scorecardresearch
Monday, 2 November, 2026
होमविदेशअमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले डेमोक्रेट्स का पलड़ा भारी, ट्रंप के सामने चुनौती

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले डेमोक्रेट्स का पलड़ा भारी, ट्रंप के सामने चुनौती

अगर रिपब्लिकन दोनों सदनों में अपना कंट्रोल बनाए रखते हैं, तो ट्रंप अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ा सकते हैं, लेकिन अगर डेमोक्रेट्स किसी एक सदन पर भी कब्जा कर लेते हैं, तो प्रशासन के लिए कानून पास कराना मुश्किल हो सकता है.

Text Size:

नई दिल्ली: तीन नवंबर को होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले डेमोक्रेट्स मजबूत होते दिख रहे हैं. वे सीनेट की कई अहम सीटों की लड़ाई में आगे हैं और कांग्रेस पर रिपब्लिकन पार्टी के कंट्रोल के लिए चुनौती पैदा कर रहे हैं. डॉनल्ड ट्रंप के लिए चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि इतिहास उनके पक्ष में नहीं है. 1946 के बाद से हुए 20 मध्यावधि चुनावों में से 18 में राष्ट्रपति की पार्टी ने प्रतिनिधि सभा में सीटें गंवाई हैं.

ट्रंप ने चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में देशभर की यात्रा कर रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए समर्थन जुटाया है. उन्होंने मतदाताओं को चेतावनी दी कि डेमोक्रेट्स की जीत से उनकी सरकार की नीतियां पलट सकती हैं. कंसास में एक रैली में, जो इस चुनावी कैंपेन में उनकी 30वीं रैली थी, उन्होंने समर्थकों से असामान्य रूप से सीधे तौर पर अपील की. उन्होंने उनसे रिपब्लिकन उम्मीदवारों को ऐसे वोट देने को कहा जैसे वह खुद चुनाव लड़ रहे हों.

ट्रंप ने कहा, “मैं इसे खत्म कर रहा हूं—बस यही है. मुझे यहां यह सुनिश्चित करने के लिए आना पड़ा कि रोजर जीत जाए.” वह रिपब्लिकन सीनेटर रोजर मार्शल की बात कर रहे थे, जिनके खिलाफ डेमोक्रेट एडम हैमिल्टन चुनाव लड़ रहे हैं.

ट्रंप ने कहा, “मैं कोई जोखिम नहीं लेना चाहता था.” उन्होंने समर्थकों से मार्शल और दूसरे रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए वोट करने की अपील की.

लेकिन हाल के सर्वे बताते हैं कि ट्रंप की कोशिशें डेमोक्रेट्स की वापसी रोकने के लिए काफी नहीं हो सकती हैं. द न्यूयॉर्क टाइम्स और सिएना यूनिवर्सिटी के सर्वे के मुताबिक, सीनेट पर कंट्रोल तय करने वाले माने जा रहे सात अहम राज्यों में से पांच में डेमोक्रेट्स आगे हैं. छठे राज्य में दोनों पार्टियों के बीच मुकाबला लगभग बराबरी का है.

डेमोक्रेट्स कंसास, मेन, ओहायो और टेक्सास में आगे हैं. अलास्का में उनकी बढ़त कम है, जबकि आयोवा में मुकाबला बेहद करीबी है. मिशिगन में, जहां डेमोक्रेट्स के पास पहले से सीनेट की सीट है, उनकी उम्मीदवार अब्दुल एल-सैयद रिपब्लिकन माइक रोजर्स से 11 प्रतिशत अंक आगे हैं.

इनमें से कई राज्यों में डेमोक्रेट्स की जीत खास तौर पर महत्वपूर्ण होगी. टेक्सास में 1988 के बाद से कोई डेमोक्रेट सीनेटर नहीं चुना गया है, जबकि कंसास में 1932 के बाद से ऐसा नहीं हुआ है.

यह क्यों महत्वपूर्ण है

मध्यावधि चुनाव तय करेंगे कि ट्रंप के राष्ट्रपति पद के आखिरी दो वर्षों में अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों पर किस पार्टी का कंट्रोल रहेगा. अभी रिपब्लिकनों के पास सीनेट में 53-47 का बहुमत है और प्रतिनिधि सभा की 435 सीटों में से 218 सीटें उनके पास हैं.

