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Saturday, 11 April, 2026
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क्या है 1950 का एक्सपल्शन कानून? जिसे नेहरू ने रोका, अब BJP कर रही है असम में लागू करने की बात

बीजेपी के घोषणा पत्र में 1950 के कानून का इस्तेमाल कर ‘अवैध प्रवासियों की पहचान और उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया तेज़’ करने का वादा, ताकि स्थानीय लोगों की जमीन, विरासत और सम्मान की रक्षा हो सके.

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नई दिल्ली: आने वाले असम चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के घोषणा पत्र ने 1950 के इमिग्रेंट्स (एक्सपल्शन फ्रॉम असम) एक्ट के इस्तेमाल को लेकर फिर से बहस शुरू कर दी है. यह कानून कई दशकों तक इस्तेमाल नहीं हुआ था.

मंगलवार को 9 अप्रैल के चुनाव के लिए पार्टी का 31 बिंदुओं वाला घोषणा पत्र जारी करते हुए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि “बांग्लादेशी मियां” को बाहर निकालने के लिए इस कानून का सख्ती से इस्तेमाल किया जाएगा. “मियां” शब्द बंगाली बोलने वाले मुसलमानों के लिए अपमानजनक माना जाता है.

सरमा ने कहा कि बीजेपी “जंगल और अन्य ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा करने वालों के खिलाफ पूरी तरह कानूनी लड़ाई लड़ेगी…हम बांग्लादेशी घुसपैठियों के कब्ज़े से ज़मीन का आखिरी इंच भी खाली कराएंगे और सुरक्षित करेंगे.”

घोषणा पत्र में कहा गया है कि 1950 के कानून को लागू कर असम के स्थानीय लोगों की जमीन, विरासत और सम्मान की रक्षा की जाएगी, ताकि “अवैध प्रवासियों की पहचान और उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया तेज हो सके” और “अवैध प्रवासियों के कब्ज़े से ज़मीन का हर इंच मुक्त कराया जा सके.”

यह कानून जनवरी 1950 में पहले अध्यादेश के रूप में लाया गया था और उसी साल मार्च में इसे कानून बना दिया गया, लेकिन बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप के कारण इसका इस्तेमाल बंद हो गया और यह कई दशकों तक निष्क्रिय पड़ा रहा.

पिछले साल असम कैबिनेट ने जिला अधिकारियों और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को 1950 के कानून के तहत अवैध प्रवासियों को बाहर निकालने के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर को मंजूरी दी थी.

मुख्यमंत्री सरमा ने कहा था, “हमारे जिला अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि जिस भी व्यक्ति पर शक हो या जिसे ट्रिब्यूनल विदेशी घोषित कर चुका हो, उसे तुरंत निष्कासन का आदेश दिया जाए. इसके बाद पुलिस या BSF उन्हें बांग्लादेश वापस भेजने की कार्रवाई करेगी.”

यह कानून क्या कहता है, इसे क्यों लाया गया था और बाद में इसका इस्तेमाल क्यों बंद हो गया? दिप्रिंट आपको यह समझा रहा है.

क्या कहता है कानून

यह कानून केंद्र सरकार को अधिकार देता है कि वह “कुछ प्रवासियों” या “किसी वर्ग के लोगों” को असम से बाहर जाने का आदेश दे सकती है, अगर केंद्र सरकार को लगता है कि उनका वहां रहना “भारत के आम लोगों के हित या असम के किसी वर्ग या अनुसूचित जनजाति के हित के खिलाफ” है.

ऐसे लोगों को तय समय और तय रास्ते से भारत या असम छोड़ने का आदेश दिया जा सकता है.

हालांकि, इस कानून में शरणार्थियों के लिए छूट दी गई है. इसमें कहा गया है कि यह उन लोगों पर लागू नहीं होगा जो दंगों या अशांति के कारण अपने घर से भागकर उस इलाके से आए थे, जो बाद में पाकिस्तान का हिस्सा बन गया.

इस कानून में यह भी प्रावधान है कि जो व्यक्ति निष्कासन आदेश का पालन नहीं करेगा या ऐसे व्यक्ति को छिपाएगा, उसे तीन साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है.

कानून के उद्देश्य और कारणों में कहा गया है कि पिछले कुछ महीनों में पूर्वी बंगाल के बहुत ज्यादा लोगों के असम आने से “गंभीर स्थिति” पैदा हो गई थी.

इसमें कहा गया है कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों के आने से राज्य की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है और कानून-व्यवस्था की समस्या भी पैदा हो रही है. इसलिए इस स्थिति से निपटने के लिए केंद्र सरकार को जरूरी अधिकार देने के लिए यह कानून लाया गया.

