Monday, 17 January, 2022
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आख़िर क्यों नरम-दिल शिवराज ने ‘डंडा’ उठा लिया है और सार्वजनिक रैलियों में ऑफिसर्स को निलंबित कर रहे हैं

मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी सरकार के धीरे-धीरे भाजपा की कट्टर राजनीति की ओर बढ़ने के कदम को नौकरशाही के विरुद्ध एक कड़े संदेश से जोड़ दिया है. ये कुछ कारण है जिनकी वजह से वे अपनी कार्यशैली बदल रहे हैं.

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नई दिल्ली: सिविल सेवा के अधिकारियों की आलोचना करना, पुलिस अधिकारियों को खुलेआम चेतावनी देना, लोगों को सार्वजनिक रैली में भ्रष्ट अधिकारियों का नाम लेने के लिए कहना और फिर उन्हें तत्काल वहीं-के-वहीं निलंबित करना – ये शायद कुछ ऐसी बातें लगती हैं जिसकी आप एक मृदुभाषी, नरमदिल और उदारवादी मुख्यमंत्री के रूप में ख्यात व्यक्ति से अपेक्षा नहीं कर सकते. लेकिन इन दिनों मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का यही रूप देखने को मिल रहा है.

वाजपेयी-आडवाणी युग वाली भाजपा के एकमात्र मुख्यमंत्री चौहान, जो अभी भी सत्ता में हैं, अभी भी काफ़ी लोकप्रिय हैं और अपने दम पर सीटें जितवाने में सक्षम हैं. लेकिन हाल ही में उत्तराखंड से कर्नाटक तक और अब गुजरात में पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा किए गए नेतृत्व परिवर्तनों ने चौहान को अपनी कार्यशैली बदलने और सत्ता विरोधी लहर को मात देने के लिए एक नए प्रकार के दिखावे को अपनाने के लिए प्रेरित किया है.

उनके सामने मौजूद ताज़ातरीन इम्तिहान मध्य प्रदेश में तीन विधानसभा सीटों और खंडवा लोकसभा क्षेत्र – जिसके लिए तारीखों की घोषणा अभी तक नहीं की गई है.- के लिए होने वाले उप-चुनावों की एक श्रृंखला है. लेकिन ऐसा लगता है कि इन चुनावों और भविष्य की अन्य चुनौतियों को भांपते हुए चौहान अपनी छवि को एक इफ्तार पार्टी में भाग लेने वाले उदारवादी नेता से बदलकर एक सख्त और अधिक कट्टर नेता के रूप में पेश करने को तैयार हैं. इसी आशय से उन्होंने विकास कार्यों पर जनता की प्रतिक्रिया (फीडबॅक) प्राप्त करने के लिए – मुख्य रूप से उन निर्वाचन क्षेत्रों में जहां उपचुनाव होने हैं- 12 सितंबर से जनदर्शन यात्रा शुरू कर दी है.

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि चौहान के इस ‘स्वरूप परिवर्तन’ के पीछे कई कारण हैं, पार्टी के शीर्ष पर बैठे नेतृत्व की प्रकृति से लेकर उनकी अपनी असुरक्षा तक, क्योंकि कैलाश विजयवर्गीय और नरोत्तम मिश्रा जैसे मजबूत नेताओं के नेतृत्व में एमपी बीजेपी के भीतर भी कई गुट हो गये हैं.


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‘डंडा लेकर निकला हूं’

इस गुरुवार को भोपाल में ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ नाम के एक कार्यक्रम में शिरकत करते हुए उन्होंने सरकारी अधिकारियों पर विकास की झूठी तस्वीर पेश करने का आरोप लगाया. उन्होने कहा, ‘यदि आप मंत्रालय के अंदर बैठे रहते हैं, तो आपको केवल एक झूठी तस्वीर मिलती है. आपको चारों तरफ आनंद ही आनंद नजर आता है. लेकिन जब आप वास्तव में मैदान में उतरते हैं, तभी आपको एहसास होता है कि यह खुशहाली कितनी दूर तक पहुंच पाई है.’

