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Tuesday, 10 February, 2026
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ढाका में भीड़ का पसंदीदा चेहरा बने तारिक रहमान, साथ ही उभर रहा है तीसरा मोर्चा

ढाका की सड़कों पर BNP को बढ़त मिलती दिख रही है. तारिक साफ़ पसंद हैं, जमात को कुछ लोग पसंद कर रहे हैं, जबकि नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) को कोई पसंद नहीं कर रहा है.

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ढाका: जब तारीक रहमान कोला बागान में अपना छोटा भाषण दे रहे थे, तो उनकी बातें धनमंडी की गलियों तक गूंज रही थीं. यहां मतदाता सिर्फ सुनने नहीं आए थे, बल्कि इस पल को बीते कई सालों के राजनीतिक उथल-पुथल से जोड़कर देख रहे थे.

तारीक का संदेश धनमंडी 32 के पास तक सुनाई दिया. यह वही जगह है, जहां कभी बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान का घर था. अगस्त 2024 से पहले यहां बैरिकेड लगे रहते थे और आवाजाही पर रोक थी. अब यह इलाका सबके लिए खुला है.

यहां खाने-पीने की दुकानें लग गई हैं और धनमंडी झील के आसपास काफी चहल-पहल है. 23 साल की मोनी कहती हैं, “हमें तारीक भाई चाहिए. जिस तरह उन्होंने देश को बचाया, जिस तरह वह बोलते हैं, वैसा कोई नहीं बोलता.” वह यह भी जोड़ती हैं कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के अध्यक्ष को 17 साल तक देश से बाहर रहने के लिए दोष नहीं दिया जा सकता. “वह कैसे आते. ये लोग उन्हें आने ही नहीं देते.”

दिन में बाद में लोगों को दिए गए एक टीवी संबोधन में तारीक ने कहा कि बांग्लादेश अपने “लोकतांत्रिक बदलाव के एक ऐतिहासिक मोड़” पर खड़ा है.

उन्होंने कहा, “…गिरे हुए, पराजित और बाहर किए गए फासीवादी गिरोह ने जनता से राज्य की मालिकाना हक छीन लिया था. उन्होंने लोगों के सभी लोकतांत्रिक राजनीतिक अधिकारों पर कब्जा कर लिया था. आखिरकार, लंबे संघर्ष और आंदोलन के बाद, हजारों लोगों की जान की कीमत पर, वह पल आ गया है जब राज्य की मालिकाना हक जनता को लौटाया जा सके.” यह बयान पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के 60 वर्षीय बेटे का है, जिनका पिछले साल दिसंबर में निधन हो गया था.

अलिया खातून तारीक से सहमत हैं. वह खालिदा जिया वाला बांग्लादेश वापस चाहती हैं. वह कहती हैं, “जिस देश के लिए वह मरीं, वही देश हमें वापस चाहिए. उन्होंने इतना दुख सहा, लेकिन देश नहीं छोड़ा.” खुलना की रहने वाली अलिया धनमंडी 32 के जले हुए अवशेष देखने के लिए चार घंटे का सफर तय कर ढाका आई हैं.

वह कहती हैं, “मैं उस पिचाश [राक्षस] का घर देखने आई हूं, जिसने सत्ता में रहते हुए हमें रातों की नींद उड़ा दी थी.” वह उस घर की ओर इशारा करती हैं, जिसे मुजीब की बेटी और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने संग्रहालय में बदल दिया था.

The residence of Bangladesh's founder Sheikh Mujibur Rahman, located at Road No. 32, Dhanmondi, Dhaka, that was vandalised and set on fire by mobs in early February 2025 | Debdutta Chakraborty | ThePrint
बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान का घर, जो ढाका के धनमंडी में रोड नंबर 32 पर है, फरवरी 2025 की शुरुआत में भीड़ ने तोड़-फोड़ की और आग लगा दी | देबदत्ता चक्रवर्ती | दिप्रिंट

शेख हसीना की अवामी लीग को 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव में हिस्सा लेने से रोक दिया गया है.