प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों पर चुनाव हो रहा है. इसके अलावा सीनेट की 100 सीटों में से 35 सीटों पर भी चुनाव होगा. डेमोक्रेट्स को सीनेट पर कंट्रोल हासिल करने के लिए कम से कम चार सीटें जीतनी होंगी और अपनी मौजूदा सीटें भी बचानी होंगी.

फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी की इलेक्शन लैब के मुताबिक, चुनाव के दिन से पहले ही 5.1 करोड़ से ज्यादा अमेरिकी वोट डाल चुके थे. यह संख्या 2022 के मध्यावधि चुनावों में शुरुआती मतदान के कुल आंकड़े से ज्यादा है.

भारत की संसदीय व्यवस्था से अलग, जहां मतदाता संसद के सदस्यों को चुनते हैं और लोकसभा में बहुमत रखने वाली पार्टी या गठबंधन सरकार बनाता है, अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव कांग्रेस से अलग होता है.

अमेरिकी कांग्रेस देश की संघीय विधायिका है और इसके दो सदन हैं—प्रतिनिधि सभा और सीनेट. राष्ट्रपति कार्यपालिका का नेतृत्व कर सकते हैं, लेकिन कानून बनाने, संघीय खर्च और सरकार की निगरानी से जुड़ी कई अहम शक्तियां कांग्रेस के पास हैं.

प्रतिनिधि सभा के सदस्यों का कार्यकाल दो साल का होता है. इसलिए इसकी सभी 435 सीटों पर हर दो साल में चुनाव होता है. सीनेटरों का कार्यकाल छह साल का होता है. 100 सीटों में से करीब एक-तिहाई सीटों पर हर मध्यावधि चुनाव में मतदान होता है.

मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के बीच में होते हैं और अक्सर इन्हें राष्ट्रपति के कामकाज पर जनता के फैसले के तौर पर देखा जाता है. इनके नतीजे वॉशिंगटन में सत्ता के संतुलन को काफी बदल सकते हैं.

अगर रिपब्लिकन दोनों सदनों पर अपना कंट्रोल बनाए रखते हैं, तो ट्रंप के लिए अपना विधायी एजेंडा आगे बढ़ाना आसान होगा, लेकिन अगर डेमोक्रेट्स किसी एक सदन पर भी कंट्रोल हासिल कर लेते हैं, तो प्रशासन के लिए कानून पास कराना, खर्च को मंजूरी दिलाना और नीतियों में बदलाव लागू करना मुश्किल हो सकता है.

डेमोक्रेट्स के कंट्रोल वाली प्रतिनिधि सभा प्रशासन के खिलाफ कांग्रेस की जांच भी बढ़ा सकती है. प्रतिनिधि सभा के पास महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने का अधिकार भी है. हालांकि, राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए सीनेट में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है.

डेमोक्रेट्स की मजबूती का कारण

अर्थव्यवस्था रिपब्लिकनों की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक दिखाई दे रही है. टाइम्स-सिएना के सर्वे में पाया गया कि सीनेट के लिए अहम माने जा रहे सात राज्यों में संभावित मतदाताओं में केवल 38 प्रतिशत ने राष्ट्रपति के तौर पर ट्रंप के कामकाज को मंजूरी दी.

महंगाई और रोजमर्रा की चीज़ों की बढ़ती कीमतों को लेकर असंतोष और ट्रंप प्रशासन के आर्थिक कामकाज से नाराज़गी ने रिपब्लिकनों के समर्थन को कमजोर किया है. इसमें वे कुछ मतदाता भी शामिल हैं, जिन्होंने 2024 में ट्रंप को वोट दिया था.

रोजमर्रा के खर्च और जीवन-यापन की लागत के मुद्दे पर डेमोक्रेट्स को रिपब्लिकनों पर नौ प्रतिशत अंकों की बढ़त हासिल है. सर्वे किए गए हर राज्य में डेमोक्रेट्स इस मुद्दे पर आगे हैं. उन्होंने युवा मतदाताओं, लैटिनो मतदाताओं और स्वतंत्र मतदाताओं के बीच भी बढ़त बनाई है.

