(सज्जाद हुसैन)
इस्लामाबाद, 24 अक्टूबर (भाषा) पाकिस्तान के उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ‘खुला’ के माध्यम से वैवाहिक संबंध समाप्त करने के एक महिला के अधिकार को बरकरार रखा और मनोवैज्ञानिक दुर्व्यवहार को तलाक के लिए एक वैध आधार के रूप में मान्यता दी है।
‘खुला’ एक इस्लामी अवधारणा है जो विवाह विच्छेद के महिला के अधिकार को मान्यता देती है। यह तलाक के विपरीत है जो पुरुष को यह अधिकार प्रदान करता है।
उच्चतम न्यायालय की दो महिला न्यायाधीशों में से एक न्यायमूर्ति आयशा ए मलिक ने यह निर्णय लिखा जिसे शुक्रवार को न्यायालय की वेबसाइट पर अपलोड किया गया।
यह फैसला एक महिला द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया जिसने पेशावर उच्च न्यायालय (पीएचसी) द्वारा उसके विवाह विच्छेद के दावे को खारिज किए जाने के निर्णय को चुनौती दी थी। पीएससी ने इस आधार पर उसके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया कि उसके पति की सहमति आवश्यक है और सुलह के सभी प्रयास अभी नहीं किए गए हैं।
उच्चतम न्यायालय के फैसले के अनुसार, न्यायमूर्ति मलिक और न्यायमूर्ति नईम अफगान की दो सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई के बाद पीएचसी के फैसले को गलत ठहराया।
पीठ ने पारिवारिक न्यायालय के विवाह विच्छेद के फैसले को बहाल कर दिया और पत्नी के अपने पति की सहमति के बिना भी ‘खुला’ प्राप्त करने के अधिकार की पुष्टि की।
पीठ ने स्पष्ट किया कि ‘खुला’ पत्नी का स्वैच्छिक अधिकार है और इसे पति की सहमति या न्यायिक विवेक पर सशर्त नहीं बनाया जा सकता।
न्यायमूर्ति मलिक ने अपने फैसले में लिखा कि पारिवारिक न्यायालय का काम किसी महिला को ऐसे विवाह में रहने के लिए मजबूर करना नहीं है जिसमें सौहार्द नहीं है।
यह फैसला अपमान, उपेक्षा, धमकाने और भावनात्मक दुर्व्यवहार समेत मनोवैज्ञानिक दुर्व्यवहार को इस्लामी कानून के तहत तलाक लेने के वैध आधार के रूप में मान्यता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
फैसले में कहा गया, ‘‘क्रूरता हमेशा शारीरिक हिंसा में प्रकट नहीं होती।’’
भाषा सिम्मी देवेंद्र
देवेंद्र
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