(सनम महूजी, लंदन विश्वविद्यालय)
लंदन, 19 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) ईरान और इजराइल के बीच जून में 12 दिनों तक युद्ध चला और उसी महीने युद्धविराम की घोषणा भी कर दी गई। हालांकि, ईरान की खबरें संघर्ष के बाद के हालात और पश्चिम एशिया की तनावपूर्ण राजनीतिक स्थिति पर केंद्रित रहीं।
ईरान की आबादी करीब एक करोड़ से अधिक है और बीते कई दशकों में देश अपने सबसे बुरे जल संकट का सामना कर रहा है। राजधानी तेहरान के पास के बांध लगभग 70 साल में अपने सबसे निचले स्तर पर हैं। तेहरान के करज बांध (शहर के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में से एक) में 2.5 करोड़ घन मीटर जल भंडारण की क्षमता है, जो 86 प्रतिशत खाली है।
देश के मध्य में इस्फहान शहर धंस रहा है क्योंकि जमीन धंसने से कारें और पैदल यात्री डूब रहे हैं। जमीन में दरारें पड़ रही हैं जिसका मुख्य कारण कृषि के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन है। ईरान का 90 प्रतिशत से अधिक पानी कृषि कार्यों के लिए निकाला जाता है। ईरान की कई झीलों में अब सिर्फ नमक की परत दिखती है।
तेहरान में स्कूलों और सड़कों को ढहने के खतरे के कारण सितंबर में स्कूलों और सड़कों को खाली करा लिया गया था, फिर भी इस प्रमुख पर्यावरणीय समस्या के बारे में अंतरराष्ट्रीय मीडिया में कवरेज चिंताजनक रूप से कम है, जो ज्यादातर स्थानीय और फारसी-भाषी समुदाय की मीडिया तक ही सीमित है।
ईरान पर युद्ध के पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत कम कवरेज हुआ है।
इसके विपरीत स्थानीय मीडिया ने बताया है कि तेहरान के निकट तेल डिपो पर इजराइल के मिसाइल हमलों से शहर के वायुमंडल में 47,000 टन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित हुईं जिससे वायु प्रदूषण हुआ।
उन्होंने दावा किया कि औद्योगिक अपशिष्ट जल, शहरी सीवेज के रिसाव और शोर, कंपन, विकिरण और गर्मी सहित प्रदूषण के अन्य रूपों के कारण सतही और भूजल प्रणालियां, मिट्टी और व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र सभी क्षतिग्रस्त हो गए हैं। ये सभी मनुष्यों, जानवरों और पौधों के जीवन के लिए खतरा पैदा करते हैं।
यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ जर्नलिज्म द्वारा किए गए एक विश्लेषण में पाया गया है कि पश्चिम एशिया को कवर करने वाली मीडिया मुख्यतः युद्ध और संघर्ष की रिपोर्टिंग करेगी। अन्य अकादमिक अध्ययनों से पता चलता है कि दीर्घकालिक लेकिन दूरगामी पर्यावरणीय मुद्दे उनकी प्राथमिकताओं में कोसों दूर हैं।
ईरान में भी समाचार मीडिया ने अधिकतर युद्ध पर ही ध्यान केंद्रित किया है। संघर्ष के दौरान ‘तस्नीम’, ‘मिजान’ और ‘कायहान’ जैसे रूढ़िवादी ईरानी सरकार-संबद्ध समाचार आउटलेट लगभग पूरी तरह से सैन्य घटनाक्रमों और ‘‘राष्ट्रीय रक्षा’’ व ‘‘विदेशी खतरों’’ के आधिकारिक आख्यानों पर केंद्रित रहे।
लेकिन जब लड़ाई समाप्त हुई तो कुछ ईरानी अखबारों, खासकर वे जो क्रमिक सामाजिक, राजनीतिक और प्रेस स्वतंत्रता की वकालत करते थे (सरकारी ‘ईरना’ समाचार एजेंसी के साथ) ने सूखे और पानी की कमी को कवर करना शुरू कर दिया। रूढ़िवादी ईरानी समाचार मीडिया आउटलेट अब इस तरह की खबरों को थोड़ा-बहुत कवर कर रहे हैं, लेकिन ‘पयामेमा’ और ‘शारघ’ जैसे सुधारवादी मीडिया की तुलना में कम।
दुनिया क्या जानती है?
सनम महूजी का शोध इस बात पर केंद्रित है कि पश्चिम और उत्तरी अफ्रीका खासकर ईरान में मीडिया जलवायु परिवर्तन की रिपोर्टिंग कैसे करता है।
महूजी ने कहा कि समाचार संगठनों के लिए वह जल और जलवायु परिवर्तन पर भी लिखती हैं। इस शोध में उन्होंने पाया है कि ईरान की पर्यावरणीय समस्याएं मुख्यतः दशकों से जारी सरकारी कुप्रबंधन और जल संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण हैं, जिसमें अत्यधिक बांध निर्माण और कृषि के लिए भूजल का उपयोग शामिल है।
संघर्षविराम होने से जलवायु परिवर्तन पर विराम नहीं लगेगा और इसकी उपेक्षा करने से उस संकट को नजरअंदाज करने का जोखिम है जो सभी को प्रभावित करता है।
द कन्वरसेशन
सुरभि संतोष
संतोष
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