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Thursday, 18 July, 2024
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गांधी शांति पुरस्कार विवाद को दक्षिणपंथी प्रेस ने कहा, ‘गीता प्रेस के खिलाफ साजिश, बदनाम करने की कोशिश’

हिंदुत्व समर्थक मीडिया ने पिछले कुछ हफ्तों में विभिन्न खबरों और सामयिक मुद्दों को कैसे कवर किया और उन पर क्या संपादकीय रुख अपनाया, इसी पर दिप्रिंट का राउंड-अप.

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नई दिल्ली: गोरखपुर स्थित गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार देने के मोदी सरकार के फैसले की आलोचना को प्रकाशन गृह को “बदनाम करने का प्रयास” करार देते हुए, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के हिंदी मुखपत्र पांचजन्य ने दावा किया कि एक “निःस्वार्थ संस्था” के खिलाफ “साजिशें” रची जा रही हैं.

लेखक संतोष कुमार तिवारी ने अपने लेख में कहा, “इन सबके बावजूद गीता प्रेस रचना धर्म (सृजन का कर्तव्य पूरा करना) का पालन कर रहा है. पांचजन्य ने हमेशा गीता प्रेस के खिलाफ साजिशों का पर्दाफाश किया है.”

पिछले हफ्ते केंद्र सरकार ने घोषणा की कि वह “सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन” में योगदान के लिए हिंदू धार्मिक ग्रंथों के दुनिया के सबसे बड़े प्रकाशक प्रतिष्ठित गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार 2021 से सम्मानित कर रही है. कांग्रेस ने इस कदम को हास्यास्पद बताया, जिसके बाद से सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के बीच वाकयुद्ध शुरू हो गया.

इस सप्ताह हिंदू दक्षिणपंथी लेखकों और स्तंभकारों द्वारा कवर किए गए अन्य विषयों में गोफर्स्ट और स्पाइसजेट एयरलाइंस की वित्तीय समस्याएं, समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर कांग्रेस पार्टी का विरोध और हिमाचल प्रदेश का ऋण संकट शामिल थे.


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गांधी और गीता प्रेस

गीता प्रेस को पुरस्कार देने के केंद्र सरकार के फैसले पर सवाल उठाने वालों में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव जयराम रमेश भी शामिल थे. पार्टी के संचार प्रभारी रमेश ने गीता प्रेस पर वरिष्ठ पत्रकार अक्षय मुकुल की किताब का हवाला देते हुए कहा कि यह “महात्मा के साथ उतार-चढ़ाव वाले संबंधों और राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक एजेंडे पर उनके साथ चली लड़ाइयों का खुलासा किया है.”

पांचजन्य में अपने लेख में लेखक संतोष तिवारी ने इस तर्क को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि किताब एक “निराधार और झूठा” दावा करती है कि 30 जनवरी, 1948 को गांधी की हत्या के बाद, कल्याण पत्रिका के संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार और गीता प्रेस के संस्थापक जयदयाल गोयंदका को गिरफ्तार कर लिया गया था.

दरअसल, कल्याण गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित एक मासिक पत्रिका है.

उन्होंने कहा, “किताब में दूसरा झूठ यह है कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद कल्याण के अगले अंक में उन पर कोई श्रद्धांजलि प्रकाशित नहीं की गई थी. दोनों आरोप इतने गंभीर और असत्य हैं कि कोई भी लेखक पूरी तरह से तथ्यों का पता लगाए बिना किसी पुस्तक में इसका उल्लेख कैसे कर सकता है.” उन्होंने दावा किया कि कई “विद्वानों” ने इस विषय पर लिखा और शोध किया है और दावे को खारिज कर दिया है.

उन्होंने आगे कहा कि 1926 में जब कल्याण पहली बार शुरू हुई, तो गांधी ने फैसला सुनाया था कि इसमें कोई विज्ञापन प्रकाशित नहीं किया जाना चाहिए.

उन्होंने लिखा, “आज तक कल्याण इन शब्दों का पालन कर रहा है और इसमें कोई विज्ञापन प्रकाशित नहीं हुआ है. गांधी जी और कल्याण का रिश्ता बहुत गहरा था. गांधी जी कल्याण में लिखते थे.”


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बढ़ता हवाई किराया और विमानन संकट

आरएसएस से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक अश्विनी महाजन ने लिखा कि कैसे दो एयरलाइनों में संकट के कारण हवाई किराए बढ़ रहे हैं.

महाजन ने डेली पायनियर में प्रकाशित अपने लेख में कहा, दो एयरलाइनों — स्पाइसजेट और गोफर्स्ट — में वित्तीय संकट पूरे विमानन क्षेत्र में हलचल पैदा कर रहा है.