प्रमुख सचिव (उद्योग) संजय शुक्ला की ओर मुड़ते हुए, चौहान ने कहा कि वह उनका जिक्र नहीं कर रहे थे, लेकिन उन्होंने यह भी कहा, ‘काम केवल वही हो पाता, जहां मुख्यमंत्री ध्यान केंद्रित करते हैं’.

इससे तीन दिन पहले, जिला कलेक्टरों और आयुक्तों के साथ हो रही एक समीक्षा बैठक में, मुख्यमंत्री ने कहा था कि, ‘जिस किसी अधिकारी ने भी पीएम आवास योजना के तहत पैसा खाया है, मैं उसे छोडूंगा नहीं’. उन्होंने भ्रष्टाचार की जांच के लिए औचक दौरे करने और विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने पर नज़र रखने की भी प्रतिज्ञा की थी. उन्होंने कहा, ‘अगर कोई भी शिकायत हुई तो मैं उन्हें निलंबित कर दूंगा.’

उन्होंने दमोह के पुलिस अधीक्षक डी.आर. तेनिवार को पुलिसिंग के मामले में जिले की निम्न रैंकिंग के लिए और नीमच के एसपी सूरज कुमार वर्मा को ‘गैंगस्टर और माफिया के खिलाफ कुछ नहीं करने’ के लिए भी चेतावनी दी थी.

लेकिन सबसे हैरान करने वाली घटना तो एक हफ्ते पहले निवाड़ी में हुई थी जब मुख्यमंत्री चौहान ने अपना भाषण सुन रही जनता से पीएम आवास योजना में भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों का नाम पूछा था. उसी दिन मंच से उन्होंने कहा, ‘मुझे बताया गया है कि पीएम आवास योजना में काफ़ी अनियमितताएं हुई हैं. एक सीएमओ (मुख्य नगरपालिका अधिकारी) थे… उनके खिलाफ भी शिकायतें हैं. उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है.’

ठीक उसी दिन, पृथ्वीपुर, जहां अभी उपचुनाव होना है, में आयोजित एक अन्य रैली में उन्होंने एक तहसीलदार को निलंबित कर दिया. उन्होंने पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा द्वारा जांच की भी घोषणा की.

टीकमगढ़ में भी, उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोप में एक अधिकारी को यह कहते हुए निलंबित कर दिया, ‘अब मैं डंडा लेकर निकला हूं. गड़बड़ करने वालों को छोडूंगा नहीं.’

इसके अलावा, रायगांव, एक अन्य उपचुनाव वाला क्षेत्र, में उन्होंने राज्य की नल जल योजना के तहत पानी उपलब्ध नहीं कराने के लिए एक अधिकारी की खिंचाई कर दी.


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आख़िर क्यों बदलनी पड़ रही है मुख्यमंत्री चौहान को अपनी छवि

मार्च 2020 में कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के गिरने के बाद चौथी बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद से रायगांव, पृथ्वीपुर, जोबट विधानसभा क्षेत्रों और खंडवा संसदीय क्षेत्र में होने वाले आगामी उपचुनाव शिवराज सिंह चौहान की दूसरी कठिन कसौटी होगी.

नवंबर 2020 में चौहान के पहले कड़े इम्तिहान में भाजपा ने 28 में से 19 सीटें जीतीं और इसके लिए कांग्रेस के पूर्व नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की मदद को भी थोड़ा श्रेय जाता है, जो अपने समर्थकों के साथ पार्टी में शामिल हो गए थे और जिससे इस उपचुनाव की आवश्यकता पड़ी थी.

इस बार, चौहान खुद को एक मजबूत और होशियार नेता के रूप में पेश करके कोई कसर नहीं छोड़ना चाह रहे हैं. हालांकि भोपाल स्थित लेखक और राजनीतिक टिप्पणीकार गिरिजा शंकर का कहना है कि यह एकदम से असामान्य भी नहीं है.

