Friday, 27 May, 2022
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योगी ने कैराना में कानून-व्यवस्था को चुनावी मुद्दा बनाया, लेकिन लोग चाहते हैं कि नेता रोजगार की बात करें, ‘पलायन’ की नहीं

कैराना मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्र है, जहां 80 प्रतिशत आबादी इसी समुदाय की है जबकि बाकी लोगों में जाट, गुर्जर, कश्यप, दलित और सैनी शामिल है. यहां 10 फरवरी को मतदान होना है.

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कैराना: कभी हिन्दुस्तानी संगीत के एक घराने के लिए ख्यात और औद्योगिक शहर माना जाने वाला कैराना आज बेरोजगारी की समस्या और सांप्रदायिक राजनीति का केंद्र बना हुआ है, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यूपी की चुनावी राजनीति में उतरने का बिगुल फूंकने के लिए शनिवार को इसी क्षेत्र को चुना था.

शाह के डोर-टू-डोर अभियान की शुरुआत का केंद्र बना कैराना 2016 से राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहा है, जब भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में समाजवादी पार्टी शासन के दौरान मुस्लिम बहुल इलाके से हिंदू परिवारों के कथित पलायन का मुद्दा उठाया था.

अपनी तरह के पहले ऐसे चुनाव प्रचार अभियान के जरिये शाह ने एक बार फिर इस मुद्दे को सुर्खियों में ला दिया है क्योंकि उन्होंने कानून और व्यवस्था की स्थिति पर योगी आदित्यनाथ सरकार के कामकाज की प्रशंसा की और इसे किसी भी क्षेत्र के विकास की पहली शर्त करार दिया.

उन्होंने कहा, ‘योगी जी ने कानून-व्यवस्था में सुधार किया है. अब पलायन करने पर बाध्य करने वालों को ही भागना पड़ रहा है. ऐसा ही विश्वास हम यूपी के लोगों में देख रहे हैं. मुझे लगता है कि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश भारत का सबसे विकसित राज्य बनेगा.’

कैराना विधानसभा क्षेत्र कैराना संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली चार सीटों में से एक है.

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भाजपा क्षेत्र में कथित अराजकता के लिए मुस्लिम ‘गैंगस्टर’ को जिम्मेदार ठहराती है, जिसे कथित तौर पर पूर्व सपा सरकार की तरफ से संरक्षण मिल रहा है और इस पर कार्रवाई भी की गई है.

पिछले हफ्ते, कैराना के मौजूदा विधायक नाहिद हसन को आगामी चुनावों के लिए नामांकन दाखिल करने के दौरान गिरफ्तार कर लिया था. अब हसन की बहन निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में है.

हालांकि, स्थानीय निवासियों का कहना है कि उनकी सबसे बड़ी समस्या ‘सांप्रदायिक तनाव’ और कानून-व्यवस्था की स्थिति नहीं बल्कि बेरोजगारी है. साथ ही कहा जा रहा है कि योगी सरकार आर्थिक मदद देने के अपने वादे को पूरा करने में नाकाम रही है.

‘पलायन’ एक मुद्दा

कैराना मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्र है, जिसमें 80 प्रतिशत मतदाता इसी समुदाय से आते हैं जबकि बाकी आबादी जाट, गुर्जर, कश्यप, दलित और सैनी समुदाय की है.

2016 में कैराना के तत्कालीन सांसद और भाजपा नेता हुकुम सिंह ने 346 हिंदुओं की एक सूची जारी की, जो कथित तौर पर डर के कारण शहर से पलायन कर गए थे. 2017 के विधानसभा चुनाव में यह एक प्रमुख मुद्दा बन गया. भाजपा को चुनावी जीत हासिल हुई और कैराना लोकसभा सीट के तहत आने वाले चार विधानसभा क्षेत्रों में से तीन (गंगोह, थाना भवन, शामली) पर पार्टी प्रत्याशी जीते. चौथी सीट कैराना पर समाजवादी पार्टी (सपा) ने जीत हासिल की.

भाजपा के लिए यह ऐसा मुद्दा है जो मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश यादव के कार्यकाल और सपा की ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ की नीति के कारण उपजी कथित अराजकता को दर्शाता है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित तमाम पार्टी नेता कथित तौर पर शहर छोड़ने वाले परिवारों से जाकर मिले हैं और मुआवजे और ‘सुरक्षा’ का वादा भी किया है.

हालांकि, अखिलेश यादव ने इस तरह के किसी पलायन से इनकार करते हुए मुख्यमंत्री आदित्यनाथ पर निशाना साधा है.

Graphic: ThePrint

कैराना की जमीनी हकीकत

कैराना के मुख्य बाजार में व्यापारिक प्रतिष्ठानों के बीच एक छोटी-सी दुकान है, जिसे 2014 में शामली में बाइक सवार तीन अज्ञात हमलावरों के शिकार बने 35 वर्षीय बहुजन समाज पार्टी (बसपा) कार्यकर्ता विनोद सिंघल के परिजन चलाते हैं.

