नई दिल्ली: दो दशक बाद अमेरिका ने बुधवार को इराक में अपनी सैन्य मौजूदगी औपचारिक रूप से खत्म करने का ऐलान किया. अमेरिका की सेना ऐसे देश को पीछे छोड़कर गई है, जो अपनी सुरक्षा को लेकर एक तरफ अपने ताकतवर पड़ोसी ईरान और दूसरी तरफ क्षेत्र में अमेरिका की भूमिका के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है.
अमेरिकी सेना की वापसी ऐसे समय हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध जारी है. अमेरिका के रक्षा विभाग ने सार्वजनिक रूप से बताया है कि 28 फरवरी से अब तक उसके 14 सैन्यकर्मियों की मौत हुई है. इनमें से कम से कम छह की मौत इराक में हुई.
2003 में सद्दाम हुसैन की सरकार को सत्ता से हटाने से लेकर 2014 से 2017 के बीच इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड द लेवेंट (ISIL) से लड़ाई और ईरान के साथ युद्ध तक, अमेरिकी सेना लगभग लगातार इराक में मौजूद रही.
2011 में अमेरिका की पहले की वापसी के बाद इराक में ISIL का प्रभाव बढ़ा. इस संगठन ने जल्द ही इराक के कुछ हिस्सों, जिसमें मोसुल भी शामिल था, और पड़ोसी सीरिया के कुछ इलाकों पर कब्जा कर लिया. अमेरिका ने जून 2014 में ऑपरेशन इनहेरेंट रिजॉल्व शुरू करते हुए इराक में फिर से अपनी सेना भेजी और ISIL के खिलाफ लड़ाई शुरू की.
इन दोनों सैन्य अभियानों में इराक में दो दशक की अमेरिकी मौजूदगी के दौरान 4,500 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक मारे गए. रक्षा विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 2003 में इराक में अमेरिका और उसके सहयोगियों की सैन्य मौजूदगी शुरू करने वाले ऑपरेशन इराकी फ्रीडम में 4,418 अमेरिकी सैन्यकर्मी मारे गए. वहीं, ऑपरेशन इनहेरेंट रिजॉल्व में 123 सैन्यकर्मियों की मौत हुई.
अमेरिकी सेना की वापसी का ईरान और उसके सहयोगी मिलिशिया ने स्वागत किया है. ये मिलिशिया अब भी इराक में सक्रिय हैं. बगदाद के लिए स्थिति अब भी काफी नाजुक है. वह अपनी हाल ही में वापस मिली संप्रभुता की रक्षा करने की कोशिश कर रहा है और साथ ही अमेरिका और ईरान के हितों के बीच संतुलन बना रहा है. इस बीच, ऐसी खबरें भी हैं कि ISIL के बचे हुए सदस्य फिर से संगठित हो सकते हैं.
अमेरिकी सेना की वापसी से इराक के प्रधानमंत्री अली अल-जैदी की देश में सभी सशस्त्र मिलिशिया को जून 2027 तक पूरी तरह से हथियारों से मुक्त करने की महत्वाकांक्षी योजना को मदद मिलेगी. नए प्रधानमंत्री ने इस महीने की शुरुआत में द न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में सशस्त्र मिलिशिया को हथियारों से मुक्त करने के अपने लक्ष्य और इसकी तारीखों के बारे में बताया था.
दिप्रिंट ने इराक में अमेरिकी सैन्य अभियानों के इतिहास और अमेरिका की सेना की वापसी का इस पश्चिम एशियाई देश के भविष्य पर क्या असर होगा, इस पर नज़र डाली है.
ऑपरेशन इराकी फ्रीडम
मार्च 2003 में युद्ध की शुरुआत करीब एक साल पहले ही हो गई थी. जनवरी 2002 में उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने अपने स्टेट ऑफ द यूनियन भाषण में इराक, ईरान और उत्तर कोरिया को “बुराई की धुरी” यानी “axis of evil” का हिस्सा बताया था.
