नई दिल्ली: लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी पिछले हफ्ते कांग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी की इफ्तार पार्टी में शरीक हुए. सात साल पहले उन्होंने इसी तरह की पार्टी का आयोजन किया था, लेकिन बाद में उन्होंने इसे छोड़ दिया.
यह वक्त का तकाज़ा है कि इस इफ्तारी में राहुल की मौजूदगी को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना गया, जिसमें हर विपक्षी पार्टी के नेता शामिल हुए. यह उस शहर में भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहा, जहां इस तरह की सभाएं कभी वार्षिक कैलेंडर का हिस्सा हुआ करती थीं.
फिर 2014 आया, जब नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली सरकार में प्रधानमंत्री बने, जिसे पहली बार केंद्र में सत्ता हासिल करने के लिए सहयोगियों के समर्थन की ज़रूरत नहीं थी.
इफ्तार फिर गुज़रे ज़माने की बात हो गई, मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ने इसे मुसलमानों को खुश करने के उद्देश्य से राजनीतिक नाटक करार दिया. कांग्रेस ने इस परंपरा को जारी रखने की कोशिश की — सोनिया गांधी ने 2014, 2015 में और राहुल ने 2018 में दो इफ्तार पार्टी दी, लेकिन अनुकूल राजनीतिक माहौल की अनुपस्थिति के कारण इसे जारी नहीं रखा जा सका.
दरअसल, 2018 में कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपने आखिरी इफ्तार की मेज़बानी के बाद से, राहुल ने पिछले सात साल में दूसरों द्वारा आयोजित किसी भी इफ्तार पार्टी में हिस्सा नहीं लिया था, जिसके दौरान पार्टी को लोकसभा चुनावों में दो और हार का सामना करना पड़ा था.
इससे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ प्रतापगढ़ी की इफ्तार पार्टी में उनकी उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय हो जाती है. इसने सभी का ध्यान खींचा, खासकर इसलिए क्योंकि उनमें से कोई भी प्रयागराज में महाकुंभ में नहीं गया था, जिसके कारण भाजपा ने “हिंदू आस्था” का अपमान करने के लिए उनकी आलोचना की.
खरगे ने यह पूछकर विवाद खड़ा कर दिया था कि क्या कुंभ में डुबकी लगाने से गरीबी मिटाने में मदद मिलेगी.
प्रतापगढ़ी ने भाजपा की आलोचना को खारिज करते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत भी कुंभ में शामिल नहीं हुए थे. प्रतापगढ़ी ने कहा, “कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह समेत कई कांग्रेस नेताओं ने कुंभ में डुबकी लगाई. राहुल गांधी बद्रीनाथ और वैष्णो देवी गए हैं. क्या तब उन्हें कभी हिंदू हृदय सम्राट कहा गया? फिर मेरे इफ्तार में शामिल होने के लिए उन्हें क्यों कहा जाना चाहिए?”
2014 तक, इफ्तार पार्टियां, जो पहली बार इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते दिल्ली में प्रचलित हुईं, भारतीय राजनीति की बदलती परिस्थितियों का बैरोमीटर का काम करती थीं, क्योंकि राष्ट्रीय राजधानी के साथ-साथ राज्यों की राजधानियों में भी नए समीकरणों ने पुराने समीकरणों को रास्ता दिया.
Smt Indira Gandhi at Iftar in Hyderabad House, 1981 pic.twitter.com/FNwteKV28h
— Congress (@INCIndia) July 7, 2016
उदाहरण के लिए 2001 को ही देखिए. उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार में मंत्री रहे रामविलास पासवान और शरद यादव की कांग्रेस मुख्यालय के लॉन में आयोजित इफ्तार पार्टी में मौजूदगी कई दिनों तक चर्चा का विषय बनी रही.
प्रधानमंत्री के रूप में वाजपेयी और उनके उत्तराधिकारी मनमोहन सिंह ने सालाना इफ्तार पार्टी दी. मोदी ने न केवल इस प्रथा को बंद कर दिया, बल्कि 2017 तक राष्ट्रपति के रूप में प्रणब मुखर्जी द्वारा आयोजित इफ्तार पार्टियों में भी शामिल होने से परहेज़ किया.
