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Friday, 1 March, 2024
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क्या हरियाणा के डिप्टी CM दुष्यंत चौटाला की JJP से अलग होगी BJP? पक्ष-विपक्ष की बहस जारी

41 विधायकों और 6 निर्दलियों के समर्थन के साथ, भाजपा पहले से ही विधानसभा में सहज है. इस हफ्ते सीएम खट्टर के आवास पर 4 साल पुराने गठबंधन की उपयोगिता पर चर्चा हुई.

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गुरुग्राम: भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) हरियाणा में उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) के साथ अपने चार साल पुराने गठबंधन को खत्म करने के विकल्प पर चर्चा कर रही है. पार्टी के कई नेताओं ने दिप्रिंट को ये जानकारी दी है.

यह मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की शानदार जीत के कुछ दिनों बाद आया है.

जेजेपी – जो हरियाणा में जाटों को अपने मुख्य वोट बैंक में गिनती है – ने राजस्थान में 19 सीटों पर चुनाव लड़ा था, ताकि वह अपने हरियाणा के सहयोगी को राज्य की 10 संसदीय सीटों में से एक या दो चुनाव लड़ने के लिए दे सके. हालांकि, प्रयास विफल हो गया क्योंकि उसे सभी सीटों पर ज़मानत तक खोनी पड़ी और उसे नोटा से भी कम 0.14 प्रतिशत वोट शेयर हासिल हुआ.

मंगलवार को मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के चंडीगढ़ आवास पर भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) नेताओं की बैठक में जेजेपी के साथ गठबंधन की उपयोगिता पर चर्चा हुई, बैठक में मौजूद सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया. बुधवार को राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय के साथ खट्टर की मुलाकात ने अफवाहों को और हवा दे दी.

बातचीत से जुड़े एक सूत्र ने दिप्रिंट को बताया, “पार्टी नेताओं ने पांच राज्यों के नतीजों के बाद जेजेपी के साथ बीजेपी के गठबंधन की उपयोगिता के मुद्दे पर बात की. कुछ नेताओं का यह भी मानना था कि गठबंधन पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है. हालांकि, खट्टर ने इस मुद्दे पर अपने विचार नहीं रखे.”

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बैठक में भाजपा के हरियाणा प्रभारी बिप्लब कुमार देब, राज्य पार्टी प्रमुख नायब सिंह सैनी, राष्ट्रीय सचिव ओपी धनखड़, हरियाणा आरएसएस संघचालक (हरियाणा प्रमुख) पवन जिंदल और पार्टी के आयोजन सचिव फणींद्रनाथ शर्मा शामिल थे.

भाजपा सूत्र के अनुसार, इसका उद्देश्य मई में होने वाले संसदीय चुनावों की तैयारियों पर चर्चा करना था और अगले साल अक्टूबर में होने वाले विधानसभा चुनावों को पहले से टालकर लोकसभा चुनाव के साथ कराए जाने की स्थिति में भाजपा की तैयारी का आकलन करना था.

सूत्र के मुताबिक, जो नेता चाहते हैं कि गठबंधन खत्म हो, उनका मानना था कि जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, कुछ संसदीय क्षेत्रों में पार्टी के नेता – खासकर जहां से जेजेपी के मंत्री आते हैं – नुकसान में हैं और लोगों पर अपना प्रभाव जताने में असमर्थ हैं.

सूत्र ने कहा, यह उन सीटों के लिए विशेष रूप से सच प्रतीत होता है जहां भाजपा और जेजेपी के प्रतिस्पर्धी हित हैं.

दिप्रिंट ने टिप्पणी के लिए कॉल और व्हाट्सएप के जरिए जेजेपी प्रमुख दुष्यंत चौटाला से संपर्क किया. प्रतिक्रिया मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि परिस्थितियों को देखते हुए, जेजेपी के बिना चुनाव लड़ना और फिर ज़रूरत पड़ने पर चुनाव के बाद गठबंधन का विकल्प चुनना भाजपा के हित में है.

