चेन्नई: तमिलनाडु सरकार की पट्टिनापक्कम में नया सचिवालय परिसर बनाने की योजना का स्थानीय मछुआरों, निवासियों और कई राजनीतिक नेताओं ने कड़ा विरोध किया है. उनका कहना है कि पहले से ही घनी आबादी वाले इस तटीय इलाके में इससे भारी ट्रैफिक जाम होगा, लोगों की रोजी-रोटी प्रभावित होगी और पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा.
प्रस्तावित सचिवालय की जगह मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के घर से सिर्फ करीब 100 मीटर दूर है, लेकिन दक्षिण चेन्नई के तट के पास पट्टिनापक्कम का इलाका काफी भीड़भाड़ वाला है. यहां रिहायशी कॉलोनियां, स्कूल और तट के किनारे मछुआरों की पारंपरिक बस्तियां हैं.
स्थानीय लोगों ने 15 सितंबर को पट्टिनपक्कम में एक बैठक बुलाई है, जिसमें आगे की कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा. कई लोगों ने मांग की है कि करीब 20 लाख वर्ग फुट के बहुमंजिला प्रशासनिक परिसर की जगह इस ज़मीन का इस्तेमाल मछुआरा परिवारों के लिए घर बनाने में किया जाए.
मछुआरों ने सरकार के पहले के उस फैसले का भी हवाला दिया है, जिसमें खेती की जमीन और पर्यावरण पर चिंता जताए जाने के बाद परंदूर एयरपोर्ट प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया गया था. उनका कहना है कि पट्टिनापक्कम की योजना में किसानों और पर्यावरण को लेकर ऐसी ही संवेदनशीलता नहीं दिखाई जा रही है. जबकि यह तटीय इलाका पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील है और इसका असर मछुआरा समुदाय पर भी पड़ेगा.
स्थानीय लोगों का कहना है कि फोरशोर एस्टेट जंक्शन पहले से ही ट्रैफिक की समस्या वाला इलाका है. पट्टिनापक्कम सिग्नल की ओर जाने वाली सभी सड़कें पीक आवर्स में ट्रैफिक जाम का कारण बनती हैं. लोगों का कहना है कि सेंट जॉन, सेंट बेड्स, रोजरी और सैंथोम समेत कई स्कूल आसपास हैं और हर दिन सरकारी गाड़ियों की आवाजाही से दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ेगा.
यही इलाका मध्य और दक्षिण चेन्नई के बीच एक महत्वपूर्ण तटीय रास्ता भी है. इसलिए किसी बड़े सरकारी परिसर के बनने से ट्रैफिक की समस्या और बढ़ने की आशंका है. समुद्र तट के पास होने के कारण यह इलाका पर्यावरण के लिहाज़ से भी संवेदनशील है और मछुआरा समुदायों का कहना है कि इससे 1,200 से ज्यादा परिवार प्रभावित हो सकते हैं. स्थानीय लोगों का दावा है कि यह ज़मीन मूल रूप से उनके समुदाय की थी और आदेश जारी होने से पहले किसी सरकारी अधिकारी या विधायक ने उनसे बात नहीं की.
मछुआरा समुदाय से जुड़ी एस. लक्ष्मी ने दप्रिंट से कहा, “इस इलाके को इस तरह बनाया गया है कि यह हमारे लिए रोजी-रोटी का साधन है और नए सचिवालय के लिए हमें यहां से हटाया भी जाएगा. इस बारे में हमसे बात नहीं की गई, जो गलत है.”
उन्होंने कहा कि आर्थिक मुआवजा समुद्र पर उनकी निर्भरता की जगह नहीं ले सकता.
स्थानीय लोगों को यह डर भी है कि सुरक्षा से जुड़े ज्यादा प्रतिबंध और बढ़ा हुआ ट्रैफिक समुद्र तट तक रोजाना पहुंच को मुश्किल कर देंगे. इससे स्थानीय मछली बाजार और उसके आसपास चलने वाली छोटी दुकानों और खाने-पीने की दुकानों को भी बंद करना पड़ सकता है.
