िवादी सोच संकेत देती है कि महिलाओं के दर्द को ‘दर्द’ ही नहीं समझा जाता, और एक चिकित्सक भी इसे गंभीरता से नहीं लेता।

सही देखभाल मिलना

दर्द कोई ऐसी चीज़ नहीं है कि उसे स्वीकार कर आप उसके साथ जीना सीख लें। यदि आपको अपने दर्द के बारे में किसी चिकित्सक से बात करनी है तो यह सुनिश्चित करने के लिए कई चीजें हैं कि आपकी आवाज सुनी जाए।

उदाहरण के लिए अपने दर्द की कहानी सुनाने के बजाय चिकित्सक को यह बताना अधिक असरदार साबित हो सकता है कि दर्द आपके दिन-प्रतिदिन की कार्य क्षमता को कैसे प्रभावित करता है।

दर्द और संबंधित लक्षणों के ब्योरे के लिए ऐप या डायरी का उपयोग करना और इसे चिकित्सक के पास ले जाने से आपकी बात का असर पड़ सकता है।

द कन्वरसेशन शोभना नरेश

नरेश

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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