राजनीतिक विश्लेषक हेमंत अत्री ने दिप्रिंट को बताया कि कई बीजेपी नेताओं ने पहले ही संकेत दिया है कि पार्टी चुनाव पूर्व गठबंधन के लिए उत्सुक नहीं है और सरकार बनाने के लिए पिछले चुनाव में केवल जेजेपी के साथ गठबंधन किया था.

मौजूदा स्थिति के अनुसार, भाजपा जेजेपी के 10 विधायकों के बिना भी 90 सदस्यीय हरियाणा विधानसभा में सहज है – खट्टर की पार्टी के पास 41 सीटें हैं और सात निर्दलीय विधायकों में से छह का समर्थन है. इनके अलावा, पार्टी को कथित तौर पर सिरसा विधायक और हरियाणा लोकहित पार्टी के प्रमुख गोपाल कांडा का भी समर्थन प्राप्त है – एक ऐसा नेता जिसके खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों के कारण पार्टी ने अब तक उससे दूरी बनाए रखी है.

जुलाई में कांडा को 2012 में एयर होस्टेस गीतिका शर्मा की आत्महत्या मामले में बरी कर दिया गया था.

अत्री ने दिप्रिंट को बताया, “इसलिए, अगर बीजेपी को आगामी संसदीय चुनाव अकेले लड़ना है, जैसा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत उसके वरिष्ठ नेताओं ने संकेत दिया है, तो पार्टी को यह तय करना होगा कि गठबंधन कब खत्म करना है.”

खट्टर सरकार के मीडिया सचिव प्रवीण अत्रे ने कहा कि जेजेपी के साथ भाजपा का गठबंधन चुनाव के बाद “केवल पांच साल तक सरकार चलाने के लिए” तय किया गया था क्योंकि भाजपा 2019 के विधानसभा चुनावों में बहुमत पाने में विफल रही थी.

उस चुनाव में भाजपा ने 40 सीटें हासिल की थीं और सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन सरकार बनाने के लिए आवश्यक आधे रास्ते से छह सीटें कम रह गई थी. जेजेपी, जिसके साथ उसने अंततः गठबंधन किया था, ने 10 सीटें जीती थीं.

अत्रे ने दिप्रिंट को बताया, “अब, क्या इस गठबंधन को अगले चुनाव के लिए जारी रखा जाना है, या अगर इसे खत्म करना है, तो इसे किस चरण में खत्म करना है, यह पूरी तरह से पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की इच्छा पर निर्भर है.”


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‘भाजपा गैर-जाट वोटों को एकजुट कर रही है’

कई सीटें ऐसी हैं जहां बीजेपी और जेजेपी के वरिष्ठ नेताओं के हित टकराते हैं. इसका एक उदाहरण उचाना कलां है, जिसका प्रतिनिधित्व दुष्यंत करते हैं. 2019 में उन्होंने पूर्व केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह की पत्नी, तत्कालीन विधायक प्रेम लता को लगभग 50,000 वोटों से हराया.

दोनों पार्टियों के बीच विवाद की एक और वजह हिसार संसदीय सीट है, जिसका वर्तमान में बीरेंद्र सिंह के बेटे बृजेंद्र सिंह प्रतिनिधित्व करते हैं. दुष्यंत ने 2014 से 2019 के बीच इस सीट पर कब्जा किया था और उन्होंने इसमें अपनी रुचि व्यक्त की है.

एक अन्य उदाहरण फतेहाबाद में टोहाना है, जिस सीट का प्रतिनिधित्व वर्तमान में जेजेपी मंत्री देवेंद्र सिंह बबली करते हैं, जिन्होंने 2019 में मौजूदा विधायक सुभाष बराला – पूर्व राज्य भाजपा प्रमुख और खट्टर के वफादार – को 50,000 से अधिक वोटों से हराया था.

बीजेपी और जेजेपी दोनों ने कहा है कि वे हरियाणा की सभी 10 संसदीय सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं.