धनमंडी 32 के सामने चाय की दुकान चलाने वाले 35 साल के हसन अली भी मानते हैं कि हवा किस तरफ बह रही है. वह कहते हैं, “तारीक जिया ही जवाब हैं, क्योंकि सुधार कोई और नहीं कर सकता. वह अब बदले हुए इंसान हैं और अपने शब्दों को सोच-समझकर बोलते हैं.”

हसन और अलिया के बीच शेख हसीना को लेकर राय अलग है. हसन कहते हैं, “उन्होंने बहुत अच्छा काम किया, लेकिन छात्रों के प्रति उनका रवैया ही उनके पतन की वजह बना.” वह यह भी जोड़ते हैं कि अगले कम से कम 10 साल तक बांग्लादेश में अवामी लीग के सत्ता में लौटने की कोई दूर-दूर तक संभावना नहीं है.

BNP worker Hasan Ali and his wife at their shop located opposite Dhanmondi-32 | Debdutta Chakraborty | ThePrint
BNP कार्यकर्ता हसन अली और उनकी पत्नी धानमंडी-32 के सामने अपनी दुकान पर | देबदत्ता चक्रवर्ती | दिप्रिंट

वह धनमंडी 32 पर भीड़ के हमले और ऐतिहासिक इमारत को आग लगाए जाने की घटना की आलोचना भी करते हैं. वह कहते हैं, “आग कई दिनों तक जलती रही. इससे किसे फायदा हुआ.”

BNP के कार्डधारी सदस्य हसन बताते हैं कि मतदान के दिन बांग्लादेश के कई मतदाता किस तरह की दुविधा में होंगे. वह कहते हैं, “अगर हसीना छात्रों के खिलाफ न गई होतीं, तो कम से कम अगले 100 साल तक कोई उन्हें सत्ता से हटा नहीं सकता था. उन्होंने देश को आर्थिक रूप से आगे बढ़ाने में मदद की, लेकिन मैंने यह समझ लिया है कि जब जाने का वक्त आता है, तो फिर अल्लाह भी मदद नहीं कर पाता.”

सड़कों पर क्या चल रहा है

ढाका की सड़कों पर BNP को बढ़त मिलती दिख रही है. तारीक साफ पसंद हैं. जमात के कुछ समर्थक हैं, जबकि नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) का कोई खास आधार नजर नहीं आता. हसीना विरोधी आंदोलन की अगुवाई करने वाले छात्रों ने NCP बनाई थी. यह पार्टी चुनाव से पहले जमात के साथ गठबंधन में है. लेकिन इससे दोनों को ज्यादा भरोसेमंद नहीं माना जा रहा है.

हसन अली कहते हैं, “जमात जो कहती है, वह करती नहीं है. उनके काम और उनकी बातों में फर्क है.” जहां तक NCP की बात है, तो हसीना विरोधी आंदोलन में उसकी भूमिका का मतलब यह नहीं रहा कि उसे लोगों का बड़ा समर्थन मिल गया हो.

42 साल के जमालुद्दीन कहते हैं, “जुलाई आंदोलन किसी पार्टी ने नहीं चलाया था. यह देश के लोगों का आंदोलन था.”

अपने आसपास की सड़क की ओर इशारा करते हुए वह कहते हैं, “यहां जो रिक्शा चालक दिख रहे हैं, वे आंदोलन का हिस्सा थे. मैं खुद मजदूर हूं, मैं भी इसमें शामिल था. अगर कोई पार्टी यह दावा करे कि उसने सब कुछ किया, तो फिर वह जनता के प्रति जवाबदेह कैसे होगी.”

The walls in Dhaka are replete with political slogans as Bangladesh prepares to vote on 12 February | Debdutta Chakraborty | ThePrint
बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले मतदान की तैयारी के बीच ढाका की दीवारें राजनीतिक नारों से भरी पड़ी हैं | देबदत्ता चक्रवर्ती | दिप्रिंट

उनके लिए सबसे जरूरी देश में शांति है. वह कहते हैं, “यह फुटबॉल के खेल जैसा है. कोई जीतेगा, कोई हारेगा, लेकिन संसद में कोई न कोई पार्टी जाएगी. जो भी सत्ता में आए, बस देश में शांति रहे.”

