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Sunday, 12 April, 2026
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युद्ध के बीच पाकिस्तान-UAE संबंधों में खटास, मुशाहिद हुसैन के बयान से बढ़ा विवाद

इस हफ़्ते की शुरुआत में, पाकिस्तान के सीनेटर और पूर्व सूचना एवं प्रसारण मंत्री मुशाहिद हुसैन ने UAE को एक 'बेबस राष्ट्र' बताया. उन्होंने यह बात तब कही, जब UAE ने इस्लामाबाद से 3.5 अरब डॉलर का कर्ज़ चुकाने को कहा.

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नई दिल्ली: इस हफ्ते की शुरुआत में जब अमेरिका और ईरान दोनों ने युद्धविराम में पाकिस्तान की भूमिका की पुष्टि की, उसी समय पाकिस्तान के एक अहम व्यक्ति की यूएई पर की गई सार्वजनिक टिप्पणी ने अबू धाबी और इस्लामाबाद के बीच बिगड़ते रिश्तों पर ध्यान खींचा. यह सब खाड़ी क्षेत्र में चल रहे युद्ध के बीच दक्षिण एशियाई देश के संतुलन बनाने की कोशिश के बीच हो रहा है.

मंगलवार को पाकिस्तानी सीनेटर मुशाहिद हुसैन ने यूएई को “बेबस देश” बताया, जब अमीरात ने इस्लामाबाद से 3.5 अरब डॉलर का कर्ज चुकाने को कहा. उन्होंने इस भुगतान को वित्तीय जिम्मेदारी नहीं बल्कि संकट में फंसे एक देश के लिए “भाईचारे की मदद” बताया.

दुनिया न्यूज को दिए इंटरव्यू में हुसैन, जो पाकिस्तान के पूर्व सूचना और प्रसारण मंत्री रह चुके हैं और कभी राष्ट्रपति पद के लिए भी खड़े हुए थे, ने कहा कि यूएई पर आर्थिक दबाव क्षेत्रीय संघर्षों की वजह से है. उन्होंने यह भी दावा किया कि अबू धाबी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को 150 अरब डॉलर “दे दिए”, जिससे उसके भंडार कम हो गए.

सीनेटर ने पाकिस्तान और यूएई के पुराने रिश्तों का जिक्र करते हुए कहा कि पाकिस्तान ने “यूएई को बनाने में अहम भूमिका निभाई” और “उनकी सेना को ट्रेनिंग दी”, और ये संबंध शेख जायद बिन सुल्तान अल नाहयान के समय से चले आ रहे हैं.

उन्होंने भारत के साथ यूएई के करीबी रिश्तों पर भी टिप्पणी की और चेतावनी दी कि यह “दोस्ती” भारत द्वारा “अखंड भारत” के विचार के तहत अरब देश को अपने में मिलाने तक जा सकती है, क्योंकि यूएई की 45 प्रतिशत आबादी भारतीय है.

उन्होंने कहा, “मैं यूएई में अपने भाइयों को एक सलाह देना चाहता हूं कि जनाब, आपकी आबादी 1 करोड़ है, जिसमें 45 लाख भारतीय हैं. भारत के साथ बढ़ती दोस्ती को लेकर सावधान रहें. उम्मीद है कि आप भारत के अखंड भारत के विचार का निशाना नहीं बनेंगे. क्योंकि भारत की स्थिति खराब है और अखंड भारत का विचार अब सिर्फ पाकिस्तान, अफगानिस्तान या बांग्लादेश तक सीमित नहीं है, बल्कि खाड़ी के लोग भी इसमें शामिल हो सकते हैं.”

हुसैन की टिप्पणियों ने पाकिस्तान और यूएई के बीच उभरती दरार को साफ कर दिया, जबकि दोनों देशों के बीच लंबे समय से रणनीतिक साझेदारी रही है. हालांकि यह तनाव युद्ध से पहले ही शुरू हो गया था, जब यूएई ने इस्लामाबाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट चलाने का समझौता छोड़ दिया और पाकिस्तानियों के लिए वीजा मंजूरी कड़ी कर दी, लेकिन अब यह और बढ़ गया है क्योंकि पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच संदेशवाहक की भूमिका निभा रहा है.

