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Friday, 19 July, 2024
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श्रीलंका पर बैठक में सरकार के राज्यों की ‘खराब वित्तीय स्थिति’ का मुद्दा उठाने पर विपक्षी MPs ने जताई आपत्ति

विपक्ष ने यह टिप्पणी श्रीलंका संकट पर चर्चा के लिए मंगलवार को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में विदेश मंत्री एस. जयशंकर और आर्थिक मामलों के सचिव अजय सेठ की प्रेजेंटेशन के दौरान की.

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नई दिल्ली: श्रीलंका संकट पर एक सर्वदलीय बैठक के दौरान कुछ भारतीय राज्यों की बढ़ती उधारी पर अपनी चिंताएं जाहिर करने के केंद्रीय वित्त मंत्रालय के फैसले का विपक्षी दलों शासित राज्यों के सांसदों ने कड़ा विरोध जताया. दिप्रिंट को मिली जानकारी में यह बात सामने आई है.

बैठक में शामिल पार्टियों—जिसमें अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके), द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) और तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) आदि शामिल थीं—ने चर्चा के दौरान केंद्र की तरफ से राज्यों की खराब वित्तीय स्थिति का संदर्भ दिए जाने पर आपत्ति जताई. बैठक में शामिल कई विपक्षी सांसदों ने दिप्रिंट को यह जानकारी दी. बैठक इस पर चर्चा के लिए बुलाई गई थी कि पिछले दशकों में अपने सबसे गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहे श्रीलंका के लिए भारत क्या कर रहा है.

सर्वदलीय बैठक में विदेश मंत्री एस. जयशंकर और आर्थिक मामलों के सचिव अजय सेठ ने द्वीप राष्ट्र में जारी उथल-पुथल और कर्ज की स्थिति पर राजनीतिक और विदेश नीति के नजरिये से एक प्रस्तुतिकरण दिया.

यह बैठक अन्नाद्रमुक और द्रमुक सहित दक्षिणी राज्यों के राजनीतिक दलों की तरफ से भारत के हस्तक्षेप की अपील के बाद बुलाई गई थी. इस ब्रीफिंग में 28 राजनीतिक दलों के नेताओं ने भाग लिया, और केंद्र सरकार की तरफ से आठ मंत्री मौजूद रहे.

सांसदों के मुताबिक, राज्यों के कर्ज का जिक्र तब आया जब सेठ अपने प्रेजेंटेशन के दौरान श्रीलंका के कर्ज पर चर्चा कर रहे थे.

बैठक में मौजूद रहे पश्चिम बंगाल के तृणमूल कांग्रेस सांसद सौगत रॉय ने दिप्रिंट से बातचीत में कहा, ‘श्रीलंका के भारी कर्ज का जिक्र करते हुए आर्थिक मामलों के सचिव ने कहा कि भारत में तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, केरल और पंजाब जैसे कुछ राज्यों में बढ़ी हुई उधारी के साथ इसी तरह की समस्या है. हमने इसका कड़ा विरोध किया. श्रीलंका संकट पर चर्चा करते समय राज्यों के वित्तीय बोझ का जिक्र करने का क्या मतलब है?’

केरल से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के राज्यसभा सांसद एलाराम करीम ने आरोप लगाया कि केंद्र जानबूझकर राज्यों को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है. उन्होंने कहा, ‘केंद्र श्रीलंका के संदर्भ में खुद अपनी वित्तीय समस्याओं का जिक्र करने के बजाये राज्यों के बढ़ते कर्ज के बोझ के बारे में क्यों बात कर रहा है? वे क्या साबित करने की कोशिश कर रहे हैं?’

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के नेता और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने दिप्रिंट से बाचतीत में कहा कि प्रेजेंटेशन जानबूझकर कुछ राज्यों को लक्षित कर रही थी.

उन्होंने जयशंकर के हवाले से यह भी कहा कि उन्होंने श्रीलंका और भारत के बीच ‘गलत जानकारी वाली तुलना’ देखी है. इस पर ओवैसी ने कहा कि उन्होंने कहा कि श्रीलंका इस स्थिति में है क्योंकि राजपक्षे सरकार ने डेटा को छिपाने की कोशिश की थी.

उन्होंने दिप्रिंट को बताया, ‘मैंने पूछा कि क्या मोदी सरकार भारत में नौकरी छूटने और बाल श्रम के प्रतिशत पर तुरंत डेटा जारी कर सकती है.’