उन्होंने कहा, “अगर गोफर्स्ट और स्पाइसजेट दोनों दिवालिया हो जाते हैं, तो इंडिगो और टाटा समूह का विमानन क्षेत्र में एकाधिकार हो जाएगा.” उन्होंने आगे कहा, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने और परिणामस्वरूप हवाई किराए को स्थिर करने में मदद करने के लिए स्पाइसजेट और गोफर्स्ट दोनों को बचाना महत्वपूर्ण था.

महाजन ने लिखा, “यह समझना महत्वपूर्ण है कि ये कंपनियां वित्तीय अनियमितताओं के कारण नहीं बल्कि बहुराष्ट्रीय विमान और इंजन निर्माताओं की लापरवाही और कदाचार के कारण संकट में हैं. इन कंपनियों पर उच्चतम स्तर पर कार्रवाई की जानी चाहिए, न कि उन्हें हमारी कुशलतापूर्वक संचालित एयरलाइनों को बर्बाद करने की अनुमति देनी चाहिए. ऐसे में इस मामले में भारत सरकार का हस्तक्षेप और भी ज़रूरी हो जाता है.”


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यूसीसी और कांग्रेस का ‘पाखंड’

पूर्व बीजेपी सदस्य हृदय नारायण दीक्षित ने दैनिक जागरण में छपे अपने एक लेख में बताया कि कैसे कांग्रेस समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का विरोध करके अपने पूर्वजों से असहमत है.

यह तर्क देते हुए कि “सांप्रदायिक व्यक्तिगत कानून महिलाओं के अधिकारों और सशक्तिकरण में बाधा हैं”, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष दीक्षित ने कहा कि यूसीसी भारतीय राजनीतिक दलों के एक समूह, ब्रिटिश भारत में सभी दलों के सम्मेलन के एजेंडे में था. 1920 के दशक में भारत के लिए प्रभुत्व का दर्जा और भारतीय-शासित संघीय व्यवस्था पर जोर दे रहा था.

संदर्भ के लिए भारतीय नेताओं के इस समूह द्वारा प्रस्तुत संविधान का मसौदा वरिष्ठ कांग्रेस नेता मोतीलाल नेहरू के नाम पर ‘नेहरू रिपोर्ट’ के रूप में जाना गया. इसे 1928 में लखनऊ में एक बैठक में सम्मेलन द्वारा अपनाया गया था.

उन्होंने लिखा, “कांग्रेस के जन सम्मेलन में एक सर्वदलीय सम्मेलन में एक वैकल्पिक संविधान का मसौदा तैयार करने का काम सौंपा गया था.” “सम्मेलन में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया, जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू, अली इमाम, तेज बहादुर सप्रू और सुभाष चंद्र बोस सहित वरिष्ठ नेता शामिल थे. इसे ‘नेहरू समिति’ कहा गया.

उन्होंने आगे लिखा समिति ने 19 मौलिक अधिकारों की एक सूची तैयार की थी — उनमें से एक महिलाओं के लिए समान अधिकार था.

दीक्षित ने अपने लेख में लिखा, “राज्य को धर्म से मुक्त रखने की भी बात हुई थी. नेहरू रिपोर्ट के सभी भाग समान नागरिक संहिता से भी संबंधित हैं. (आज के) कांग्रेस नेता अपने वरिष्ठों की भावनाओं के खिलाफ जा रहे हैं.”


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जाति व्यवस्था और नस्लवाद

दैनिक भास्कर में अपने लेख में हिंदुत्व विचारक और भारतीय मूल के अमेरिकी राजीव मल्होत्रा ने पश्चिम में जाति के मुद्दों को नस्लवाद के साथ जोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति के बारे में चिंता व्यक्त की — उनके अनुसार यह एक “गंभीर गलती” है.

मल्होत्रा लिखते हैं, “आजकल पश्चिम में कॉर्पोरेट जगत में एक नया आंदोलन लोकप्रिय हो रहा है, जिसे ई.एस.जी. (पर्यावरण, सामाजिक और शासन) कहा जाता है. अब यह भारतीय कंपनियों द्वारा किया जाने वाला नवीनतम आयात भी बन गया है. इसका घोषित लक्ष्य अच्छा लगता है, लेकिन इसमें कई तरह से राजनीति शामिल है, क्योंकि इन तीन शब्दों की कई तरह से व्याख्या की जाती है.”

संदर्भ के लिए, ईएसजी, कॉर्पोरेट प्रशासन के संदर्भ में पर्यावरणीय मुद्दों और सामाजिक मुद्दों पर विचार करने के लिए एक व्यावसायिक ढांचा है. यह हितधारकों को यह समझने में मदद करता है कि कोई कंपनी पर्यावरण, सामाजिक और शासन मानदंडों से संबंधित जोखिमों और अवसरों का प्रबंधन कैसे कर रही है.