पश्चिम एशिया के युद्ध में यूएई ईरान का एक बड़ा निशाना रहा है, भले ही यह संघर्ष अमेरिका और इजरायल ने शुरू किया हो. अमेरिका में यूएई के राजदूत यूसुफ अल ओतैबा के अनुसार, ईरान ने अमीरात पर 2180 से ज्यादा मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं. यह संख्या खाड़ी सहयोग परिषद के बाकी देशों ओमान, बहरीन, सऊदी अरब, कतर और कुवैत के मुकाबले ज्यादा है.

ईरान और यूएई के बीच तनाव उनके बयानों में भी दिखा है. ओतैबा ने 25 मार्च को वॉल स्ट्रीट जर्नल में लिखे लेख में कहा, “ईरानी हमें पसंद नहीं करते. सिर्फ इसलिए नहीं कि हम उनके पास हैं, बल्कि इसलिए भी कि हम उनसे बहुत अलग हैं.” वहीं ईरान के पूर्व विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद जरीफ के कुछ कथित टेलीग्राम संदेश लीक हुए, जिनमें उन्होंने कहा कि यूएई भी इजरायल जितना ही दुश्मन है.

इस पृष्ठभूमि में पाकिस्तान ने पिछले कुछ हफ्तों में अमेरिका के ईरान पर हमलों और ईरान के खाड़ी देशों पर जवाबी हमलों दोनों की निंदा की है. अब वह अपनी शांति मध्यस्थ की भूमिका का इस्तेमाल करके अपनी वैश्विक स्थिति मजबूत करना चाहता है और साथ ही युद्ध से पैदा हुई घरेलू आर्थिक समस्याओं को हल करना चाहता है, जिसमें ईंधन की कीमतों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी पर जनता का गुस्सा भी शामिल है.

इस संदर्भ में भारत के साथ यूएई की बढ़ती नजदीकी भी सामने आती है. जनवरी में यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने अचानक दो घंटे के छोटे दौरे पर नई दिल्ली का दौरा किया, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एयरपोर्ट पर उनका स्वागत किया.

सीनेटर हुसैन की टिप्पणियों के कुछ दिनों बाद, पाकिस्तान और यूएई के बीच रणनीतिक दूरी एक बार फिर तब दिखी जब प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने बुधवार को युद्धविराम के बाद एक्स पर धन्यवाद संदेश दिया. “इस्लामाबाद वार्ता के लिए रवाना होने” से पहले किए गए इस पोस्ट में उन्होंने अमेरिका, चीन, सऊदी अरब, तुर्की, मिस्र और कतर का जिक्र किया, लेकिन यूएई का नाम नहीं लिया.

मुशाहिद हुसैन कौन हैं

यूएई पर तीखी टिप्पणी करने वाले सीनेटर हुसैन का बैकग्राउंड काफी दिलचस्प है. वह पहले एक पत्रकार थे और द मुस्लिम नाम के पाकिस्तानी अंग्रेजी अखबार के सबसे युवा संपादक बने थे. यह अखबार अपनी बेबाक और स्वतंत्र रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता था और इसे शिया विद्वान आगा मुर्तजा पूया ने शुरू किया था, जो ईरान से आकर पाकिस्तान में बस गए थे.

