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Wednesday, 11 February, 2026
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पाकिस्तान से ‘टॉयलेट पेपर से भी बदतर’ बर्ताव— ख्वाजा आसिफ ने 1999 के बाद US गठबंधन को ‘गलती’ बताया

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने सोवियत-अफ़गान युद्ध में इस्लामाबाद की भूमिका पर बात की और फिर ‘आतंक के खिलाफ़ युद्ध’ में तालिबान के खिलाफ़ US का साथ दिया, और इसे मौजूदा कट्टरपंथ और आर्थिक परेशानियों से जोड़ा.

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नई दिल्ली: पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अमेरिका के साथ अपने देश के दशकों पुराने गठबंधन पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने वॉशिंगटन पर आरोप लगाया कि उसने रणनीतिक फायदे के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल किया और फिर उसे “टॉयलेट पेपर” की तरह फेंक दिया.

मंगलवार को पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में दिए भाषण में आसिफ ने 1999 के बाद अमेरिका के साथ हुए नए गठजोड़ को “ऐतिहासिक गलती” बताया. उसी समय पाकिस्तान अफगानिस्तान में आतंक के खिलाफ अमेरिका की जंग में उसका सहयोगी बना था. उन्होंने कहा कि इससे देश को गंभीर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक नुकसान हुआ.

उन्होंने कहा, “संयुक्त राष्ट्र में हिलेरी क्लिंटन के एक अहम भाषण में उन्होंने बताया था कि उन्होंने पाकिस्तान को टॉयलेट पेपर के टुकड़े की तरह छोड़ दिया. लेकिन हमने सबक नहीं सीखा, और जब (पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति) बिल क्लिंटन साल 2000 में सिर्फ दो घंटे के लिए पाकिस्तान आए तो हमने फिर जश्न मनाना शुरू कर दिया.”

उन्होंने आगे कहा, “पाकिस्तान के साथ टॉयलेट पेपर से भी बदतर व्यवहार किया गया. एक मकसद के लिए उसका इस्तेमाल किया गया और फिर उसे फेंक दिया गया.”

उन्होंने इस युद्ध में पाकिस्तान की भागीदारी को “महंगा दांव” बताया, जिसने आज तक देश में अस्थिरता और कट्टरपंथ की जड़ें बो दीं.

आसिफ ने यह भी कहा कि 1980 के दशक में सोवियत-अफगान युद्ध में पाकिस्तान की भूमिका को धार्मिक कर्तव्य बताना गलत है.

“लोगों को जिहाद के नाम पर लड़ाई के लिए इकट्ठा किया गया, लेकिन इस शब्द का गलत इस्तेमाल हुआ और यह नुकसानदेह साबित हुआ,” उन्होंने कहा.

उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव किए गए ताकि इस भागीदारी को सही ठहराया जा सके, और ये वैचारिक बदलाव आज भी मौजूद हैं.

उन्होंने कहा कि सोवियत विरोधी लड़ाई असली धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि अमेरिका के भू-राजनीतिक हितों से प्रेरित थी, जिसने “लंबे समय की अस्थिरता और कट्टरपंथ” को जन्म दिया.

9/11 के बाद के हालात

9/11 के बाद अमेरिका के नेतृत्व में शुरू हुई आतंक के खिलाफ जंग को लेकर आसिफ ने सैन्य शासकों जिया-उल-हक और परवेज मुशर्रफ को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि इन्होंने पाकिस्तान को तालिबान के विरोध में इस लड़ाई में झोंक दिया.

इससे पहले अफगानिस्तान में सोवियत विरोधी युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने मुजाहिदीन का समर्थन किया था, जो बाद में तालिबान बने.

1999 में तख्तापलट कर सत्ता में आए मुशर्रफ ने 9/11 के बाद पाकिस्तान को अमेरिका के साथ खड़ा कर दिया. 2001 में उन्होंने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश को तालिबान और अल-कायदा के खिलाफ पूरा सहयोग देने का भरोसा दिया. इस्लामाबाद ने हवाई क्षेत्र, लॉजिस्टिक्स, सैन्य सुविधाएं, खुफिया जानकारी और मानव संसाधन सहित हर तरह का सहयोग दिया.

2002 से अब तक पाकिस्तान को अमेरिका से 33 अरब डॉलर से ज्यादा की मदद मिली. लेकिन देश में संप्रभुता को लेकर नाराजगी बढ़ी और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान जैसे विद्रोही संगठन उभरे, जो मुख्य रूप से अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर सक्रिय हैं.

आसिफ ने कहा, “हम इन नुकसानों की भरपाई कभी नहीं कर सकते, क्योंकि ये ऐसी गलतियां थीं जिन्हें सुधारा नहीं जा सकता. इससे पाकिस्तान दूसरों की लड़ाइयों की शतरंज की बिसात बन गया.”

अमेरिका के हितों के साथ पाकिस्तान का जुड़ाव लंबे समय से देश के भीतर विवाद का विषय रहा है. इस्लामाबाद पर आरोप लगते रहे हैं कि उसने राष्ट्रीय स्थिरता से ज्यादा विदेशी एजेंडा को प्राथमिकता दी, जिससे उग्रवाद और आर्थिक दबाव बढ़ा.

आसिफ के भाषण के बाद अफगानिस्तान में अमेरिका के पूर्व राजदूत और तालिबान वार्ता के विशेष दूत जालमे खलीलजाद ने बुधवार को एक्स पर लिखा.

“यह सबको पता है कि अफगानिस्तान में हमारे अभियानों में अमेरिका की मदद करने के बदले पाकिस्तान को सैन्य और आर्थिक सहायता मिली.”

उन्होंने आगे लिखा, “यह भी सबको पता है कि पाकिस्तानी प्रतिष्ठान उसी समय अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना के खिलाफ लड़ने वालों को पनाह दे रहा था.”

पहचान का नुकसान

अपने भाषण में आसिफ ने के. के. अज़ीज़ की किताब द मर्डर ऑफ हिस्ट्री का भी जिक्र किया.

इसका हवाला देते हुए उन्होंने कहा, “हम अपने खुद के राष्ट्रीय नायक बनाने में नाकाम रहे हैं. हमने हमलावरों को अपना नायक बना लिया है. हमने अपने मिसाइलों और महत्वपूर्ण जगहों के नाम भी उनके नाम पर रख दिए हैं.”

उन्होंने कहा कि देश आजादी की लड़ाई लड़ने वाले उन लोगों को भूल गया है, जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया और अपनी जान दे दी.

आसिफ ने कहा, “हम उन स्वतंत्रता सेनानियों को याद नहीं करते जिन्होंने ब्रिटेन के खिलाफ लड़ाई लड़ी और अपनी जान कुर्बान कर दी.”

उन्होंने राष्ट्रीय गौरव वापस पाने की बात कही.

“अब हमारी आधी से ज्यादा आबादी अपनी जड़ें पश्चिम में तलाश रही है, लेकिन हम इसी जमीन के लोग हैं.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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