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह चौहान उन कुछ प्रमुख भाजपा नेताओं में से थे, जिन्होंने पार्टी के शीर्ष नेताओं से स्पष्ट संकेत मिलने के बावजूद इफ्तार पार्टी का आयोजन जारी रखा कि ऐसी प्रथाएं अब ज़रूरी नहीं हैं.
लेकिन ऐसा नहीं है कि 2014 के बाद से सालाना दावतें केवल भाजपा खेमे में ही नहीं खत्म हो गईं. यहां तक कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी हाल के वर्षों में इफ्तार पार्टी के आयोजन से होने वाले राजनीतिक नतीजों को लेकर काफी सतर्क हो गई है.
2014 में केंद्र में कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने के बाद सोनिया गांधी द्वारा आयोजित पहली इफ्तार पार्टी ने पार्टी के घटते कद को दर्शाया था क्योंकि इसमें केवल दो शीर्ष राजनीतिक चेहरे – राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के लालू प्रसाद और दिवंगत शरद यादव, जो उस समय जनता दल (यूनाइटेड) या जेडी(यू) के साथ थे, उपस्थित थे. हालांकि, एक साल बाद, लगभग नौ विपक्षी दलों के नेताओं ने पूर्व संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) अध्यक्ष द्वारा आयोजित इफ्तार में हिस्सा लिया था.
फिर ब्रेक लगे, जो धीरे-धीरे एक आदर्श बन गए. 2016 और 2017 में, कांग्रेस ने इफ्तार दावतें नहीं दीं. 2018 में, कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में पदभार संभालने के बाद राहुल ने दिल्ली के एक निजी होटल में इफ्तार का आयोजन किया. पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रतिभा पाटिल इस कार्यक्रम में शामिल हुए थे, जिसने कांग्रेस के राजनीतिक अलगाव को उजागर किया और बहुत कम सहयोगी दलों ने इसमें भाग लिया.
Good food, friendly faces and great conversation make for a memorable Iftar! We were honoured to have two former Presidents, Pranab Da & Smt Pratibha Patil ji join us, along with leaders from different political parties, the media, diplomats and many old & new friends. pic.twitter.com/TM0AfORXQa
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) June 13, 2018
बाद के वर्षों में, कांग्रेस ने इसे पूरी तरह से बंद कर दिया. हालांकि, इस बार, प्रतापगढ़ी की सभा में राहुल की उपस्थिति के अलावा, सोनिया ने भी 21 मार्च को राष्ट्रीय राजधानी में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) द्वारा आयोजित एक इफ्तार में हिस्सा लिया, जो मुसलमानों के मुद्दे पर पार्टी के नज़रिए में बदलाव का संकेत था. इसी तरह, वायनाड की सांसद प्रियंका गांधी ने 29 मार्च को केरल के मलप्पुरम में IUML सुप्रीमो सादिक अली शिहाब थंगल द्वारा आयोजित एक इफ्तार पार्टी में हिस्सा लिया.
कुछ उदाहरणों से पता चलता है कि कैसे कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों की चिंताओं पर बात करने में अपनी अनिच्छा को त्याग दिया है — ज़ाहिर तौर पर तुष्टीकरण करने वाले के रूप में लेबल किए जाने से बचने के लिए. इनमें पिछले दिसंबर में उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा से प्रभावित संभल का दौरा करने का राहुल और प्रियंका गांधी वाड्रा का प्रयास; फिलिस्तीनी मुद्दे के लिए वाड्रा की मुखर वकालत और इज़रायल की तीखी आलोचना और मुसलमानों के लिए सार्वजनिक अनुबंधों में चार प्रतिशत पिछड़ा वर्ग कोटा आवंटित करने के सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कर्नाटक सरकार के फैसले का पार्टी द्वारा कड़ा बचाव.
वाड्रा की तरह, जिन्होंने भाजपा के तानों के बावजूद इजरायल की आलोचना या फिलिस्तीनी प्रतिरोध के प्रति अपने समर्थन में कोई कमी नहीं की, कांग्रेस की कर्नाटक इकाई ने भी अपनी सरकार के कोटा संबंधी कदम को संवैधानिक रूप से सही बताते हुए उसका बचाव किया है और विपक्ष के अभियान को निराधार बताया है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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