1988 में एक इंटरव्यू छपने के बाद हुसैन को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी. पाकिस्तानी ब्रिगेडियर जनरल फिरोज खान की किताब ईटिंग ग्रास: द मेकिंग ऑफ द पाकिस्तानी बॉम्ब के अनुसार, जनवरी 1987 में पाकिस्तान के परमाणु बम के जनक माने जाने वाले डॉ अब्दुल कादिर खान ने हुसैन को इंटरव्यू देने के लिए सहमति दी थी, और हुसैन अपने साथ भारतीय पत्रकार कुलदीप नैयर को भी लेकर गए थे. किताब के अनुसार, इन दोनों अनुभवी पत्रकारों के सामने खान ने “पाकिस्तान की परमाणु क्षमता की सफलता की पुष्टि की” और यहां तक कहा कि पाकिस्तान के पास परमाणु बम है. यह बयान ऑपरेशन ब्रासटैक्स के दौरान एक संकेत के रूप में देखा गया.

जब यह इंटरव्यू प्रकाशित हुआ, तो इससे बड़ा विवाद खड़ा हो गया और हुसैन को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा.

1990 के दशक में हुसैन ने कुछ समय के लिए नवाज शरीफ की सरकार में काम किया और उन्हें सेना पर नागरिक नियंत्रण के समर्थन के लिए जाना जाता है. सूचना और प्रसारण मंत्री के रूप में उन्होंने 1998 के परमाणु परीक्षणों के दौरान अहम भूमिका निभाई और 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ के तख्तापलट के दौरान देशद्रोह के आरोप में जेल भी गए.

2003 में उन्होंने मुशर्रफ के राष्ट्रपति अभियान का समर्थन किया, लेकिन पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) के प्रति सहानुभूति बनाए रखी और 2016 में फिर से पार्टी में लौट आए. वह चीन और मध्य एशिया के साथ संबंधों के मजबूत समर्थक रहे हैं और इस्लामाबाद में चाइना-पाकिस्तान इंस्टीट्यूट के प्रमुख भी रहे हैं.

उन्हें “युद्ध समर्थक” के रूप में भी जाना जाता है. उन्होंने परमाणु परीक्षण के फैसले का समर्थन किया और कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई का बचाव किया.

पाकिस्तान की सांप्रदायिक राजनीति

सत्तारूढ़ पीएमएल-एन में शामिल शिया नेता हुसैन की टिप्पणियां पाकिस्तान के भीतर चल रही सांप्रदायिक राजनीति को भी दिखाती हैं. ईरान के बाद पाकिस्तान में शिया आबादी सबसे ज्यादा है. हालांकि वे अल्पसंख्यक हैं, लेकिन उनकी संख्या कुल आबादी का लगभग 15 प्रतिशत मानी जाती है.

पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर, जिनका नाम अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के युद्धविराम के ऐलान में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ लिया गया था, ने पिछले महीने रावलपिंडी में एक इफ्तार कार्यक्रम में शिया धर्मगुरुओं से कहा था, “अगर आपको ईरान इतना पसंद है, तो ईरान चले जाओ.”

जैसे-जैसे पाकिस्तान सऊदी अरब के प्रभाव वाले गुट की ओर झुक रहा है, आसिम मुनीर के शियाओं को लेकर दिए गए बयान को शिया नेताओं ने अपमानजनक और भड़काऊ बताया.

उन्होंने पाकिस्तानी सेना पर आरोप लगाया कि वह “अमेरिका और इजरायल के कहने पर पाकिस्तान के हितों के खिलाफ काम कर रही है” और “सरकारों को गिराकर देश को बर्बाद कर रही है”. शिया उलेमा काउंसिल पाकिस्तान के केंद्रीय उपाध्यक्ष अल्लामा सैयद सिब्तैन हैदर सब्जवारी ने मुनीर से कहा कि “अगर आपको अपने मालिक अमेरिका और इजरायल से इतना प्यार है, तो आप ही पाकिस्तान छोड़ दें.”

इसी महीने की शुरुआत में एक अन्य प्रमुख शिया धर्मगुरु शेख करामत हुसैन नजफी ने भी प्रधानमंत्री शरीफ और पीएमएल-एन से गाजा पीस बोर्ड से अलग होने को कहा था. उन्होंने आरोप लगाया कि यह बाहरी ताकतों के प्रभाव में बनाया गया है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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