काठमांडू: नेपाल के प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने रविवार को कहा कि काठमांडू और नई दिल्ली ने लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद के समाधान के लिए इतिहासकारों, सर्वेक्षकों और विशेषज्ञों की मदद लेने पर सहमति जताई है.
नेपाल और भारत के बीच कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर लंबे समय से सीमा विवाद है. भारत, तिब्बत और नेपाल के त्रि-जंक्शन के पास स्थित इन क्षेत्रों पर दोनों देश अपना दावा करते हैं. भारत का कहना है कि ये क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा हैं और इस मुद्दे का समाधान द्विपक्षीय बातचीत के जरिए होना चाहिए.
शाह ने संसद में विवादित क्षेत्रों से जुड़े सवालों के जवाब में कहा, “नेपाल सरकार ने आधिकारिक तौर पर भारत को एक कूटनीतिक नोट भेजा है, जिसमें लिपुलेख समेत भारत द्वारा नेपाली क्षेत्रों पर अतिक्रमण का मुद्दा उठाया गया है, और हमें उसका जवाब भी मिल चुका है.”
उन्होंने कहा, “दोनों देशों ने इस मुद्दे का समाधान कूटनीतिक माध्यमों से इतिहासकारों, सर्वेक्षकों और संबंधित विशेषज्ञों की मदद लेकर साथ बैठकर करने पर सहमति जताई है.”
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि केवल भारत ने ही नेपाल की जमीन पर “अतिक्रमण” नहीं किया है, बल्कि नेपाल ने भी “कई स्थानों पर” भारत की जमीन पर ऐसा किया है.
शाह ने कहा, “आप एक ऐसी बात जानकर हैरान होंगे, जिसके बारे में मुझे भी हाल ही में प्रधानमंत्री बनने के बाद पता चला.” उन्होंने कहा, “अब दोनों देशों को तथ्यों का अध्ययन करना चाहिए, दोस्तों की तरह साथ बैठना चाहिए और इस मुद्दे का समाधान करना चाहिए.”
प्रधानमंत्री ने कहा कि नेपाल ने इस मुद्दे पर चीन और ब्रिटेन के साथ भी कूटनीतिक चर्चा की है, क्योंकि उनके अनुसार यह विवाद उस दौर से जुड़ा है जब 1947 में ब्रिटिश सरकार इस क्षेत्र से चली गई थी.
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