जमालुद्दीन शेख हसीना को दोष नहीं देते. बांग्ला में बोलते हुए वह कहते हैं, “उन्होंने वही किया जो उनके लिए संभव था. जो भी अगला आए, उसे अच्छे से शासन करना चाहिए.”

ढाका की सड़कों पर BNP समर्थकों और बाकी लोगों के बीच बातचीत ज्यादातर तारीक के चुनावी वादों को लेकर हो रही है.

एक BNP समर्थक कहता है कि तारीक ने नीलफामारी में मेडिकल कॉलेज बनाने का वादा किया है. दूसरा जवाब देता है कि नीलफामारी में 2019 से मेडिकल कॉलेज मौजूद है. BNP समर्थक फिर भी अपनी बात पर अड़ा रहता है. वह कहता है कि तारीक 2009 के पिलखाना नरसंहार को शहीद सेना दिवस के रूप में मनाएंगे. लेकिन यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार पहले ही 25 फरवरी को विद्रोह में मारे गए सेना अधिकारियों के सम्मान का दिन घोषित कर चुकी है. BNP समर्थक आगे कहता है कि तारीक ने कुमिल्ला में एक एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग जोन (EPZ) बनाने का वादा किया है. दूसरी तरफ से जवाब आता है कि कुमिल्ला में 2000 से EPZ मौजूद है, जहां करीब 50,000 लोग काम करते हैं.

ढाका के वकील दिलावर, जो ‘मानुषेर पासे फाउंडेशन’ नाम की एक गैर-लाभकारी संस्था भी चलाते हैं, कहते हैं कि मतदाता शांति और न्याय चाहते हैं. दूसरों के मुकाबले वह तारीक रहमान पर भरोसा करने को लेकर ज्यादा संदेह में हैं. वह कहते हैं कि खालिदा जिया की मौत से उन्हें काफी सहानुभूति मिली, लेकिन अब BNP नेता को खुद को साबित करना होगा.

दिलावर कहते हैं, “उसके [तारीक] खिलाफ कई मामले थे. फिर वह वापस क्यों आना चाहता है. वह ब्रिटेन में आराम की जिंदगी जी रहा था. अब जब हसीना चली गई हैं, तो जाहिर है वह पद चाहता है.”

क्या वह जमात को वोट देंगे. वह कहते हैं, “हम इतने सालों से दो पार्टियों को वोट देते आए हैं. इस बार तीसरी क्यों नहीं.” फिर वह एक मिसाल देते हैं, “अगर आपके पास पहले से एक कप चाय भरा है, तो क्या उसके ऊपर एक और कप रखना समझदारी होगी.”

उनके मुताबिक BNP वही अतिरिक्त कप है.

वह तुरंत जोड़ते हैं, “अगर वे [जमात] सत्ता में आए और काम नहीं किया, तो हम उन्हें बाहर फेंक देंगे. बांग्लादेश के लोग जानते हैं यह कैसे किया जाता है. हम कई दिन भूखे रह सकते हैं, लेकिन अपनी इज्जत से खिलवाड़ किसी को नहीं करने देते. हमने पहले पाकिस्तान को दिखा दिया है कि हम क्या कर सकते हैं. हर पार्टी यह जानती है और याद रखती है.”

हालांकि, दिलावर महिलाओं के अधिकारों पर जमात के रुख से सहमत नहीं हैं. वह कहते हैं, “उन्हें खुद में सुधार करना होगा. लेकिन वे बुरे नहीं हैं.”