यह बयान अमेरिका में 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के कुछ महीने बाद आया था. इन हमलों में विमानों को हाईजैक करके उन्हें वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की जुड़वां इमारतों से टकराया गया था. इसमें करीब 3,000 अमेरिकी नागरिकों की मौत हुई थी और इस हमले ने अमेरिका की सुरक्षा व्यवस्था को हिलाकर रख दिया था.
काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के मुताबिक, बुश ने 2002 के बीच तक सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने की मांग शुरू कर दी थी. उनके सलाहकार और प्रशासन इराक के सामूहिक विनाश के हथियारों यानी Weapons of Mass Destruction (WMDs) के कार्यक्रम को लेकर अलग-अलग देशों से बात कर रहे थे.
सितंबर 2002 तक बुश ने संयुक्त राष्ट्र को चेतावनी दी कि अगर इराक के कथित WMD कार्यक्रम की जांच को तेज़ करने के लिए कदम नहीं उठाए गए तो सैन्य कार्रवाई की जा सकती है. आखिरकार मार्च 2003 में अमेरिका और उसके कुछ सहयोगियों, जिनमें ऑस्ट्रेलिया, पोलैंड और ब्रिटेन शामिल थे, ने हुसैन की सरकार के खिलाफ सैन्य हमले शुरू कर दिए. यह हमला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की मंजूरी के बिना किया गया था.
हुसैन की सरकार को पांच हफ्तों के अंदर गिरा दिया गया और बुश ने 1 मई 2003 को मशहूर तौर पर “Mission accomplished” यानी “मिशन पूरा हुआ” का ऐलान किया. इसके कुछ साल बाद एक राष्ट्रपति आयोग ने बुश को बताया कि हुसैन के WMD कार्यक्रम को लेकर अमेरिका की खुफिया जानकारी युद्ध से पहले लगाए गए “लगभग सभी आकलनों में पूरी तरह गलत” थी.
इसके बावजूद अमेरिका अब ऐसे देश में फंस चुका था, जहां व्यवस्था पूरी तरह टूट चुकी थी. इराक में अमेरिका के नेतृत्व में चलाए गए सैन्य अभियान के बाद देश के शिया बहुसंख्यक समुदाय और सुन्नी अल्पसंख्यक समुदाय के बीच सांप्रदायिक हिंसा का दौर शुरू हो गया. हुसैन के शासन में शिया समुदाय लंबे समय तक दबाया गया था, जबकि सुन्नी समुदाय दो दशक से ज्यादा समय तक देश पर शासन करता रहा था.
इराक में अमेरिकी सेना की मौजूदगी से भी लोगों में गुस्सा बढ़ा. अमेरिकी सैनिकों पर अबू ग़रीब जेल में कैदियों को यातना देने के आरोप लगे और बाद में इसमें उनकी भूमिका भी सामने आई. इसके अलावा, निजी सैन्य कंपनियों के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल और बिना कानूनी प्रक्रिया के लोगों की हत्या की खबरों ने भी अमेरिका की छवि को नुकसान पहुंचाया.
इराक में अमेरिका की पहली सैन्य मौजूदगी के दौरान 4,400 से ज्यादा अमेरिकी सैन्यकर्मी मारे गए. पूरे देश में हिंसा फैलती गई, क्योंकि अल-कायदा और दूसरे आतंकी संगठनों ने पूरे इराक में गुरिल्ला युद्ध शुरू कर दिया.
ज्यादातर मौतें मई 2003 में बुश के यह ऐलान करने के बाद हुईं कि हुसैन की सरकार को सत्ता से हटाने का मिशन “पूरा हो गया” है. 2006 तक कई अध्ययनों में कहा गया कि अमेरिका युद्ध हार रहा था. इसके बाद 2007 में अमेरिकी सैनिकों की संख्या बढ़ाई गई. उस समय इराक में 1.70 लाख से ज्यादा अमेरिकी सैन्यकर्मी सक्रिय थे.
एक साल बाद इराक की सरकार ने अमेरिका के साथ देश से उसकी सेना की वापसी को लेकर बातचीत की. 2009 तक ज्यादातर अमेरिकी सैनिक शहरों से बाहर चले गए और 2011 तक पूरी तरह वापस चले गए. 15 दिसंबर 2011 को करीब 700 सैन्यकर्मियों को छोड़कर सभी अमेरिकी सैनिक इराक से बाहर चले गए. ये करीब 700 सैनिक प्रशिक्षण के लिए वहां रुके थे.