उन्होने कहा ‘यह शिवराज सिंह चौहान का राजनीति करने का और लोगों के साथ तालमेल बिठाने का अपना तरीका है. यह उनकी यूएसपी (सबसे खास बात) भी है; वे पहले भी इस तरह के दिखावे करते रहते थे. ‘नहीं छोडूंगा’ वाली टिप्पणी उस नौकरशाही के तार कसने के लिए है, जो कभी-कभी शिवराज की विनम्रता का नाजायज़ फायदा उठाते हैं. लोगों को यह संदेश देना कि ‘देखिए, ये भ्रष्ट अधिकारी विकास को रोक रहे हैं, और मैं इस मंडली का हिस्सा नहीं हूं’, उनकी चतुर राजनीति का हिस्सा है. सत्ता विरोधी लहर को मात देने का यह सबसे अच्छा तरीका है,’

हालांकि, शंकर ने यह भी कहा कि चौहान और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मामले त्रिवेंद्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत (दोनों उत्तराखंड में) और विजय रूपानी जैसे भाजपा मुख्यमंत्रियों, जिन्हें हाल ही में बदला गया है, से एकदम अलग हैं.

शंकर कहते है, ‘शिवराज और योगी दोनों जनाधार वाले नेता हैं और इन अन्य लोगों के विपरीत है जो ‘नियुक्त’ किए गये मुख्यमंत्री थे. आख़िर भाजपा को 2024 में मध्य प्रदेश से लोकसभा सीटों की भी तो जरूरत है.‘

चौहान-योगी के बीच इस तरह की तुलना करने वाले वे अकेले विश्लेषक नहीं हैं. सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज के प्रोफेसर संजय कुमार ने बताया कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की इस नई शैली का दूसरा पहलू अतिक्रमण, माफिया, नशीली दवाओं के प्रसार के खिलाफ आक्रामक अभियान और भाजपा के मूल वोट आधार, हिंदू राष्ट्रवादियों, तक एक संदेश भेजना भी है. योगी की यूपी सरकार द्वारा धर्म परिवर्तन विरोधी अध्यादेश लाने के ठीक बाद, एमपी ने भी ऐसा ही किया.

कुमार ने कहा कि यह चौहान को दिया गया जनादेश नहीं है, लेकिन दिल्ली में बैठे शीर्ष नेतृत्व की प्रकृति, जो तेज़ी से फ़ैसले लेती है और आक्रामक नेताओं को पसंद करती है, ने उनके अंदर भी असुरक्षा पैदा कर दी है. इस विशेषज्ञ ने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी द्वारा जयपुर में दिए एक भाषण के वायरल वीडियो का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि कोई भी मुख्यमंत्री नहीं जानता कि वह कब तक कुर्सी पर टिका रहेगा.

कुमार ने कहा, ‘इसलिए, पद पर बने रहने के लिए, हर मुख्यमंत्री को पहला काम यह करना होगा कि वह पार्टी के प्रमुख वोटरों को खुश करता रहे.’ उन्होने बताया कि चौहान भी यही कर रहे हैं

उनका कहना था, ‘दूसरी बात यह है कि वे जानते हैं कि जब तक वह जीतते रहते है और पार्टी के मूल एजेंडे पर काम करता रहते हैं, तब तक उन्हें कोई खतरा नहीं है. लेकिन जैसे हि वह चुनाव हारना शुरू करेंगे, उपर सवाल उठाए जाएंगे और मोदी-शाह नेतृत्व उन्हें बख्शेगा नहीं. यही कारण है कि वह उपचुनाव जीतने के लिए और अपनी ‘सौम्य’ छवि को ‘बाहुबली’ मुख्यमंत्री की छवि में बदलने के लिए सभी प्रकार के संसाधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं.’

इस बीच, भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा ने कहा कि अगर अधिकारी अपना काम नहीं कर रहे हैं तो उन्हें ‘कड़ा संदेश भेजना’ अच्छी बात है.

वे कहते हैं, ‘भाजपा का पूरा-का-पूरा संगठन उपचुनाव जीतने के लिए काम कर रहा है, और मुख्यमंत्री अपनी जनदर्शन यात्रा के माध्यम से जमीनी स्तर पर आ रही खामियों को दूर करने के लिए अतिरिक्त प्रयास कर रहे हैं.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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