उनका दावा है कि ईएसजी के “एस” भाग में महत्वपूर्ण जाति सिद्धांत शामिल है, जो कहता है कि उच्च जाति के हिंदुओं ने पारंपरिक रूप से व्यवसाय, शिक्षा, राजनीति और न्याय के क्षेत्रों सहित भारतीय समाज की संरचनाओं के भीतर छिपे हुए विशेषाधिकारों का आनंद लिया है.

उनका दावा है कि इससे ऊंची जातियों पर यह साबित करने का बोझ पड़ता है कि वे दमनकारी नहीं हैं.

उन्होंने लिखा है, “ऐसी नीतियों से यह संभावना भी बढ़ जाती है कि कोई कर्मचारी प्रतिकूल निर्णयों के लिए अनावश्यक रूप से किसी की जाति को दोषी ठहरा सकता है. यह अब सरल है क्योंकि यह माना जाता है कि सिलिकॉन वैली में सवर्ण हिंदुओं को उत्पीड़न की संरचनाओं से लाभ हुआ है और उन्हें भी श्वेत लोगों की तरह अपने अपराध को स्वीकार करने की आवश्यकता है.”


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तीस्ता सीतलवाड़-कांग्रेस कनेक्शन पर आरएसएस

गुजरात हाई-कोर्ट द्वारा सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड की ज़मानत याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रखने के बाद, पांचजन्य ने एक संपादकीय में कहा कि उन्हें दिवंगत कांग्रेस नेता अहमद पटेल द्वारा एक टूल की तरह इस्तेमाल किया गया था.

2002 के गुजरात दंगों के पीड़ितों की वकील सीतलवाड़ को पिछले साल 25 जून को सबूत गढ़ने और गवाहों को सिखाने-पढ़ाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.

संपादकीय में कहा गया, “गुजरात सरकार ने हाई कोर्ट को बताया है कि तीस्ता सीतलवाड़ कांग्रेस नेता अहमद पटेल के लिए एक टूल की तरह काम कर रही थीं.” “ज़ाहिर तौर पर तीस्ता सीतलवाड़ एक एनजीओ (सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस) चलाती थीं, लेकिन इस कथित एनजीओ ने क्या किया? इसका उद्देश्य दुनिया भर में गुजरात सरकार को बदनाम करना, किसी भी तरह गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को दंगों की साजिश में फंसाना और व्यवहार में गोधरा कांड के अपराध और अपराधियों के लिए सुरक्षा की दीवार के रूप में काम करना था.”

इसने 2007 में उन्हें भारत के सबसे प्रतिष्ठित नागरिक पुरस्कारों में से एक – पद्म श्री – देने के लिए कांग्रेस पार्टी की आलोचना की. इसमें कहा गया, कांग्रेस ने उन्हें राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का सदस्य भी बनाया, “जिसकी पदवी कैबिनेट से भी ऊपर थी.”

संपादकीय में कहा गया है, “सवाल यह है कि इस देश के लिए बड़ा ख़तरा कौन है, कांग्रेस, कम्युनिस्ट और मुस्लिम लीग? तीनों एक-दूसरे के साथ एक जैसा व्यवहार कर रहे हैं, जिसे अंग्रेज़ी में ‘यूजफुल इडियट्स’ कहा जाता है — यानी वे मूर्ख जो अपने स्वार्थ के लिए अपने ही देश के साथ विश्वासघात करते हैं.”

‘मुफ्तखोरी की राजनीति हिमाचल को पड़ी महंगी?’

खबर है कि बढ़ती वित्तीय देनदारियों के बीच हिमाचल प्रदेश की सरकार ने 15,000 सरकारी कर्मचारियों के वेतन में देरी की है, जिससे ऑर्गनाइज़र को आश्चर्य हुआ कि क्या कांग्रेस सरकार की “मुफ्त की राजनीति” राज्य को “सबसे खराब वित्तीय संकट” की ओर धकेल रही है.

अपने विचार अंश में योगदानकर्ता महेंद्र ठाकुर ने लिखा, “यह आर्थिक संकट कितना गंभीर है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने राज्य की आर्थिक स्थिति के संबंध में ‘श्वेत पत्र’ लाने की बात कही है.”

इसमें कहा गया है कि सीएम ने कहा था कि हिमाचल पर वर्तमान में 76,000 रुपये से अधिक का कर्ज़ा है.

ठाकुर ने अपने लेख कहा, “हालांकि, सच्चाई तो यह है कि वर्तमान कांग्रेस सरकार को चुनाव संबंधी ‘मुफ्त सुविधाओं’ की घोषणाओं के साथ-साथ कर्मचारियों के वेतन, पेंशन और अन्य भत्तों को निगलना मुश्किल हो रहा है. विकास कार्य अभी भी ठंडे बस्ते में हैं. हिमाचल की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ है और इस परिस्थिति के कारण आर्थिक ओवरड्राफ्ट की स्थिति पैदा हो गई है.”

(संपादन: फाल्गुनी शर्मा)

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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