ऑपरेशन इनहेरेंट रिजॉल्व
अमेरिका की यह वापसी तीन साल से भी कम समय तक चली. 2007 में अमेरिकी सैनिकों की संख्या बढ़ाए जाने के बाद इराक में अल-कायदा की मौजूदगी कम हो गई थी. लेकिन 2011 में अमेरिकी सेना की वापसी के बाद AQI के बचे हुए सदस्य एक साथ आए और ISIL बनाया.
अरब स्प्रिंग और सीरिया में चल रहे गृहयुद्ध का फायदा उठाकर ISIL ने दोनों देशों में अपने अभियान शुरू किए. जून 2014 तक इस संगठन ने अपना नाम बदलकर ISIS यानी इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सिरिया कर लिया था. उसने मोसुल पर कब्जा कर लिया था और इराक के करीब 40 प्रतिशत और सीरिया के एक-तिहाई हिस्से पर उसका नियंत्रण था. इस आतंकी संगठन के तत्कालीन नेता अबू बकर अल-बगदादी ने 2014 में “खिलाफत” का ऐलान किया.
अगस्त 2014 में अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन ने इराक में हवाई हमले शुरू किए. उसी साल बाद में सीरिया में भी हवाई हमले शुरू किए गए. अक्टूबर 2014 में अमेरिका ने ऑपरेशन इनहेरेंट रिजॉल्व शुरू किया. इसके साथ इराक में अमेरिकी सैन्य अभियान का दूसरा दौर शुरू हुआ.
अगले साल के आखिर तक अमेरिका के हवाई हमलों की मदद से इराकी सेना रमादी जैसे शहरों को फिर से अपने नियंत्रण में लेने में कामयाब रही. वहीं, सीरिया में ISIL का प्रभाव बढ़ता रहा और रक्का के आसपास के उसके मुख्य इलाकों पर उसका कब्जा बना रहा.
अमेरिका और उसके सहयोगी ISIL के ठिकानों पर लगातार हमले करते रहे. 2017 तक उसके करीब 95 प्रतिशत इलाके पर फिर से सरकार का नियंत्रण हो गया था. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2018 में ISIL पर अमेरिका की जीत का ऐलान किया.
हालांकि, अमेरिकी सेना की मौजूदगी बनी रही. 2024 में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने इराकी सरकार के साथ एक समझौता किया था, जिसके तहत 30 सितंबर 2026 तक अमेरिकी सैनिकों को इराक से वापस जाना था.
बुधवार को अमेरिकी सेना ने अपने आखिरी बड़े सैन्य अड्डे इरबिल से सैनिकों की औपचारिक वापसी का ऐलान किया. इसके साथ ही इस क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों के दो दशक का दौर खत्म हो गया.
ईरान के समर्थन वाली कई सशस्त्र मिलिशिया ने अल-जैदी को लेकर गंभीर चेतावनियां दी हैं. खासकर तब, अगर इराकी प्रधानमंत्री तेहरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों को लागू करने की दिशा में कोई कदम उठाते हैं. इससे इराक में ईरान के प्रभाव और ताकत बढ़ने की आशंका पैदा हुई है.
इस महीने की शुरुआत में ही सऊदी अरब ने इराक में मौजूद मिलिशिया पर उस हमले को अंजाम देने का आरोप लगाया था, जिसकी वजह से उसकी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन कुछ समय के लिए बंद हो गई थी. इससे दुनिया में तेल की सप्लाई पर और असर पड़ा. ईरान समर्थित मिलिशिया पहले भी इराक में अमेरिकी ठिकानों पर हमला कर चुके हैं.
2020 में ट्रंप ने बगदाद में ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के प्रमुख कासिम सुलेमानी की हत्या को मंजूरी दी थी. पिछले एक दशक में तेहरान ने इराक के राजनीतिक दलों के साथ अपने संबंध और ज्यादा मजबूत किए हैं.
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