इन नतीजों से पता चलता है कि युवा और लैटिनो मतदाताओं के बीच ट्रंप की पहले की बढ़त रिपब्लिकन सीनेट उम्मीदवारों के लिए लगातार समर्थन में नहीं बदल रही है. सर्वे में शामिल राज्यों में अब रिपब्लिकन को युवा और लैटिनो मतदाताओं के केवल करीब एक-चौथाई का समर्थन मिल रहा है.

रिपब्लिकन्स का व्हाईट कामकाजी वर्ग के मतदाताओं के बीच भी कुछ समर्थन खोना पड़ा है. यह ट्रंप के राजनीतिक गठबंधन का एक महत्वपूर्ण वर्ग है. 2024 में अनुमान के मुताबिक, कॉलेज की डिग्री नहीं रखने वाले 66 प्रतिशत श्वेत मतदाताओं ने ट्रंप को वोट दिया था, लेकिन अब सर्वे किए गए सात राज्यों में रिपब्लिकन उम्मीदवारों को इस समूह के करीब 56 प्रतिशत मतदाताओं का समर्थन मिल रहा है.

कंसास जैसे कृषि प्रधान राज्यों में आर्थिक दबाव खास तौर पर दिखाई दे रहा है. सर्वे के मुताबिक, ईरान के साथ युद्ध के बाद डीजल की बढ़ती कीमतों और विदेशी बीफ पर आयात शुल्क हटाने के प्रशासन के फैसले ने किसानों और पशुपालकों को परेशान किया है. ये लोग परंपरागत रूप से रिपब्लिकन पार्टी के महत्वपूर्ण समर्थक रहे हैं.

सर्वे यह भी बताते हैं कि विदेश नीति के मुद्दे पर ट्रंप की घटती लोकप्रियता से डेमोक्रेट्स को फायदा हुआ है. ईरान के साथ युद्ध और इसका ऊर्जा कीमतों पर असर मतदाताओं की आर्थिक चिंताओं को और बढ़ा रहा है.

हालांकि, सर्वे के आंकड़ों को लेकर सावधानी बरतने की वजह भी है. कुछ मतदाता अब भी तय नहीं कर पाए हैं कि वे किसे वोट देंगे. वहीं, जिन मतदाताओं ने चुनाव अभियान के आखिरी महीने में अपना फैसला किया, उनमें रिपब्लिकनों को नौ प्रतिशत अंकों की बढ़त मिली है. द न्यूयॉर्क टाइम्स ने बताया कि पिछले चुनावों में सर्वे करने वालों को ट्रंप के समर्थन का सही अनुमान लगाने में भी मुश्किल हुई है. ट्रंप के समर्थक सर्वे में हिस्सा लेने के लिए कम तैयार हो सकते हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में सात राज्यों को आम तौर पर अहम स्विंग स्टेट माना जाता है—एरिजोना, जॉर्जिया, मिशिगन, नेवादा, नॉर्थ कैरोलिना, पेंसिल्वेनिया और विस्कॉन्सिन.

‘स्विंग स्टेट्स’ शब्द खास तौर पर अमेरिका के लिए इस्तेमाल होता है. यह उसकी इलेक्टोरल कॉलेज व्यवस्था से जुड़ा है, जिसमें अलग-अलग राज्यों के नतीजे यह तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं कि राष्ट्रपति कौन बनेगा.

न्यूयॉर्क टाइम्स के सर्वे के मुताबिक, मध्यावधि चुनाव में सीनेट पर कंट्रोल तय करने वाले सभी सात राज्यों में डेमोक्रेट्स आगे हैं—मिशिगन, कंसास, टेक्सास, मेन, ओहायो और थोड़े अंतर से अलास्का और आयोवा.

राष्ट्रपतियों के लिए मध्यावधि चुनाव में झटकों का इतिहास

इतिहास अक्सर व्हाइट हाउस में सत्ता संभाल रही पार्टी को ज्यादा राहत नहीं देता. मध्यावधि चुनाव परंपरागत रूप से राष्ट्रपति की पार्टी के लिए मुश्किल रहे हैं. मतदाता अक्सर इन चुनावों का इस्तेमाल सरकार से अपनी नाराज़गी जताने के लिए करते हैं. सत्ता में रहने वाली पार्टी आम तौर पर प्रतिनिधि सभा में सीटें गंवाती है.

