(इलियाना मदीना, मेलबर्न विश्वविद्यालय; एलिस एक्सनरोवा, चार्ल्स विश्वविद्यालय; अमांडा एम फ्रैंकलिन, ला ट्रोब विश्वविद्यालय; केट अंबर्स, वेस्टर्न सिडनी विश्वविद्यालय; विलियम एलन, स्वानसी विश्वविद्यालय)
मेलबर्न, 26 सितंबर (द कन्वरसेशन) जानवरों की दुनिया अविश्वसनीय रूप से रंगीन है और रंग अस्तित्व के लिए लगातार जारी संघर्ष में अहम हथियार साबित होते हैं।
ज्यादातर जानवर शिकारियों से बचने के लिए छलावरण का सहारा लेते हैं। वहीं, कुछ जानवर गहरे और चमकीले रंग दिखाकर संभावित शिकारियों को आगाह करते हैं कि वे उनके लिए उपयुक्त शिकार नहीं हैं। शिकारियों को आगाह करने की यह रणनीति “एपोसेमेटिज्म” या चेतावनी रंगीकरण कहलाती है। हालांकि, “एपोसेमेटिज्म” छलावरण से कम प्रचलित है, लेकिन पर्यावरणीय दबावों के कारण तितलियों, भृंगों, कीड़ों, समुद्री स्लग, जहरीले मेंढकों और यहां तक कि पक्षियों ने भी स्वतंत्र रूप से इस रणनीति को अपना लिया है।
ऐसे में मन में यह सवाल उठना लाजमी है कि जानवरों की विभिन्न नस्लें इनमें से किसी एक रणनीति का इस्तेमाल क्यों करती हैं। क्या इनमें से कोई एक रणनीति आमतौर पर ज्यादा सफल होती है? किन विशिष्ट परिस्थितियों में एक रणनीति दूसरी रणनीति से बेहतर साबित होती है? ‘साइंस’ पत्रिमा में शुक्रवार को प्रकाशित हमारा नया अध्ययन इन सवालों के जवाब देने की कोशिश करता है।
अलग-अलग रणनीतियों की आजमाइश
-छलावरण और “एपोसेमेटिज्म” दोनों ही रणनीतियां एक ही क्षेत्र में साथ-साथ अपनाई जा सकती हैं। मिसाल के तौर पर, ऑस्ट्रेलिया में शिकारियों की आंखों में धूल झोंकने के लिए ‘कैटीडिड’ और ‘लाइकेन’ मकड़ियों सहित कई कीट छलावरण का सहारा लेते हैं।
वहीं, दूसरी ओर ‘कॉटन हार्लेक्विन बग’ (शहरी क्षेत्रों में पाया जाने वाला बदबूदार कीड़ा) और ‘हैंडमेडन मॉथ’ जैसी नस्लें चटक नारंगी और लाल रंग प्रदर्शित करती हैं, जिससे शिकारियों को पता चलता है कि वे उनके लिए उपयुक्त शिकार नहीं हैं। कुछ जानवर जैसे कि पहाड़ी कैटीडिड, रंग बदलकर या रंगीन धारियों को छिपाकर या प्रकट करके दोनों रणनीतियों का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, ऐसे जानवरों की संख्या बहुत कम होती है।
इस बारे में दर्जनों सिद्धांत हैं कि क्यों कुछ नस्लें चटक रंग प्रदर्शित करने के बजाय छलावरण का सहारा लेती हैं।
छोटे स्तर पर किए गए स्थानीय अध्ययनों ने अलग-अलग कारकों के प्रभाव को स्वतंत्र रूप से परखने की कोशिश की है। उदाहरण के लिए, हम जानते हैं कि छलावरण रणनीतियों की सफलता में प्रकाश का स्तर महत्वपूर्ण होता है। हम यह भी जानते हैं कि चेतावनी देने के लिए चटक रंगों के प्रदर्शन संबंधी रणनीति की सफलता अक्सर इस बात पर निर्भर करती है कि शिकारियों ने पहले शिकार का अनुभव किया हो और उन्हें चेतावनी संकेतों को गंभीरता से लेने की बात पता हो।
लेकिन क्या प्रकाश का स्तर या शिकारी का जागरूक होना ज्यादा अहम है? किसी एक जगह के नतीजे हमें उस जगह के बारे में बताते हैं, लेकिन हम दुनिया भर में एक जैसी रणनीतियों पर अमल होते देखते हैं।
क्या रणनीतियां हर जगह एक जैसा असर दिखाती हैं?
