कोलकाता, 27 अगस्त (भाषा) अंतरराष्ट्रीय शतरंज में प्रतिभावान किशोर आर प्रज्ञानानंदा और डी गुकेश की आश्चर्यजनक प्रगति ने कई माता-पिता को इस खेल को अपने बच्चों के लिए एक ‘करियर विकल्प’ के रूप में गंभीरता से सोचने के लिए प्रोत्साहित किया है।
टूर्नामेंट में बेहतरीन प्रदर्शन के बाद जब प्रज्ञानानंदा फिडे विश्व कप के फाइनल में पहुंचे तो उन्होंने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया।
शतरंज वास्तव में सबसे कम खर्चीले खेलों में से एक है। इसके लिए शुरुआती निवेश 50 रुपये से भी कम का होता है। शतरंज में महारत हासिल करने की यात्रा हालांकि इतनी आसान नहीं है। इसके लिए अनगिनत घंटों के अभ्यास और वर्षों के समर्पण की जरूरत होती है।
ग्रैंडमास्टर (जीएम) नॉर्म पाने वाले भारत के शुरुआती खिलाड़ियों में शामिल और भारतीय प्रशिक्षक आयोग के मौजूदा अध्यक्ष प्रवीण थिप्से कहा शतरंज में महाराथ हासिल करना आसान नहीं है। इसके लिए अनगिनत घंटों की मेहनत और समर्पण की जरुरत होती है।
विश्वनाथन आनंद और दिब्येंदु बरुआ के बाद भारत के तीसरे जीएम थिप्से ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘ मैंने इस खेल में कोई भी रकम निवेश नहीं किया था। हमने अध्ययन और चालों पर चर्चा करके खेल को स्वयं सीखा और 2450 से अधिक (ईएलओ) अंक तक पहुंचने में मुझे लगभग 600 मैच लगे।’’
उन्होंने बताया, ‘‘ आनंद ने लगभग 200 मैच खेले (जीएम बनने तक)। अगर आप गंभीरता से इस खेल से जुड़े है तो 1000 मुकाबले और विश्लेषण आपको वहां तक ले जाने के लिए पर्याप्त होंगे।’’
थिप्से ने कहा, ‘‘ प्रत्येक मैच का उचित विश्लेषण होना चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि आप वही गलती न दोहराएं। लेकिन अगर आप अगली बार भी उसी तरह (मैच) हारते हैं तो 10,000 गेम भी पर्याप्त नहीं होंगे।’’
थिप्से ने कहा कि माता-पिता को सिर्फ जीएम नॉर्म को ध्यान में रखकर सफलता के लिए शॉर्टकट नहीं अपनाना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘हम उत्कृष्टता की खोज में नहीं हैं। एक जीएम उपाधि आपको चैंपियन खिलाड़ी नहीं बनाएगी। औसतन हम एक लाख उम्मीदवारों में से एक चैंपियन देखते हैं।’’
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