(योषिता सिंह)
संयुक्त राष्ट्र, 21 मई (भाषा) भारत ने जलवायु परिवर्तन संबंधी दायित्वों का पालन करने के लिए देशों से आह्वान करने वाले संयुक्त राष्ट्र महासभा के एक प्रस्ताव पर मतदान में भाग नहीं लिया। भारत ने यह चिंता व्यक्त की कि यह मसौदा ‘यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेंट चेंज’ की “पवित्र संरचना” को “कमज़ोर” करता है।
यह प्रस्ताव बुधवार को 193 सदस्यीय महासभा में 141 मतों के साथ पारित हो गया। इसके विरोध में आठ मत पड़े वहीं भारत सहित 28 देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया।
भारत ने कहा कि उसने इस प्रस्ताव पर बातचीत के दौरान रचनात्मक रूप से भाग लिया और हर चरण में अपनी चिंताओं और रुख को स्पष्ट किया था।
उसने कहा, ‘‘साझा सहमति बनाने के हमारे सर्वोत्तम प्रयासों के बावजूद हमारी चिंताओं का समाधान नहीं किया गया और इससे हम निराश हैं।’’
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की प्रथम सचिव पेटल गहलोत ने ‘मतदान की व्याख्या’ में कहा कि महासभा द्वारा इस प्रस्ताव को अपनाए जाने से भारत पर कोई बाध्यकारी प्रतिबद्धताएं लागू नहीं होती हैं।
उन्होंने कहा, “हमारी बाध्यताएं केवल ‘यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेंट चेंज’ प्रक्रिया के अंतर्गत अपनाए गए परिणामों से हैं। इसलिए, जलवायु परिवर्तन से संबंधित मुद्दों पर हमारे घोषित रुख के अनुरूप भारत इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करने की स्थिति में नहीं था।”
‘जलवायु परिवर्तन के संबंध में देशों के दायित्वों पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की परामर्शकारी राय’ शीर्षक वाले प्रस्ताव में जलवायु परिवर्तन पर देशों के दायित्वों के संबंध में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) की जुलाई 2025 की सर्वसम्मत परामर्शकारी राय का स्वागत किया गया। इसने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कानून की व्याख्या को स्पष्ट करने में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की परामर्शकारी राय के महत्व को एक प्रामाणिक योगदान के रूप में स्वीकार किया।
भारत लंबे समय से यह कहता रहा है कि जलवायु संबंधी दायित्वों पर संयुक्त राष्ट्र के जलवायु ढांचे के माध्यम से बातचीत की जानी चाहिए, जो ‘‘साझा लेकिन भिन्न-भिन्न उत्तरदायित्व’’ के सिद्धांत को मान्यता देता है। और जिसके तहत विकसित देशों से, ऐतिहासिक रूप से सबसे बड़े उत्सर्जक होने के नाते, उत्सर्जन कटौती में नेतृत्व करने और विकासशील देशों को वित्त और प्रौद्योगिकी सहायता प्रदान करने की अपेक्षा की जाती है।
प्रशांत द्वीपीय देश वनुआतू द्वारा पेश इस प्रस्ताव में सभी देशों से आह्वान किया गया कि वे मानवजनित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों से जलवायु और पर्यावरण की रक्षा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपने दायित्वों का पालन करें।
भारत ने कहा कि यह मसौदा प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की राय के “परामर्शकारी और गैर-बाध्यकारी” स्वरूप को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करने में विफल है।
गहलोत ने कहा, “हम इसलिए गंभीर रूप से चिंतित हैं कि यह प्रस्ताव ‘यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेंट चेंज’ प्रक्रिया की पवित्र संरचना को कमजोर करता है, क्योंकि यह एक परामर्शकारी राय को बाध्यकारी या अर्ध-बाध्यकारी दर्जा देने का प्रयास करता है और विकासशील देशों पर ऐसे दायित्व थोपने की कोशिश करता है जिन पर बहुपक्षीय सहमति नहीं बनी है। यह एक खतरनाक मिसाल है जिससे हम सभी को सावधान रहना चाहिए।’’
गहलोत ने कहा, ‘‘यह राष्ट्रीय नीतिगत दायरे को गंभीर रूप से कमजोर करता है और पेरिस समझौते की जमीनी स्तर की संरचना को बाधित करता है।’’
गहलोत ने इस बात पर जोर दिया कि विकासशील देशों के लिए सतत विकास और गरीबी उन्मूलन सर्वोपरि प्राथमिकताएं बनी हुई हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘ इसलिए ऊर्जा प्रणालियों में कोई भी परिवर्तन न्यायसंगत, व्यवस्थित और समान होना चाहिए, जिसमें ऊर्जा तक पहुंच, आर्थिक विकास और सामाजिक विकास की आवश्यकता को ध्यान में रखा जाए। यह प्रस्ताव इन अनिवार्यताओं को पर्याप्त रूप से मान्यता नहीं देता है और विकासशील देशों के लिए नीतिगत गुंजाइश को सीमित करता है।’’
भाषा शोभना मनीषा वैभव
वैभव
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