विनोद के एक रिश्तेदार वरुण सिंहल ने दिप्रिंट को बताया, ‘पहले, हम जैसे व्यापारियों के लिए सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा होती थी. जबरन वसूली करने वाले खुलेआम घूमते रहते थे, लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं. अब सुरक्षा की भावना बढ़ी है. कोई सांप्रदायिक तनाव नहीं है, मेरे लगभग 90 प्रतिशत ग्राहक मुस्लिम हैं. हम हिंदू और मुसलमान अमन-चैन के साथ मिलकर रह रहे हैं.’

विनोद सिंघल के परिजन चलाते हैं दुकान/ शंकर अर्निमेष/ दिप्रिंट
विनोद सिंघल के परिजन चलाते हैं दुकान/ शंकर अर्निमेष/ दिप्रिंट

हालांकि सिंघल स्पष्ट करते हैं कि वह वोट तो भाजपा को ही देंगे, लेकिन उनका कहना है, ‘सरकार ने मारे गए लोगों के परिजनों से किए वादे पूरे नहीं किए हैं. हमें आर्थिक सहायता और रोजगार का वादा किया गया था. लेकिन न तो पिछली सरकार ने और न ही योगी सरकार ने अपना वादा पूरा किया. योगी आए और हमसे मिले भी, लेकिन वादे अधूरे ही रहे.’

बाजार में मौजूद एक अन्य व्यापारी समीम कुरैशी भी कहते हैं कि ‘पलायन’ यहां कोई मुद्दा ही नहीं है. उनके मुताबिक, ‘यहां हमारे लिए सबसे बड़ा मुद्दा बेरोजगारी ही है. भाजपा को हिंदू पलायन जैसे मुद्दों के बजाये इस पर ध्यान देना चाहिए.’

एक अन्य दुकानदार तनसुवर कहते हैं, ‘हमने 2014 और 2017 में मोदी को वोट दिया. उपद्रव करने वालों को जेल भी हुई, लेकिन पूरे मुस्लिम समुदाय को गुंडा कहना गलत है. चुनाव को सांप्रदायिक रंग नहीं देना चाहिए, यह कैराना के लिए घातक साबित होगा.’

उन्होंने आगे कहा, ‘सपा विधायक नाहिद हसन को आजम खां की तरह झूठा फंसाया गया है. खां के खिलाफ आरोप बेबुनियाद हैं. भाजपा तो ऐसे बर्ताव कर रही है जैसे भगवान वही है.’

योगी सरकार के कार्यकाल के दौरान दर्ज मामलों (धोखाधड़ी और जालसाजी से संबंधित) के तहत 2020 से ही जेल में बंद सपा सांसद आजम खां इस चुनाव में अपने गृह क्षेत्र रामपुर से अपनी पार्टी के उम्मीदवार होंगे.

बेटियां चुनाव मैदान में उतरीं

अपनी पार्टी के कथित कुशासन को लेकर आरोपों में घिरे हसन को 15 जनवरी को गैंगस्टर्स एक्ट के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था. पिछले साल उनकी मां और कैराना की पूर्व सांसद तबस्सुम हसन पर भी इसी अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था.

इस बार नाहिद हसन की बहन इकरा हसन और उनकी मां दोनों निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान किस्मत आजमा रही हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी के लेडी श्रीराम कॉलेज में पढ़ी लंदन यूनिवर्सिटी के लॉ ग्रेजुएट 27 वर्षीय इकरा ने इस सीट के लिए अपना अभियान शुरू कर दिया है.

इकरा हसन/ शंकर अर्निमेष/ दिप्रिंट
इकरा हसन/ शंकर अर्निमेष/ दिप्रिंट

अपनी मां और भाई पर लगे आरोपों को झूठा बताते हुए वह कहती हैं, ‘पिछले साल जनवरी में जब मैं घर लौटी तो मेरे भाई और मां के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट लगाया गया था, अब मेरा फर्ज है कि मैं अपने परिवार का साथ दूं. मेरी मां एक पूर्व सांसद हैं और उन्होंने उन पर गैंगस्टर होने का आरोप लगा रखा है.

वह आगे कहती हैं, ‘वे (भाजपा) कैराना को किसी भी कीमत पर जीतने की कोशिश कर रहे हैं. वे पिछले विधानसभा चुनाव में हार गए थे, इसलिए इस सीट को जीतने के लिए झूठी कहानियां गढ़ने में लगे हैं. बेरोजगारी यहां की सबसे बड़ी समस्या है. लेकिन पिछले पांच वर्षों में वे राम मंदिर के बाद अब कथित पलायन का मुद्दा उठा रहे हैं.’