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‘अत्यधिक दबाव वाले राज्य’

मार्च में विधानसभा चुनावों के बाद से कुछ राज्य सरकारों के वित्तीय दबाव में होने का मुद्दा प्रमुखता से उभरा था, खासकर मुफ्त सुविधाओं के वादे के कारण. उदाहरण के तौर पर पंजाब में सत्ता में आई आम आदमी पार्टी (आप) ने राज्य के हर घर को 300 यूनिट मुफ्त बिजली देने का वादा किया था.

15 से 17 जून के बीच धर्मशाला में राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ एक बैठक, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल थे, में केंद्रीय वित्त सचिव टी.वी. सोमनाथन ने राज्यों की वित्तीय स्थिति सुधारने में मदद के लिए कुछ सुझाव दिए थे, जिसमें ‘योजनाओं और स्वायत्त निकायों को तर्कसंगत बनाना और अक्षम सब्सिडी को घटाने के उपाय शामिल हैं.’

ये सुझाव भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की तरफ से पिछले माह एक विस्तृत अध्ययन जारी किए जाने के बाद सामने आए हैं, जिसमें बताया गया था कि कम से कम 10 राज्य अपने खुद के कर राजस्व में मंदी, प्रतिबद्ध व्यय के बढ़ते हिस्से और बढ़ते सब्सिडी बोझ का अनुभव कर रहे हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि इसने वित्तीय दबाव को और बढ़ा दिया है जो कोविड-19 के कारण पहले से ही गंभीर तनाव की स्थिति में है.

अध्ययन के मुताबिक, ‘अत्यधिक दबावग्रस्त’ राज्य बिहार, केरल, पंजाब, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, हरियाणा और उत्तर प्रदेश हैं. अध्ययन में कहा गया है कि इनमें से अधिकतर राज्यों ने 15वें वित्त आयोग द्वारा निर्धारित अपने कर्ज के स्तर को पार कर लिया है.


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‘अभूतपूर्व’ स्थिति ने भारत को ‘चिंता’ में डाला

एक दक्षिणी राज्य के तीसरे सांसद ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जयशंकर ने सांसदों से यह भी कहा कि भारत की तरफ से श्रीलंका को मानवीय सहायता मुहैया कराई जा रही है लेकिन वह किसी अन्य संप्रभु राष्ट्र के राजनीतिक मामलों में सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकता.

सांसद ने बताया, ‘उन्होंने कहा कि भारत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के बोर्ड में है और ऐसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के साथ काम करते हुए श्रीलंका का सहयोग करेगा. उन्होंने कहा कि भारत कूटनीतिक रास्ते से श्रीलंका की मदद करने की कोशिश करेगा.’

सांसद ने कहा कि जयशंकर ने श्रीलंका की स्थिति को ‘अभूतपूर्व’ बताया और कहा कि भारत इससे चिंतित है.

एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि उन्होंने यह भी पूछा था कि क्या भारत सरकार राजपक्षे को भारत आने से रोकेगी और यदि हां, तो क्यों—और क्या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (अजीत डोभाल) ने राजपक्षे को मालदीव और सिंगापुर की यात्रा की सुविधा प्रदान की थी.

ओवैसी ने बताया, ‘विदेश मंत्री ने इससे इनकार किया.’ साथ ही जोड़ा कि श्रीलंका द्वारा ‘स्थानीय’ स्तर पर अपने अल्पसंख्यकों की उपेक्षा एक ऐसा मुद्दा है जिसे भुलाया नहीं जाना चाहिए.

उन्होंने 2019 में कोलंबो में आत्मघाती हमलों का जिक्र करते हुए कहा, ‘मैंने भी मंत्रियों से कहा कि हमें श्रीलंका में आईएसआईएस की संलिप्तता वाले ईस्टर बम धमाके जैसी घटनाओं को भूलना नहीं चाहिए.’

उन्होंने कहा, ‘मुसलमान और तमिल नए शासन का हिस्सा नहीं हैं, और अगर इनमें से कोई भी हिंसा का रास्ता अपना लेता है तो तमिलनाडु के साथ उनके जातीय संबंधों में भी उबाल आ सकता है. इसी संदर्भ में मैंने यह भी पूछा कि क्या भारत श्रीलंका में समावेशी सरकार के लिए काम करेगा.’

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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