जुलाई 1952 में संसद में दिए गए जवाब में कहा गया था कि अगर पुलिस की रिपोर्ट में किसी व्यक्ति के खिलाफ पर्याप्त आधार मिलता है, तो जिला मजिस्ट्रेट या सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट उसे बाहर निकालने का आदेश दे सकते हैं. इसमें कहा गया था कि जिस व्यक्ति को बाहर किया जाएगा, उसे असम की सीमा तक ले जाया जाएगा.

इस कानून को लागू करने के लिए कोई अलग व्यवस्था नहीं बनाई गई थी. जिला और सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट को ही कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया था.

यह कानून क्यों पास किया गया

इस कानून से पहले 1950 का इमिग्रेंट्स (एक्सपल्शन फ्रॉम असम) ऑर्डिनेंस लागू था, जो 6 जनवरी 1950 से 1 मार्च 1950 तक प्रभाव में रहा. 1 मार्च 1950 को नया कानून लागू हुआ.

यह बिल पहली बार दिसंबर 1949 में उस समय के रेल और परिवहन मंत्री एन. गोपालस्वामी अय्यंगार ने संविधान सभा (विधायी) में पेश किया था, लेकिन समय की कमी के कारण इसे पास नहीं किया जा सका. इसके बाद एक ऑर्डिनेंस जारी किया गया.

फरवरी 1950 में बिल पर चर्चा के दौरान अय्यंगार ने कहा कि ये प्रावधान “असम की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए बहुत ज़रूरी” हैं क्योंकि ईस्ट पाकिस्तान से असम में “अवांछित प्रवासियों” की संख्या बढ़ रही थी.

उन्होंने संसद को बताया कि 1949 के बीच तक असम में लगभग 1.5 लाख से 2 लाख “अवांछित प्रवासी” थे, लेकिन बाद में यह संख्या बढ़कर लगभग 5 लाख हो गई.

उस समय की रिपोर्टों के अनुसार, 1948 के अंत में असम सरकार ने इस बढ़ती संख्या को लेकर केंद्र सरकार को चेतावनी दी थी.

एक समाधान के तौर पर असम और ईस्ट पाकिस्तान के बीच परमिट सिस्टम लागू करने पर विचार किया गया था, लेकिन सरकार को लगा कि इससे उन बहुत से लोगों की आवाजाही पर रोक लग जाएगी, जिन्हें अपने रोज़मर्रा के काम के लिए ईस्ट पाकिस्तान और असम या पश्चिम बंगाल के बीच आना-जाना पड़ता है.

इसके बाद इस कानून को एक वैकल्पिक समाधान के रूप में लाया गया.

बिल पर चर्चा के दौरान अय्यंगार ने संसद को बताया कि यह केंद्रीय कानून है, लेकिन ऑर्डिनेंस के तहत केंद्र सरकार ने अपने अधिकार असम सरकार और उसके कुछ अधिकारियों को दे दिए थे.

अय्यंगार ने संसद को भरोसा दिलाया कि ऑर्डिनेंस लागू होने के बाद न सिर्फ प्रवासियों की संख्या कम हुई, बल्कि “काफी संख्या में मुसलमान जो असम आए थे, वे अब वापस ईस्ट बंगाल अपने घर लौट रहे हैं.”

उन्होंने कहा कि “अगर इस कानून को उसी भावना से लागू किया गया, जिसके लिए इसे बनाया गया है, तो कुछ समय में इस समस्या का अंत हो जाएगा.”

इसे क्यों बंद किया गया

इस कानून को बंद किए जाने का कारण 8 अप्रैल 1950 को जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच हुए समझौते से जुड़ा माना जाता है.

नेहरू-लियाकत समझौते या दिल्ली समझौते के तहत दोनों देशों ने अपने-अपने अल्पसंख्यकों को धर्म की परवाह किए बिना “पूरी नागरिक समानता” देने पर सहमति जताई थी.

इस समझौते में यह भी कहा गया था कि ईस्ट बंगाल, वेस्ट बंगाल, असम और त्रिपुरा से आने-जाने वाले लोगों के लिए, जहां सांप्रदायिक हिंसा हुई थी, “आवाजाही की स्वतंत्रता और यात्रा के दौरान सुरक्षा” दी जाएगी.

अप्रैल 1950 में असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलोई को लिखे एक पत्र में नेहरू ने कहा था कि फिलहाल इस कानून के तहत होने वाली सारी कार्रवाई रोक दी जाए, क्योंकि कानून बनने के बाद बहुत कुछ बदल चुका है.

