नई दिल्ली: बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शाहाबुद्दीन ने शुक्रवार को इस्तीफा दे दिया. उनके इस्तीफे के साथ ही एक ऐसा राष्ट्रपति कार्यकाल खत्म हो गया, जिसने देश के सबसे उथल-पुथल भरे राजनीतिक बदलावों में से एक को देखा.
शुक्रवार दोपहर पत्रकारों से बात करते हुए शाहाबुद्दीन ने अपने इस्तीफे की पुष्टि की. उन्होंने कहा, “यह बात पहले से ही सबको पता है. मेरे कहने से क्या फर्क पड़ेगा? मैं बीमार हूं, इसलिए मैंने इस्तीफा दे दिया.”
रिपोर्टों के मुताबिक, पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना से कथित संबंधों को लेकर बढ़ते राजनीतिक दबाव के कारण उन्होंने इस्तीफा दिया. उनका इस्तीफा ऐसे समय आया है, जब शेख हसीना ने भारत में करीब दो साल के निर्वासन के बाद बांग्लादेश लौटने का ऐलान किया है. हालांकि, उन्हें गैरहाजिरी में मौत की सज़ा सुनाई जा चुकी है.
बीबीसी बांग्ला के हवाले से सूत्रों ने बताया कि इसके बाद सत्तारूढ़ बीएनपी (बीएनपी) के नेताओं की ओर से शाहाबुद्दीन पर इस्तीफा देने का दबाव लगातार बढ़ता गया.
शाहाबुद्दीन अप्रैल 2023 से राष्ट्रपति थे. अगस्त 2024 में युवाओं के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों के बीच शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद से हटाए जाने और कुछ दिनों बाद कार्यवाहक सरकार बनने के बावजूद वह राष्ट्रपति पद पर बने रहे.
प्रोथोम आलो ने सबसे पहले गुरुवार को उनके इस्तीफे की खबर दी थी, जिसकी बाद में अधिकारियों ने पुष्टि की. संविधान के मुताबिक, 90 दिनों के भीतर नए राष्ट्रपति का चुनाव होना है.
संविधान के अनुसार, संसद अध्यक्ष हाफिज़ उद्दीन अहमद नए राष्ट्रपति के चुने जाने और शपथ लेने तक कार्यवाहक राष्ट्रपति की जिम्मेदारी संभालेंगे.
अहमद शुक्रवार को बैंकॉक से ढाका लौटे. वह 19 जुलाई को इलाज के लिए बैंकॉक गए थे. उनकी वापसी रविवार को तय थी, लेकिन उन्होंने अपना दौरा छोटा कर दो दिन पहले ही लौटने का फैसला किया.
संसद में दो-तिहाई बहुमत रखने वाली सत्तारूढ़ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के अपने उम्मीदवार को राष्ट्रपति बनवाने की पूरी संभावना है. प्रोथोम आलो के मुताबिक, पिछले कई दिनों से बीएनपी के वरिष्ठ नेता शाहाबुद्दीन के उत्तराधिकारी पर चर्चा कर रहे थे.
शाहाबुद्दीन 24 अप्रैल 2023 को अवामी लीग सरकार के दौरान बांग्लादेश के 22वें राष्ट्रपति बने थे. संविधान के अनुसार उनका पांच साल का कार्यकाल अप्रैल 2028 तक था, लेकिन उन्होंने तय समय से करीब दो साल पहले ही इस्तीफा दे दिया.
जुलाई-अगस्त 2024 के जनआंदोलन में शेख हसीना सरकार के गिरने के बाद उनके राष्ट्रपति पद पर बने रहने को लेकर लगातार राजनीतिक बहस होती रही. 13वें जातीय संसद चुनाव के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के सत्ता में लौटने के बाद यह बहस और तेज हो गई.
उनका इस्तीफा अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस की सरकार की कई महीनों से सार्वजनिक तौर पर की जा रही आलोचना के बाद आया है.
फरवरी में, नई सरकार के शपथ लेने के कुछ ही दिनों बाद, शाहाबुद्दीन ने बंगाली अखबार कालेर कंठो को दिए इंटरव्यू में आरोप लगाया था कि मुहम्मद यूनुस और छात्र आंदोलन के नेताओं ने 18 महीने के राजनीतिक बदलाव के दौरान उन्हें असंवैधानिक तरीके से हटाने की साजिश रची और संवैधानिक रूप से चुने गए राष्ट्रपति को किनारे करने की कोशिश की.
उन्होंने यह भी कहा कि अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दौरान उनकी यूनुस से लगभग कोई बातचीत नहीं हुई और उन्होंने पूर्व मुख्य सलाहकार पर राष्ट्रपति पद को कमजोर करने का आरोप लगाया.
उनकी ये टिप्पणियां दिसंबर 2025 में रॉयटर्स को दिए गए इंटरव्यू से मिलती-जुलती थीं. उस समय उन्होंने कहा था कि अंतरिम सरकार के दौरान उन्हें “अपमान” और हाशिए पर डालने का सामना करना पड़ा, इसलिए वह अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले पद छोड़ना चाहते हैं.
हालांकि बांग्लादेश में राष्ट्रपति का पद काफी हद तक औपचारिक होता है और वास्तविक कार्यकारी शक्तियां प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के पास होती हैं, लेकिन अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के बीच शेख हसीना के नई दिल्ली भागने और संसद भंग होने के बाद राष्ट्रपति का पद असाधारण रूप से महत्वपूर्ण हो गया था. उस समय शाहाबुद्दीन ही देश के एकमात्र संवैधानिक प्राधिकरण बचे थे.
गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने गुरुवार को कहा कि सरकार ने राष्ट्रपति से इस्तीफा नहीं मांगा था. उन्होंने यह भी कहा कि संविधान राष्ट्रपति को अपनी इच्छा से पद छोड़ने की अनुमति देता है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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