वेटिकन सिटी, 15 मई (भाषा) पोप फ्रांसिस ने रविवार को वेटिकन में देवसहायम पिल्लई को संत की उपाधि प्रदान की। पिल्लई ने 18वीं सदी में ईसाई धर्म अपनाया था।
देवसहायम, पहले भारतीय आमजन हैं जिन्हें पोप ने संत घोषित किया है।
पोप ने संत घोषित करने के लिए आयोजित समारोह का इस्तेमाल वैश्विक नेताओं से दोबारा यह अपील करने के लिए किया कि वे ‘‘शांति के नायक हो सकते हैं, युद्ध के नहीं।’’
पोप फ्रांसिस (85) ने रविवार को वेटिकन के सेंट पीटर बैसिलिका में संत की उपाधि प्रदान करने के लिए आयोजित प्रार्थना सभा में देवसहायम पिल्लई को संत घोषित किया। इस समारोह में 10 नए संतों के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए पूरी दुनिया से आए करीब 50 हजार श्रद्धालुओं के साथ-साथ सरकारी प्रतिनिधिमंडलों ने भी हिस्सा लिया।
देवसहायम को पुण्य आत्मा घोषित करने की प्रक्रिया शुरू करने की अनुशंसा वर्ष 2004 में कोट्टर धर्मक्षेत्र, तमिलनाडु बिशप परिषद और कॉन्फ्रेंस ऑफ कैथलिक बिशप ऑफ इंडिया के अनुरोध पर की गई थी।
पिल्लई के चमत्कारिक परोपकारी कार्यों को पोप फ्रांसिस ने वर्ष 2014 में मान्यता दी थी। इससे वर्ष 2022 में उन्हें (पिल्लई को) संत घोषित किए जाने का रास्ता साफ हो गया था।
वेटिकन में पिछले दो साल में पहली बार संत की उपाधि प्रदान करने के लिए समारोह का आयोजन किया गया। पोप फ्रांसिस को पिछले कुछ महीनों से दाएं घुटने में दर्द की शिकायत है। वह व्हील चेयर पर बैठकर समारोह की अध्यक्षता करने आए।
अपने संबोधन में पोप ने दुनिया में चल रहे कई युद्धों की निंदा की और विश्व के नेताओं से जिम्मेदारी लेने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा, ‘‘यह दुखद है कि दुनिया में दूरियां बढ़ रही हैं और तनाव एवं युद्धों का विस्तार हो रहा है।’’ पोप ने उम्मीद जताई कि नए संत ‘एकसाथ रहने और संवाद के रास्ते’ समाधान की प्रेरणा दें।’’
आधिकारिक ‘वेटिकन न्यूज’ ने पोप को उद्धृत किया, ‘‘वे शांति के नायक बनें, न कि युद्ध के, खासतौर पर उन लोगों के दिलोदिमाग में यह भाव आए जो बड़ी जिम्मेदारी के पद ग्रहण करते हैं।’’
समारोह की शुरुआत में पोप ने 10 नए संतों की घोषणा की, जिनमें छह पुरुष और चार महिलाएं शामिल हैं। नए घोषित संतों में टाइटस ब्रांड्समा, लजारस देवसहायम, सीज़र डी बस, लुइगी मारिया पलाज़ोलो, गुइस्तिनो मारिया रसोलिलो, चार्ल्स डी फौकॉल्ड, मारिया रिविएर, मारिया फ्रांसेस्का जेसस रूबेट्टो, मारिया जेसस सैंटोकनाले और मारिया डोमेनिका मंटोवाणी शामिल हैं।
समारोह में जब देवसहायम के नाम की घोषणा की गई तब वहां तिरंगे के साथ मौजूद भारतीयों के समूह ने खुशी का इजहार किया।
प्रक्रिया पूरी होने के साथ ही पिल्लई पहले भारतीय आमजन बन गये जिन्हें मरणोपरांत संत घोषित किया गया है। उन्होंने वर्ष 1745 में ईसाई धर्म स्वीकार करने के बाद अपना नाम ‘लाजरस’ रखा था।
देवसहायम का जन्म 23 अप्रैल 1712 को एक हिंदू नायर परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम नीलकंठ पिल्लई था। वह कन्याकुमारी स्थित नट्टलम के रहने वाले थे जो तत्कालीन त्रावणकोर राज्य का हिस्सा था।
वह त्रावणकोर के महाराजा मार्तंड वर्मा के दरबार में अधिकारी थे। उन्हें डच नौसेना के कमांडर ने कैथलिक ईसाई धर्म की दीक्षा दी थी।
वेटिकन द्वारा उनके बारे में बताने के लिए तैयार नोट में कहा गया, ‘‘उपदेश देते हुए उन्होंने विशेष तौर पर जातिगत अंतर से परे सभी लोगों की समानता पर जोर दिया। इसकी वजह से उच्च वर्ग में उनके प्रति नफरत पैदा हुई। उन्हें वर्ष 1749 में गिरफ्तार किया गया था और उन्होंने मुश्किलों का सामना किया। 14 जनवरी 1752 को देवसहायम को गोली मार दी गई और अंतत: उन्हें शहादत का ताज मिला।’’
‘‘लजारस’’ या मलयालम में ‘‘देवसहायम’’ का अभिप्राय है, ‘‘ईश्वर मेरा मददगार है।’’
देवसहायम के जन्म और मृत्यु से जुड़े स्थान कोट्टर धर्मक्षेत्र में हैं, जो तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले में स्थित है।
देवसहायम को उनके जन्म के 300 साल बाद कोट्टर में दो दिसंबर, 2012 को ईसाई धर्मानुसार ‘सौभाग्यशाली’ (ब्लेस्ड) घोषित किया गया था।
वहीं, देवसहायम को संत की उपाधि प्रदान किए जाने के बाद केरल और तमिलनाडु के कुछ लातिन कैथोलिक गिरिजाघरों में रविवार को जश्न मनाया गया।
देवसहायम के संत घोषित किए जाने के उपलक्ष्य में कट्टादिमलाई स्थित गिरिजाघर में विशेष प्रार्थना आयोजित की गई। इसी तरह की प्रार्थना केरल के तिरुवनंतपुरम स्थित सेंट जोसफ लैटिन कैथोलिक कैथड्रिल में भी की गई।
भाषा धीरज सुरेश
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