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Wednesday, 30 September, 2026
होमरिपोर्टबालाघाट में बीमारी फैलने पर 57 मेडिकल टीमों ने 50 गांवों में की 43,451 लोगों की जांच

बालाघाट में बीमारी फैलने पर 57 मेडिकल टीमों ने 50 गांवों में की 43,451 लोगों की जांच

बच्चों में बुखार और दाने की शिकायत के बाद दुर्गम इलाकों में पहुंचीं मेडिकल टीमें, 647 गंभीर बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया.

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भोपाल/बालाघाट: मध्यप्रदेश सरकार ने बालाघाट जिले में अचानक फैली बीमारी से निपटने के लिए तुरंत कार्रवाई की. सरकार के निर्देश पर प्रशासन ने कई स्तरों पर काम शुरू किया. जिले में तुरंत डिस्ट्रिक्ट रैपिड रिस्पॉन्स टीम (DRRT) को सक्रिय किया गया. बीमारी को देखते हुए बाल रोग विशेषज्ञों, महामारी वैज्ञानिकों और कीट वैज्ञानिकों की विशेष टीमों को मौके पर भेजा गया. राष्ट्रीय स्तर की एक विशेष टीम ने भी प्रभावित इलाकों का दौरा किया. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी मामले का संज्ञान लिया और अधिकारियों को जरूरी निर्देश दिए. उन्होंने कहा कि सरकार जनता को लेकर संवेदनशील है और इस मामले पर गंभीरता से काम कर रही है.

विशेषज्ञों की 57 स्वास्थ्य टीमों ने 50 गांवों में जाकर 43 हजार 451 लोगों की जांच की. इनमें से 6,537 लोगों का घर पर ही इलाज किया गया. वहीं, गंभीर रूप से बीमार 647 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया.

बिरसा विकासखंड में 35 हजार 827 बच्चों को खसरा-रूबेला का टीका लगाया गया. दस्त से बचाव के लिए 1 लाख 63 हजार 902 परिवारों को ओआरएस और जिंक के पैकेट बांटे गए. इसके अलावा मलेरिया की रोकथाम के लिए 8 हजार 610 घरों में कीटनाशक का छिड़काव और फॉगिंग की गई.

26 हजार 865 लोगों की मलेरिया जांच की गई. इनमें 980 लोग संक्रमित पाए गए. उनका तुरंत इलाज कराया गया. प्रभावित इलाकों में 3 हजार 600 मच्छरदानियां भी बांटी गईं.

बीमारी के संकट के बीच बड़े स्तर पर वित्तीय और ढांचागत सुधार भी किए गए. गंभीर रूप से बीमार गर्भवती महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित तरीके से अस्पताल पहुंचाने के लिए बैहर, बिरसा और कटंगी विकासखंडों के लिए 3.60 लाख रुपये आवंटित किए गए.

टीकों को सुरक्षित तरीके से पहुंचाने के लिए 3.40 लाख रुपये अतिरिक्त दिए गए. जिले के 22 उप-स्वास्थ्य केंद्रों की मरम्मत के लिए 1.93 करोड़ रुपये और जरूरी उपकरण खरीदने के लिए 24 लाख रुपये मंजूर किए गए.

घुम्मुर उप-स्वास्थ्य केंद्र को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) में बदलने के लिए 66 लाख रुपये का प्रस्ताव मंत्रिमंडल को भेजा गया. स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए जिले में 54 नए डॉक्टरों की पदस्थापना की गई.

इसके अलावा मलेरिया नियंत्रण के लिए 1 सलाहकार और 4 तकनीकी सुपरवाइजर तैनात किए गए. महिला एवं बाल विकास विभाग ने 4 नए सीडीओपी नियुक्त किए और आंगनवाड़ियों में खाली पड़े 52 कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के पदों को भरा गया.

बालाघाट में राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर की टीमों के बीच बेहतर तालमेल और तेजी से की गई कार्रवाई से हजारों लोगों की जान बचाई गई.

टीमों ने सिर्फ बीमारी का इलाज ही नहीं किया, बल्कि इसके पीछे छिपे कारणों पर भी काम किया. इनमें दूषित पेयजल, अंधविश्वास और झोलाछाप डॉक्टरों की समस्या शामिल थी.

डॉक्टरों की पदस्थापना, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की नियुक्ति और उप-स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करना ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए जरूरी है. यह व्यवस्था लगातार मजबूत हो रही है.

पिछले 23 वर्षों में बालाघाट जिले ने संस्थागत प्रसव और टीकाकरण में सुधार किया है. इससे मातृ और शिशु मृत्यु दर में बड़ी कमी आई है.

गौरतलब है कि इस साल जुलाई के दूसरे सप्ताह में बालाघाट जिले के बिरसा विकासखंड के बोंदारी, कुंडेकसा, कोरका, डंडेकसा और सोनगुड्डा उप-स्वास्थ्य केंद्रों के आसपास के गांवों में बच्चों में अचानक बुखार और दाने होने की शिकायतें मिली थीं.

इसकी जानकारी मिलते ही मेडिकल टीमों ने तुरंत वहां जाने की तैयारी की. भारी बारिश के बावजूद टीमें दुर्गम इलाकों तक पहुंचीं. इन जगहों पर पहुंचना आसान नहीं था. वहां पहुंचकर टीमों ने बच्चों का इलाज शुरू किया.

अगर पिछले दो दशकों पर नजर डालें तो बालाघाट जिले ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में काफी प्रगति की है. वर्ष 2003 और वर्ष 2026 के आंकड़ों की तुलना से इसका पता चलता है.

संस्थागत प्रसव: वर्ष 2003 में यह 21.50% था, जो वर्ष 2026 में बढ़कर 92.10% हो गया.

सुरक्षित प्रसव: यह आंकड़ा वर्ष 2003 में 41.50% था, जो वर्ष 2026 में बढ़कर 94.10% हो गया.

पूर्ण टीकाकरण: बच्चों का पूर्ण टीकाकरण 47.50% से बढ़कर 92.70% हो गया.

मातृ मृत्यु: वर्ष 2003 में मातृ मृत्यु के करीब 176 मामले थे, जो वर्ष 2026 में घटकर 60 रह गए. इससे हर साल 116 महिलाओं की जान बचाई जा रही है. पिछले 23 वर्षों में करीब 2,650 माताओं की जान बचाई गई.

शिशु मृत्यु: वर्ष 2003 में शिशु मृत्यु के करीब 3,805 मामले थे, जो घटकर 1,560 रह गए. इससे हर साल 2,245 शिशुओं की जान बच रही है. पिछले 23 वर्षों में करीब 51,600 शिशुओं की जान बचाई गई.

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