‘हमें जमात का उभार नहीं चाहिए’

राष्ट्रीय संसद भवन के बाहर, मानोबोधिकार शोंगस्कृति फाउंडेशन की कानूनी सलाहकार नूरजहां कहती हैं कि अधिकार कार्यकर्ताओं ने जमात प्रमुख की टिप्पणी के खिलाफ मानव श्रृंखला बनाकर विरोध किया था. एक अब हटाई जा चुकी सोशल मीडिया पोस्ट में जमात प्रमुख ने कामकाजी महिलाओं को “वेश्याएं” कहा था.

नूरजहां कहती हैं कि बांग्लादेश का माहौल अब भी तनावपूर्ण है. वह कहती हैं, “अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा बढ़ी है. जबरन धर्म परिवर्तन हुए हैं. अल्पसंख्यकों के लिए माहौल डरावना है. इससे इनकार नहीं किया जा सकता.”

वह कहती हैं कि बुनियादी तौर पर बांग्लादेश एक धर्मनिरपेक्ष देश है. “हम जमात का उभार नहीं चाहते, ताकि बांग्लादेश की असली पहचान बनी रहे.”

वह जोड़ती हैं कि महिलाएं भी खुद को असुरक्षित महसूस कर रही हैं. वह कहती हैं, “लेकिन हमें उम्मीद है.”

नूरजहां कहती हैं, “इस देश में चुनाव एक उत्सव होते हैं. पिछले 16 सालों से हमने सही और निष्पक्ष चुनाव नहीं देखा है. जो भी सत्ता में आए, उसे अच्छा शासन करना चाहिए और याद रखना चाहिए कि महिलाएं और अल्पसंख्यक सिर्फ चुनावी औजार नहीं हैं. वे अधिकारों वाले इंसान हैं.”

न्यू मॉडल डिग्री स्कूल के 17 साल के छात्र अब्दुल्ला अंजुम कहते हैं कि उनके लिए शिक्षा सुधार सबसे अहम मुद्दा है.

वह कहते हैं, “मैं देश की शिक्षा व्यवस्था से थक चुका हूं. जो भी पार्टी सत्ता में आए, उसे इसे ठीक करना चाहिए.”

मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान पाठ्यपुस्तकों से शेख मुजीबुर रहमान के संदर्भ हटाए जाने पर वह कहते हैं, “वैसे भी वह सब कुछ ज्यादा ही था.”

वह कहते हैं, “जुलाई क्रांति के बारे में पढ़ना अच्छा है. इससे आगे चलकर देश और हमारी सोच को दिशा मिलेगी.” अब्दुल्ला कहते हैं कि उनका कोई पसंदीदा नेता नहीं है, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि तारीक “जैसा बोलते हैं, वैसा करके भी दिखाएंगे.”

धनमंडी में वापस, 14 साल का मोहम्मद अमीन उन हजारों लोगों को पानी की बोतलें बेच रहा है, जो हसीना के पैतृक घर के जले हुए अवशेष देखने आ रहे हैं. अमीन बताता है कि आग लगने के बाद वह और पांच अन्य बच्चे धनमंडी 32 के अंदर गए थे, ताकि कबाड़ और जो भी कीमती सामान बचा हो, उसे इकट्ठा कर सकें.

अमीन के मुताबिक, उन्हें वहां सिर्फ पीड़ितों के शव दिखे.

वह कहते हैं, “मुझे पता है कि हर कोई इस बात को लेकर परेशान है कि कौन सी पार्टी सत्ता में आएगी. मेरी बस यही इच्छा है कि फिर कभी आग में कोई न मरे.”

जहां अमीन पानी की बोतलें बेच रहा है, उससे कुछ ही दूरी पर एक बच्चों का पार्क लोगों से भरा हुआ है. बगल की सड़क पर BNP कार्यकर्ता रैली निकाल रहे हैं. बैकग्राउंड में जो गाना बज रहा है, वह भारतीय कानों के लिए जाना-पहचाना है—तृणमूल कांग्रेस का ‘खेला होबे’. फर्क बस इतना है कि बोल में तृणमूल कांग्रेस की जगह BNP का नाम डाल दिया गया है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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