उन्होंने कहा कि 8 अप्रैल को हुए नेहरू-लियाकत समझौते में इस कानून का सीधे जिक्र नहीं था, लेकिन लियाकत अली खान ने इस पर उनसे बात की थी.

उन्होंने लिखा, “मैं इस बात से सहमत नहीं था कि इसे समझौते में शामिल किया जाए, लेकिन हम इसे देखेंगे और समझेंगे कि समझौते की भावना के कारण इस पर क्या असर पड़ता है.”

नेहरू ने कहा कि फिलहाल “इस कानून के तहत कोई कार्रवाई करना सही नहीं होगा.”

उन्होंने कहा कि उनका मुख्य उद्देश्य “ईस्ट और वेस्ट बंगाल तथा असम की स्थिति को पूरी तरह नियंत्रित करना और अल्पसंख्यकों के मन से डर खत्म करना” है.

उन्होंने कहा, “बाकी सभी चीज़ें इसके बाद आती हैं. अगर हम इसमें सफल नहीं हुए, तो कई दूसरी समस्याएं पैदा हो जाएंगी. इसलिए सुनिश्चित करें कि असम एक्सपल्शन एक्ट के तहत कुछ भी न किया जाए.”

नेहरू ने डिब्रूगढ़ के एक मामले का भी जिक्र किया, जिसमें जिला प्रशासन ने एक पुराने निवासी को तीन दिन के भीतर जगह छोड़ने का नोटिस दिया था.

कितने लोगों को बाहर किया गया

जुलाई 1952 में सरकार ने लोकसभा में बताया कि यह कानून मार्च 1950 में लागू हुआ था और 8 अप्रैल 1950 तक प्रभाव में रहा, लेकिन 8 अप्रैल 1950 के प्रधानमंत्री समझौते के तहत इसे रोक कर रखा गया.

सरकार ने बताया कि ऑर्डिनेंस और इस कानून के तहत असम से कुल 354 प्रवासियों को बाहर किया गया था.

जवाब में यह भी कहा गया कि कुछ लोग जो वापस असम आ गए थे, उन्हें गिरफ्तार कर उनके खिलाफ केस चलाया गया, लेकिन उनकी सही संख्या पता नहीं चल सकी.

यह कानून कई दशकों तक लागू नहीं रहा, लेकिन पिछले साल असम कैबिनेट ने इसे लागू करने के लिए SOP को मंजूरी दी.

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार SOP के तहत जिला अधिकारी संदिग्ध अवैध प्रवासियों को 10 दिन के भीतर अपनी नागरिकता के सबूत देने को कहेंगे. अगर सबूत संतोषजनक नहीं हुआ, तो जिला अधिकारी लिखित राय देकर तय रास्ते से 24 घंटे का नोटिस देकर उन्हें असम से बाहर जाने का आदेश दे सकते हैं.

अगर किसी व्यक्ति को विदेशी ट्रिब्यूनल विदेशी घोषित कर देता है, तो यह प्रक्रिया जरूरी नहीं होगी और हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाने के सभी विकल्प खत्म होने के बाद जिला अधिकारी सीधे निष्कासन आदेश दे सकता है.

अगर अवैध प्रवासी निष्कासन आदेश के बाद भी नहीं जाता, तो जिला अधिकारी उसे होल्डिंग सेंटर में रख सकता है या बॉर्डर पर तैनात सुरक्षा बल को सौंप सकता है, ताकि उसे बाहर भेजा जा सके.

इसमें यह भी कहा गया है कि अगर अवैध प्रवासी सीमा के पास या राज्य में प्रवेश के 12 घंटे के अंदर पकड़ा जाता है, तो उसे बिना किसी अतिरिक्त प्रक्रिया के तुरंत वापस भेज दिया जाएगा.

पिछले साल नवंबर में इस कानून का इस्तेमाल किया गया था, जब सोनितपुर जिला प्रशासन ने ट्रिब्यूनल द्वारा विदेशी घोषित किए गए पांच लोगों को 24 घंटे के भीतर भारत छोड़ने का आदेश दिया था. दिसंबर में नगांव जिले के 15 लोगों को भी बाहर भेजने का आदेश दिया गया था.

इस साल जनवरी में सरमा ने एक्स पर पोस्ट कर बताया था कि “सुबह-सुबह 14 अवैध घुसपैठियों को बाहर भेजा गया — कुछ नए थे और कुछ पुराने परेशानी पैदा करने वाले.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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