जहां तक ​​विधानसभा चुनाव का सवाल है, खट्टर सरकार का समर्थन करने वाले छह निर्दलीय विधायकों में से रनिया विधानसभा क्षेत्र से विधायक रणजीत सिंह हरियाणा कैबिनेट में मंत्री हैं, जबकि नीलोखेड़ी से धर्मपाल गोंदर, बादशाहपुर से राकेश दौलताबाद और पिरथला के नयन पाल रावत विभिन्न राज्य बोर्डों और निगमों के अध्यक्ष हैं.

सोमवार को — मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा की शानदार जीत के एक दिन बाद — खट्टर ने विश्वास जताया था कि पार्टी राज्य में संसदीय और विधानसभा दोनों चुनाव जीतेगी.

खट्टर ने सोमवार को एक्स पर पोस्ट में लिखा, “जीत की एक हैट्रिक तीन राज्यों के चुनावों में लगी है, एक हैट्रिक प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी अगले वर्ष मई में होने वाले लोकसभा चुनाव में लगाएंगे और उसके चार महीने बाद एक और हैट्रिक प्रदेश की जनता के आशीर्वाद से हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी लगेगी.”

वरिष्ठ भाजपा नेता चौधरी बीरेंद्र सिंह ने दिप्रिंट को बताया कि राजस्थान विधानसभा चुनावों में जेजेपी के खराब प्रदर्शन ने वही साबित कर दिया है जो उन्होंने हमेशा कहा था – कि गठबंधन जारी रखने से भाजपा को कुछ हासिल नहीं होगा. जींद में एक सार्वजनिक बैठक में, जाट नेता ने चेतावनी दी थी कि अगर भाजपा ने चौटाला और उनकी जेजेपी के साथ अपना गठबंधन जारी रखा तो वह भाजपा छोड़ देंगे.

बिना किसी का नाम लिए तब सिंह ने कहा था, “जब वह (चौटाला) 2019 में अपनी नई पार्टी के साथ आए, तो लोगों को लगा कि कोई स्वर्गदूत आसमान से उतरा है और मानो वह चौधरी देवीलाल (हरियाणा के पूर्व सीएम और चौटाला के परदादा) का अवतार थे, लेकिन इन चार साल में लोगों को समझ में आ गया है कि जिस तरह से उन्हें धोखा दिया गया, वह राज्य के इतिहास में कभी नहीं हुआ.”

2014 से 2019 के बीच केंद्रीय मंत्री रहे नेता ने रविवार के नतीजों के बाद दिप्रिंट से कहा, “भाजपा जितनी जल्दी जेजेपी से छुटकारा पा लेगी, पार्टी के लिए उतना ही बेहतर होगा.”

राजनीतिक विश्लेषक हेमंत अत्री का मानना है कि एक रणनीति के तहत बीजेपी चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं करती है, खासकर जब हिंदी बेल्ट की बात आती है. उन्होंने कहा कि इसके अलावा, भाजपा हरियाणा में गैर-जाट वोटों को एकजुट करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है.

अनुमान है कि राज्य की आबादी में जाटों की हिस्सेदारी 22-23 प्रतिशत है और वे इसकी राजनीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव रखते हैं.

अत्री ने कहा, “जिस तरह से अगले साल के चुनावों से पहले बीजेपी ने अपने जाट राज्य के वर्तमान ओपी धनखड़ की जगह ओबीसी नेता नायब सिंह सैनी को ले लिया, उससे यह स्पष्ट है कि पार्टी का लक्ष्य गैर-जाट वोटों को एकजुट करना है. इन परिस्थितियों में जेजेपी का अकेले चुनाव लड़ना उसके साथ गठबंधन में लड़ने से ज्यादा बीजेपी के लिए उपयुक्त है, क्योंकि गठबंधन के बाहर, जेजेपी कांग्रेस और आईएनएलडी के जाट वोटों में कटौती करेगी.”

अत्री ने आगे कहा कि बीजेपी जेजेपी या इंडियन नेशनल लोकदल में से किसी एक के साथ चुनाव बाद गठबंधन का विकल्प चुन सकती है – जिस पार्टी से 2019 में चौटाला अलग हो गए थे, “उसे (भाजपा को) निर्दलीयों से भी समर्थन मिल सकता है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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