तमिलनाडु मीनावर्गल मक्कल संगम (फिशरमैन पीपल्स यूनियन) के अध्यक्ष जे. कोसुमनी ने दिप्रिंट से कहा, “मछुआरा समुदाय पर इसका असर पड़ेगा, क्योंकि इलाके में सैंथोम रोड और लूप रोड दोनों पर पहले से ही काफी ट्रैफिक है. पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के अलावा, मछुआरा समुदाय के लोगों की रोजी-रोटी भी प्रभावित होगी. इलाके में मछली बाज़ार और छोटी खाने-पीने की दुकानें खुल गई हैं और नया सचिवालय बनने के बाद इन जगहों को बंद करना पड़ेगा. हम इस फैसले के खिलाफ हैं और नहीं चाहते कि यहां यह इमारत बने. आने वाले दिनों में हम इसके खिलाफ प्रदर्शन करेंगे.”
अलग-अलग पार्टियों के राजनीतिक नेताओं ने भी इन चिंताओं को उठाया है. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव वीरपांडियन ने प्रोजेक्ट को तुरंत रद्द करने की मांग की. उन्होंने कहा, “इस प्रोजेक्ट से मछुआरा समुदायों के रोजी-रोटी के अधिकार, तटीय पर्यावरण, जलवायु से निपटने की क्षमता, समुद्र तट तक आम लोगों की पहुंच और एक महत्वपूर्ण सरकारी प्रशासनिक संस्थान की सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ेगा.” उन्होंने सरकार से ज्यादा सुरक्षित और पर्यावरण के लिहाज से सही जगह चुनने की मांग की.
द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) की सांसद तमिलाची थंगापांडियन ने भी प्रोजेक्ट का विरोध किया और सरकार से इसे रद्द करने की मांग की.
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “घनी आबादी वाले इलाके में एक संकरी चार लेन की सड़क, आठ से ज्यादा स्कूल, हजारों घर और मछुआरा समुदायों की रोजी-रोटी का साधन होने के बावजूद 20 लाख वर्ग फुट में कई मंजिलों वाला सचिवालय बनाना जनहित के खिलाफ बेहद खराब योजना है. जिस इलाके में पहले से ही ट्रैफिक जाम की समस्या है, वहां अगर मंत्रियों, अधिकारियों और सुरक्षा कर्मियों की अतिरिक्त आवाजाही बढ़ेगी, तो छात्रों, आम लोगों और मछुआरा समुदायों को इसका असर क्यों झेलना चाहिए? तटीय इलाका मछुआरों की रोजी-रोटी है, यह सरकार के लिए निर्माण की जगह नहीं है.”
पट्टाली मक्कल काची (PMK) के नेता अंबुमणि रामदास और अम्मा मक्कल मुनेत्र कषगम के महासचिव टी.टी.वी. दिनाकरन उन शुरुआती राजनीतिक नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने इस जगह का विरोध किया था. तमिलनाडु के भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री के घर के पास इस जगह को चुनना राजनीतिक मकसद से किया गया फैसला लगता है. उन्होंने प्रस्तावित 1,200 करोड़ रुपये के खर्च पर भी सवाल उठाया और कहा कि दिल्ली में नई संसद की इमारत बनाने में करीब 900 करोड़ रुपये खर्च हुए थे.
ऐसा पहली बार नहीं है जब सचिवालय को दूसरी जगह ले जाने की योजना को लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा हो. 2003 की शुरुआत में तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयललिता की सचिवालय को फोर्ट सेंट जॉर्ज से मरीना बीच स्थित क्वीन मैरी कॉलेज परिसर में ले जाने की योजना के खिलाफ लोगों ने प्रदर्शन किया था. इस योजना में कॉलेज की ज्यादातर इमारतों को गिराना पड़ता. इसका काफी विरोध हुआ और आखिरकार योजना को रद्द कर दिया गया. अब स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि पट्टिनापक्कम की योजना को भी इसी तरह लोगों के विरोध का सामना करना पड़ सकता है.
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