इकरा ने आगे कहा, ‘यहां के लोग जानते हैं कि सबसे बड़ा अपराधी कौन है. योगी ने सत्ता संभालने के बाद सभी आपराधिक मामलों को बंद करा दिया है, इससे सभी वाकिफ हैं. कैराना कोई टापू नहीं है, यह यूपी का एक हिस्सा है. चुनाव को हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा न बनाएं.’


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दो परिवारों का दबदबा

कैराना ने 1970 के दशक से ही दो परिवारों का दबदबा रहा है और वही इसका प्रतिनिधित्व करते रहे हैं—जिनके बारे में कहा जाता है कि वैसे तो वे एक ही वंश से ताल्लुक रखते हैं लेकिन इनमें से एक ने इस्लाम धर्म अपना लिया था. भाजपा के गुर्जर नेता हुकुम सिंह कैराना से सात बार विधायक रहे और 2014 में एक बार सांसद भी चुने गए.

हुकुम सिंह ने अपने चुनावी करिअर की शुरुआत 1974 में कांग्रेस के साथ की थी, जब उन्होंने कैराना से पहला विधानसभा चुनाव जीता था.

फिर वह जनता पार्टी के टिकट पर विधानसभा सीट जीते. 1995 में भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने चार बार इस सीट का प्रतिनिधित्व किया और 2014 में इसी कैराना संसदीय क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुने गए. 2018 में अपनी मृत्यु के समय तक वह कैराना के सांसद थे.

कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह की सरकारों में मंत्री रहे हुकुम सिंह को यूपी में गुर्जर समुदाय का एक प्रमुख नेता माना जाता था. इस चुनाव में उनकी बेटी मृगांका सिंह इस सीट पर जीत के लिए तीसरी बार प्रयास कर रही हैं.

वहीं दूसरी तरफ नाहिद हसन और इकरा हसन के पिता और पूर्व सांसद तबस्सुम हसन के पति मुनव्वर हसन 2008 में अपनी मृत्यु तक कैराना की राजनीति में खासी हैसियत रखते थे, जिनका एक लंबा सियासी करिअर रहा है और जो सपा और बसपा दोनों के साथ जुड़े रहे थे.

उन्होंने तीन बार कैराना प्रतिनिधित्व किया, 1991 से 1996 के बीच विधानसभा में रहे और 1996-1998 और 2004-2008 में लोकसभा सदस्य रहे. उनकी पत्नी तबस्सुम हसन ने 2009 में लोकसभा सीट जीती थी और फिर 2018 में हुकुम सिंह की मृत्यु के बाद हुए उपचुनाव में उन्होंने मृगांका सिंह को हराया.

इकरा हसन के मुताबिक, ‘हुकुम सिंह का परिवार बेहद सम्मानित है और मेरे पिता के एक अलग पार्टी में होने के बावजूद उनके साथ बहुत अच्छे संबंध थे. हमारे बीच अभी भी अच्छे रिश्ते हैं.’

मृगांका कहती हैं, ‘पिछली बार मैं महज 20,000 वोटों के अंतर से चुनाव हार गई थी. हम क्षेत्र के विकास को मुख्य मुद्दा बना रहे हैं, और लोग भी क्षेत्र में कानून-व्यवस्था की अच्छी स्थिति और शांति चाहते हैं.’

कैराना सभी राजनीतिक दलों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

2017 में पश्चिमी यूपी की 71 सीटों में से 51 सीटें जीतने के बावजूद इस बार भाजपा को लग रहा है कि निरस्त किए जा चुके तीन विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाफ किसान का साल भर चला आंदोलन यहां उसके प्रदर्शन पर प्रतिकूल असर डाल सकता है.

पार्टी क्षेत्र में जाट वोटों के खिसकने के आसार से चिंता में है. यह क्षेत्र परंपरागत रूप से समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) का वोट बैंक रहा है, जो हिंदू जाट बाहुल्य होने के साथ-साथ जाट मुसलमानों की भी एक खासी आबादी वाला इलाका है.

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि उनकी गणना के मुताबिक, ‘पिछले चुनाव में हमें इस क्षेत्र से 80 प्रतिशत जाट वोट मिले थे.’

उन्होंने आगे कहा, ‘हमारा प्रयास जाट वोट बैंक में सेंध लगाने का है. हमें गुर्जर, सैनी और अधिकांश दलित वोटों के ध्रुवीकरण से भी फायदा होने की उम्मीद है. लेकिन सपा और रालोद को हराने के लिए हमें हिंदुओं को साथ लाने की जरूरत है. इससे कैराना ही नहीं पूरे राज्य को फायदा होगा.’

कैराना में पहले चरण के मतदान के दौरान 10 फरवरी को वोट डाले जाने हैं.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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