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Wednesday, 21 January, 2026
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12 फरवरी के चुनाव से पहले भारत ने बांग्लादेश में तैनात स्टाफ के परिवारों को लौटने की सलाह दी

यह ताज़ा सलाह ऐसे समय आई है, जब बांग्लादेश में भारत-विरोधी भावना लगातार बढ़ रही है. शेख हसीना के बाद के दौर के पहले चुनाव 12 फरवरी को होने हैं.

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नई दिल्ली: भारत ने मंगलवार को 12 फरवरी के चुनावों से पहले सुरक्षा हालात को देखते हुए बांग्लादेश में तैनात अपने राजनयिकों के आश्रितों (परिवार के सदस्यों) को देश छोड़ने की “सलाह” दी है.

सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया, “सुरक्षा स्थिति को देखते हुए एहतियाती कदम के तौर पर हमने मिशन और पोस्ट अधिकारियों के आश्रितों को भारत लौटने की सलाह दी है. बांग्लादेश में मिशन और सभी पोस्ट खुले हैं और काम कर रहे हैं.”

बांग्लादेश में भारत-विरोधी भावना बढ़ी है, खासकर पिछले महीने राजनीतिक उम्मीदवार शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद. हादी की 18 दिसंबर को सिंगापुर में मौत हुई थी, ढाका में गोली लगने के छह दिन बाद.

भारत ने बार-बार ढाका से बांग्लादेश में अपने मिशनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की है.

18 से 20 दिसंबर के बीच बांग्लादेश में हिंसा हुई, जिसमें उसके दो मीडिया हाउस—प्रथम ओलो और द डेली स्टार के दफ्तर जला दिए गए. प्रदर्शनकारियों ने भारत को निशाना बनाया और दावा किया कि हादी के हत्यारे भारत भाग गए हैं. हालांकि, इस दावे का अब तक कोई सबूत नहीं मिला है.

उस समय की स्थिति के चलते भारत ने राजशाही और खुलना में अपने वीज़ा केंद्र अस्थायी रूप से बंद कर दिए थे, साथ ही बांग्लादेश में अपने कुछ मिशनों, जिनमें चटगांव भी शामिल है, में कांसुलर सेवाएं भी बंद की थीं.

हालांकि, पिछले महीने प्रदर्शन और उसके बाद की हिंसा खत्म होने के बाद नई दिल्ली ने तेज़ी से अपनी सेवाएं फिर शुरू कर दीं.

कूटनीतिक असर के तौर पर बांग्लादेश ने भारत में अपने मिशनों की कांसुलर सेवाएं बंद कर दीं, खासकर मयमनसिंह में प्रदर्शन की पहली रात एक हिंदू व्यक्ति दीपू चंद्र दास की सार्वजनिक रूप से हत्या कर उसे जला दिए जाने के बाद. दास की हत्या के बाद राष्ट्रीय राजधानी के कुछ इलाकों और भारत के अन्य शहरों में, बांग्लादेशी मिशनों के बाहर प्रदर्शन हुए.

भारत और बांग्लादेश के बीच तनाव बना हुआ है. नई दिल्ली लगातार ढाका से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील कर रहा है.

भारत का कहना है कि अगस्त 2024 में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के हटने के बाद से अल्पसंख्यक समुदायों को हिंसा का निशाना बनाया गया है. 12 फरवरी को होने वाले चुनाव 2009 के बाद पहली बार शेख हसीना के बाद की सरकार की ओर लोकतांत्रिक बदलाव दिखाएंगे. वहीं, बांग्लादेश लगातार यह कहता रहा है कि अल्पसंख्यकों पर हमले “सांप्रदायिक” नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक कारणों से हुई हिंसा है.

सोमवार को बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के कार्यालय ने दावा किया कि 2025 के कैलेंडर वर्ष में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की 645 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें से अधिकतर सांप्रदायिक नहीं थीं.

यूनुस के कार्यालय ने एक्स पर एक बयान में कहा, “जनवरी से दिसंबर 2025 तक के आधिकारिक पुलिस रिकॉर्ड की एक साल की समीक्षा में अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्यों से जुड़ी 645 घटनाएं दर्ज की गई हैं. यह डेटा सत्यापित एफआईआर, जनरल डायरी, चार्जशीट और देशभर की जांच अपडेट से तैयार किया गया है.”

बयान में कहा गया, “हालांकि हर घटना चिंता का विषय है, लेकिन आंकड़े एक साफ और सबूत-आधारित तस्वीर दिखाते हैं: ज्यादातर मामले सांप्रदायिक की बजाय आपराधिक प्रकृति के थे. यह कानून-व्यवस्था की चुनौतियों की जटिलता को दिखाता है और यह भी बताता है कि सार्वजनिक चर्चा डर या गलत जानकारी की जगह तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए.”

बयान में आगे कहा गया, “नतीजों से पता चलता है कि 71 घटनाओं में सांप्रदायिक तत्व पाए गए, जबकि 574 घटनाओं को गैर-सांप्रदायिक माना गया. सांप्रदायिक घटनाओं में मुख्य रूप से धार्मिक स्थलों और मूर्तियों में तोड़फोड़ या अपवित्र करना शामिल था, साथ ही कुछ अन्य अपराध भी थे. इसके उलट, अल्पसंख्यक व्यक्तियों या उनकी संपत्ति को प्रभावित करने वाली ज्यादातर घटनाएं धर्म से असंबंधित आपराधिक गतिविधियों से जुड़ी थीं, जिनमें पड़ोस के झगड़े, जमीन विवाद, राजनीतिक दुश्मनी, चोरी, यौन हिंसा और पुराने निजी विवादों से जुड़े मामले शामिल हैं.”

पिछले साल बांग्लादेश सरकार ने बताया था कि उसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की 2000 से ज्यादा शिकायतें मिली थीं और इन घटनाओं की जांच शुरू की गई थी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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