इस रहस्य को सुलझाने के लिए हमारे सहयोगियों की टीम ने दुनिया के 16 देशों के अलग-अलग जंगलों में एक ही प्रयोग किया, जहां प्रकाश का स्तर अलग-अलग था और शिकार एवं शिकारी समुदाय भी अलग-अलग थे।
15,000 कृत्रिम शिकार का सहारा लिया
-हमने कुल मिलाकर 15,000 से अधिक कृत्रिम शिकार (कागज से बने पतंगे) तैनात किए, जो तीन अलग-अलग रंगों के थे : पहला-नारंगी और काले रंग का सामान्य चेतावनी पैटर्न दर्शाने वाले, दूसरा-धूसर भूरा रंग दर्शाने वाले, जो पर्यावरण के अनुकूल रंग ढाल लेते हैं और तीसरा-चटक नीले और काले रंग का असामान्य चेतावनी पैटर्न दर्शाने वाले।
शिकारी को आकर्षित करने के लिए प्रत्येक कृत्रिम शिकार में खाद्य वस्तुओं में लगने वाला कीड़ा डाला गया था, ताकि यह पता लगाया जा सके कि रंगों पर आधारित बचाव रणनीति अस्तित्व को बनाए रखने में कितनी मददगार साबित होती है।
दो अलग-अलग चेतावनी पैटर्न दर्शाने वाले रंगों के इस्तेमाल से हमें यह खंगालने में मदद मिली कि क्या शिकारी नारंगी और काला रंग प्रदर्शित करने वाले कीटों के शिकार से इसलिए बचते हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि ऐसे शिकार को नजरअंदाज किया जाना चाहिए या फिर इसलिए कि वे बहुत स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
हमने पाया कि कोई एक रणनीति “सर्वश्रेष्ठ” नहीं है। बल्कि, स्थानीय शिकारी, स्थानीय शिकार और जंगल में प्रकाश का स्तर, ये सब मिलकर तय करते हैं कि छलावरण या “एपोसेमेटिज्म” में से कौन-सी बचाव रणनीति ज्यादा असरदार साबित होगी।
किस रंग का शिकार हमले से बचने में सबसे अधिक सफल रहा, यह समुदाय में मौजूद शिकारियों और शिकार पर हमला करने की उनकी तीव्रता पर सबसे अधिक निर्भर करता था। हमने पाया कि जिन जगहों पर शिकारियों के हमले बहुत ज्यादा होते हैं और जहां भोजन के लिए प्रतिस्पर्धा बहुत अधिक होती है, वहां शिकारियों के खतरनाक या अरुचिकर दिखने वाले शिकार पर हमला करने की संभावना ज्यादा होती है। इसका मतलब यह है कि शिकार की अधिकता वाले इलाकों में छलावरण सबसे ज्यादा सुरक्षित रणनीति है।
हालांकि, छलावरण का सहारा लेने वाले शिकार हर वातावरण में उतनी अच्छी तरह से नहीं छिप सकते। मिसाल के तौर पर, अच्छी रोशनी वाले वातावरण में छलावरण बचाव में कारगर साबित नहीं होता। लेकिन बात अगर नारंगी और काले रंग के चेतावनी पैटर्न के प्रदर्शन की करें, तो प्रकाश के स्तर का इसकी सफलता पर कोई असर नहीं पड़ता।
शिकार से अवगत होना भी मायने रखता है। जिन जगहों पर छलावरण का सहारा लेने वाले शिकार बहुत अधिक संख्या में होते हैं, वहां छिपना कम कारगर होता है, क्योंकि शिकारी शायद छिपे हुए शिकार को ढूंढ़ना सीख जाते हैं।
दूसरी ओर, जिन जगहों पर शिकारियों को आगाह करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले रंग समान थे, वहां उन्हें (शिकारियों को) ऐसे शिकार से बचने की कला में तो महारत हासिल थी, लेकिन वे असमान चेतावनी संकेतों का आकलन करने में सक्षम नहीं थे। यह दर्शाता है कि शिकारी परिचित चेतावनी संकेतों से बचना सीख जाते हैं, जिससे यह समझने में मदद मिलती है कि इतने सारे जानवर एक जैसे रंग संयोजन का सहारा क्यों लेते हैं।
(द कन्वरसेशन) पारुल मनीषा
मनीषा
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