1946 से अब तक अमेरिका में 20 मध्यावधि चुनाव हुए हैं. इनमें से 18 में राष्ट्रपति की पार्टी ने प्रतिनिधि सभा में सीटें गंवाईं. ट्रंप की मंजूरी रेटिंग भी रिपब्लिकनों की स्थिति को और कमजोर कर सकती है.

इतिहास के मुताबिक, हैरी एस. ट्रूमैन के बाद से जिन भी राष्ट्रपतियों की मध्यावधि चुनाव से पहले वाले महीने में कामकाज को मंजूरी देने वाली रेटिंग 50 प्रतिशत से नीचे रही, उनकी पार्टी ने प्रतिनिधि सभा में सीटें गंवाईं. दूसरे शब्दों में, मध्यावधि चुनाव से पहले 50 प्रतिशत से कम मंजूरी रेटिंग वाले राष्ट्रपतियों को लगातार प्रतिनिधि सभा में नुकसान हुआ है.

लेकिन इसके कुछ अपवाद भी रहे हैं.

1998 में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पार्टी ने प्रतिनिधि सभा में चार सीटें जीती थीं. उस समय जनता ने उन्हें पद से हटाने की रिपब्लिकन कोशिशों का विरोध किया था. गैलप के मुताबिक, क्लिंटन के दूसरे कार्यकाल के दौरान उनकी औसत मंजूरी रेटिंग 60.6 प्रतिशत थी. हैरी एस. ट्रूमैन से लेकर जो बाइडेन तक किसी भी दूसरे कार्यकाल वाले अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए यह सबसे ज्यादा दर्ज की गई औसत रेटिंग थी.

राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने भी 2002 में आम पैटर्न को बदल दिया था. 11 सितंबर के हमलों के बाद रिपब्लिकनों ने प्रतिनिधि सभा में आठ सीटें जीतीं और सीनेट में भी बढ़त बनाई. राष्ट्रपति के लिए जनता के समर्थन में आई तेजी से पार्टी को फायदा हुआ.

1946 से 2022 के बीच हुए 20 मध्यावधि चुनावों में से छह में प्रतिनिधि सभा की 10 से कम सीटों में बदलाव हुआ. सात चुनावों में 11 से 39 सीटों के बीच बदलाव हुआ. बाकी सात चुनाव ‘वेव इलेक्शन’ थे, जिनमें 40 से ज्यादा सीटें एक पार्टी से दूसरी पार्टी के पास गईं.

1946 के बाद से हर मध्यावधि चुनाव में कम से कम पांच प्रतिनिधि सभा सीटें एक पार्टी से दूसरी पार्टी के पास गई हैं. इसलिए 2026 में रिपब्लिकनों से डेमोक्रेट्स की ओर सिर्फ पांच सीटों का शुद्ध बदलाव भी डेमोक्रेट्स को प्रतिनिधि सभा का कंट्रोल दिलाने के लिए पर्याप्त हो सकता है.

लेकिन हाल के रिकॉर्ड बताते हैं कि मध्यावधि चुनाव के सर्वे इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं. पिछले राष्ट्रपति—बिल क्लिंटन, जॉर्ज डब्ल्यू. बुश, बराक ओबामा, डॉनल्ड ट्रंप और जो बाइडेन—सभी ने अपने राष्ट्रपति कार्यकाल की शुरुआत कांग्रेस के दोनों सदनों में अपनी पार्टी के कंट्रोल के साथ की थी, लेकिन इन सभी ने अपने पहले दो साल के भीतर प्रतिनिधि सभा या सीनेट का कंट्रोल खो दिया.

जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के कार्यकाल में 2006 में रिपब्लिकनों को बड़ा झटका लगा. इराक युद्ध और सरकार के युद्ध से निपटने के तरीके के खिलाफ बढ़ती नाराजगी के बीच पार्टी ने प्रतिनिधि सभा की 30 सीटें गंवा दीं.

