scorecardresearch
Monday, 30 March, 2026
होमविदेशबांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री हसीना को “मानवता के विरुद्ध अपराध” के लिए मौत की सजा सुनाई गई

बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री हसीना को “मानवता के विरुद्ध अपराध” के लिए मौत की सजा सुनाई गई

Text Size:

ढाका, 17 नवंबर (भाषा) बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना को पिछले वर्ष जुलाई में उनकी सरकार के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शनों के दौरान किए गए ‘‘मानवता के विरुद्ध अपराधों’’ के लिए सोमवार को एक विशेष न्यायाधिकरण द्वारा उनकी अनुपस्थिति में मौत की सजा सुनाई गई।

महीनों तक चले मुकदमे के बाद अपने फैसले में बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (आईसीटी) ने 78 वर्षीय अवामी लीग नेता को हिंसक दमन का “मास्टरमाइंड और प्रमुख सूत्रधार” बताया, जिसमें सैकड़ों प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी।

पिछले वर्ष पांच अगस्त को बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों के कारण बांग्लादेश से भागने के बाद से हसीना भारत में रह रही हैं। इससे पहले अदालत ने उन्हें भगोड़ा घोषित किया था।

अपनी प्रतिक्रिया में हसीना ने कहा कि यह फैसला एक “गैरअधिकृत न्यायाधिकरण द्वारा दिया गया है, जिसकी स्थापना और अध्यक्षता एक अनिर्वाचित सरकार द्वारा की गई है, जिसके पास कोई लोकतांत्रिक जनादेश नहीं है।”

उन्होंने एक बयान में कहा, “वे पक्षपाती और राजनीति से प्रेरित हैं। मृत्युदंड की अपनी घृणित मांग में, वे अंतरिम सरकार के भीतर चरमपंथी लोगों के निर्लज्ज और जानलेवा इरादे को उजागर करते हैं, जो बांग्लादेश की अंतिम निर्वाचित प्रधानमंत्री को हटाना चाहते हैं और अवामी लीग को एक राजनीतिक ताकत के रूप में खत्म करना चाहते हैं।”

हसीना ने कहा कि वह उनपर “आरोप लगाने वालों” का सामना उचित न्यायाधिकरण में करने से नहीं डरतीं, जहां साक्ष्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन और परीक्षण किया जा सकता है।

उन्होंने कहा, “इसीलिए मैंने अंतरिम सरकार को बार-बार चुनौती दी है कि वह इन आरोपों को हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) के समक्ष लाए।”

यह फैसला बांग्लादेश में संसदीय चुनावों से कुछ महीने पहले आया है। हसीना की अवामी लीग पार्टी को फरवरी में होने वाले चुनावों में भाग लेने से रोक दिया गया है।

ढाका में कड़ी सुरक्षा वाले अदालत कक्ष में फैसला पढ़ते हुए न्यायाधिकरण ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने बिना किसी संदेह के यह साबित कर दिया है कि पिछले साल 15 जुलाई से 15 अगस्त के बीच छात्रों के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों पर घातक कार्रवाई के पीछे हसीना का ही हाथ था।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि ‘‘जुलाई विद्रोह’’ के नाम से, करीब एक महीने तक चले आंदोलन के दौरान 1,400 लोग मारे गए थे।

हसीना को निहत्थे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ घातक बल प्रयोग का आदेश देने, भड़काऊ बयान देने और ढाका तथा आसपास के इलाकों में कई छात्रों की हत्या के लिए अभियान चलाने की अनुमति देने के लिए मौत की सजा सुनाई गई है।

हाल ही में मीडिया साक्षात्कारों में हसीना ने आईसीटी को उनके विरोधियों द्वारा संचालित “कंगारू कोर्ट” बताया था।

‘कंगारू कोर्ट’ शब्द एक मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है जिसका प्रयोग ऐसी अदालतों के लिए किया जाता है जिनकी कार्यवाही स्वीकृत कानूनी मानदंडों से इतनी अलग हो जाती है कि उसे निष्पक्ष या न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

आईसीटी की स्थापना मूल रूप से 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना के कट्टर सहयोगियों पर मुकदमा चलाने के लिए की गई थी, लेकिन वर्तमान प्रशासन ने इसमें संशोधन करके हसीना सहित पिछली सरकार के नेताओं को इसके अधिकार क्षेत्र में ला दिया।

हसीना शासन के पतन के बाद से अधिकांश अवामी लीग नेता या तो गिरफ्तार कर लिए गए हैं या देश छोड़कर भाग गए हैं।

आईसीटी ने कहा कि भड़काऊ बयानों के माध्यम से हिंसा भड़काने और प्रदर्शनकारी छात्रों पर हमला करने वाले अपराधियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने से हसीना ने मानवता के खिलाफ अपराध किया है।

इसमें कहा गया है कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर हेलीकॉप्टरों और घातक हथियारों के इस्तेमाल का भी आदेश दिया।

भाषा प्रशांत दिलीप

दिलीप

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

share & View comments