( ग्राहम जी डोड्स, कॉनकॉर्डिया विश्वविद्यालय )
मॉन्ट्रियल, आठ अक्टूबर (द कन्वरसेशन) अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पदभार ग्रहण करने के पहले ही दिन 26 कार्यकारी आदेश, चार घोषणाएँ और 12 ज्ञापन जारी करके अपने दूसरे कार्यकाल की नींव रखी। राष्ट्रपति की एकतरफ़ा कार्रवाइयों का सिलसिला अभी भी थमा नहीं है।
इनमें हज़ारों सरकारी कर्मचारियों को हटाने और सार्वजनिक प्रसारण निगम (सीपीबी) के सदस्यों और नागरिक अधिकार आयोग (सीसीआर) के अध्यक्ष जैसे कई प्रमुख अधिकारियों को बर्खास्त करने के ट्रंप के प्रयास शामिल हैं।
ट्रंप ने शिक्षा विभाग और अंतरराष्ट्रीय विकास एजेंसी (यूएसएआईडी) जैसे संपूर्ण सरकारी निकायों को समाप्त करने के प्रयास भी किए।
कुछ विद्वानों के अनुसार, ये कार्रवाइयाँ एक अति-विकसित अहंकार वाले बेलगाम राजनेता के मनोविज्ञान में निहित प्रतीत होती हैं। लेकिन यह इससे कहीं अधिक है।
राष्ट्रपति की शक्तियों का अध्ययन करने वाले एक राजनीति विज्ञान के विद्वान के रूप में मेरा मानना है कि ट्रंप के हालिया कार्य एकात्मक कार्यकारी सिद्धांत की परिणति को चिह्नित करते हैं जो शायद पिछले कई दशकों का सबसे विवादास्पद संवैधानिक सिद्धांत है।
अमेरिका का उच्चतम न्यायालय राष्ट्रपति पद को लेकर एक ऐसे नए संवैधानिक दृष्टिकोण की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है, जिसमें राष्ट्रपति को लगभग असीमित शक्तियां दी जा सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह रुझान ‘यूनिटरी एक्जीक्यूटिव थ्योरी’ के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।
‘यूनिटरी एक्जीक्यूटिव थ्योरी’ एक विवादास्पद अवधारणा है जो राष्ट्रपति को कार्यपालिका पर पूर्ण नियंत्रण की अनुमति देती है। ‘यूनिटरी एक्जीक्यूटिव थ्योरी’ की जड़ें 1980 के दशक में हैं, जब इसे राष्ट्रपति रोनॉल्ड रीगन की प्रशासनिक नीतियों को सशक्त बनाने के लिए तैयार किया गया था। इस सिद्धांत के तहत कार्यपालिका के सभी कार्यों पर पूर्ण नियंत्रण केवल राष्ट्रपति के पास होना चाहिए। इसका मतलब यह है कि राष्ट्रपति किसी भी अधीनस्थ अधिकारी को आदेश दे सकते हैं और उन्हें किसी भी समय बर्खास्त कर सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर यह सिद्धांत न्यायपालिका से आधिकारिक मान्यता प्राप्त कर लेता है, तो यह अमेरिकी शासन प्रणाली की मूलभूत संरचना को बदल सकता है।
संवैधानिक विवाद और न्यायिक रुख
हालांकि, अमेरिका के इतिहास में विभिन्न न्यायिक फैसलों में इस सिद्धांत को आंशिक रूप से स्वीकार या अस्वीकार किया गया है। 1935 के हम्फ्रेज एग्जीक्यूटर बनाम अमेरिका और 1988 के मॉरिसन बनाम ओल्सन जैसे फैसलों में कोर्ट ने राष्ट्रपति की अधिकारियों को हटाने की शक्ति पर सीमाएं तय की थीं।
लेकिन हाल के वर्षों में उच्चतम न्यायालय का झुकाव स्पष्ट रूप से राष्ट्रपति की ओर देखा गया है। 2020 के दशक में आए सेइला लॉ एलएलसी बनाम सीएफपीबी और ट्रंप बनाम विलकॉक्स, बोयले, स्लॉटर (2025) जैसे मामलों में उच्चतम न्यायालय ने ट्रंप द्वारा विभिन्न स्वतंत्र एजेंसियों के अधिकारियों को हटाने के निर्णयों को बरकरार रखा।
इन फैसलों से संकेत मिलते हैं कि हम्फ्रेज एग्जीक्यूटर जैसे पुराने फैसले अब खतरे में हैं। न्यायमूर्ति ब्रेट कावानॉ ने एक फैसले में लिखा, “इस बात की काफी संभावना है कि हम इस पूर्ववर्ती फैसले को सीमित या रद्द करेंगे।”
वहीं, न्यायमूर्ति एलेना केगन ने अपने असहमति मत में चेताया कि उच्चतम न्यायालय का रूढ़िवादी बहुमत “हम्फ्रेज” को रद्द करने को तैयार बैठा है और इससे अमेरिकी प्रशासनिक प्रणाली की स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है।
लोकतंत्र बनाम अधिनायकवाद की दुविधा
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उच्चतम न्यायालय आधिकारिक तौर पर ‘यूनिटरी एक्जीक्यूटिव सिद्धांत’ को अपनाता है, तो इसका मतलब राष्ट्रपति को संघीय सरकार के सभी कार्यों पर लगभग पूर्ण नियंत्रण देना होगा। इससे तथाकथित “डीप स्टेट” को समाप्त करने की ट्रंप की मंशा को बल मिल सकता है।
न्यायमूर्ति केगन ने चेतावनी दी कि इससे प्रशासनिक स्वशासन की अवधारणा, जहां द्विदलीय विशेषज्ञ संस्थाएं स्वतंत्र रूप से काम करती हैं, लगभग खत्म हो सकती है।
उन्होंने कहा, “अगर राष्ट्रपति बिना कारण किसी को भी हटा सकते हैं, तो सार्वजनिक कल्याण अब केवल राष्ट्रपति की इच्छा पर निर्भर रह जाएगा — जो लोकतंत्र की तुलना में अधिनायकवाद के अधिक निकट है।”
( द कन्वरसेशन )
मनीषा नरेश
नरेश
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