2010 में बराक ओबामा की डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा की 63 सीटें गंवाईं. वित्तीय संकट के बाद अर्थव्यवस्था में सुधार के दौरान मतदाता उनकी सरकार के खिलाफ हो गए थे.

2018 में ट्रंप के पहले मध्यावधि चुनाव के नतीजे मिले-जुले रहे. रिपब्लिकनों ने सीनेट में सीटें बढ़ाईं, लेकिन प्रतिनिधि सभा का नियंत्रण खो दिया. इससे डेमोक्रेट्स को प्रशासन की जांच के लिए एक महत्वपूर्ण मंच मिल गया.

भारत के लिए चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं

मध्यावधि चुनाव के नतीजों का असर वॉशिंगटन से बाहर भी होगा. इसमें अमेरिका के साथ भारत के व्यापार, टेक्नोलॉजी और रक्षा संबंध भी शामिल हैं.

कांग्रेस के पास संघीय खर्च, विदेशी व्यापार और कार्यपालिका की निगरानी से जुड़ी महत्वपूर्ण शक्तियां हैं. इसलिए कांग्रेस में राजनीतिक समीकरण बदलने से ट्रंप के लिए उन नीतियों को लागू करना आसान या मुश्किल हो सकता है, जिनका भारत पर सीधा असर पड़ता है.

व्यापार सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है. ट्रंप प्रशासन ने 2025 में भारतीय सामानों पर भारी आयात शुल्क लगाया था. इसके लिए भारत की ओर से रूसी कच्चा तेल खरीदते रहने को वजह बताया गया था. बातचीत के बाद दोनों देशों ने फरवरी 2026 में एक अंतरिम व्यवस्था की घोषणा की. इसके तहत अमेरिका ने भारतीय मूल के सामान पर 18 प्रतिशत पारस्परिक शुल्क लगाने की बात कही थी.

अगर डेमोक्रेट्स प्रतिनिधि सभा पर नियंत्रण हासिल करते हैं, तो प्रशासन की शुल्क नीतियों और व्यापार वार्ताओं को लेकर कांग्रेस की निगरानी बढ़ सकती है. इससे ट्रंप के लिए व्यापार नीति में आगे बदलाव करना भी मुश्किल हो सकता है.

हालांकि, कांग्रेस में सत्ता बदलने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि संरक्षणवादी नीतियां खत्म हो जाएंगी. रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स दोनों ही अमेरिकी उद्योगों और घरेलू आपूर्ति श्रृंखलाओं को बचाने वाली नीतियों का समर्थन करते रहे हैं.

आव्रजन भी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा है. सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने नए H-1B वीजा आवेदनों पर 1 लाख डॉलर का शुल्क लगाया था. इससे भारतीय पेशेवरों और भारत के सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग पर असर पड़ा, जो अमेरिकी श्रम बाजार तक पहुंच पर काफी निर्भर है.

कांग्रेस की निगरानी से आव्रजन और प्रशासन की वीजा नीतियों को लागू करने को लेकर होने वाली बहस प्रभावित हो सकती है. हालांकि, डेमोक्रेट्स के बहुमत में आने का मतलब यह नहीं होगा कि ये बदलाव अपने आप वापस ले लिए जाएंगे.

रक्षा और टेक्नोलॉजी में सहयोग भी महत्वपूर्ण है. भारत और अमेरिका ने ट्रांसफॉर्मिंग द रिलेशनशिप यूटिलाइजिंग स्ट्रैटेजिक टेक्नोलॉजी यानी TRUST फ्रेमवर्क जैसी पहलों के तहत उन्नत टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर और रक्षा के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया है.

कांग्रेस के नेतृत्व में बदलाव से निगरानी और फंडिंग की प्राथमिकताएं प्रभावित हो सकती हैं. हालांकि, चीन के प्रभाव का मुकाबला करने में रणनीतिक हित को लेकर वॉशिंगटन में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स दोनों के बीच समर्थन है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: कश्मीर के शासक हमेशा से मस्जिदों पर नियंत्रण चाहते रहे हैं, ताजा विवाद भी इसी का हिस्सा है


 

share & View comments