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Tuesday, 2 June, 2026
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राजनाथ से लेकर बृजभूषण तक, यूपी की राजनीति में उतरने को तैयार है BJP नेताओं की नई पीढ़ी

अगले साल होने वाले अहम विधानसभा चुनाव में BJP नेताओं के बेटे-बेटियों की छोटी-सी ‘राजनीतिक फौज’ मैदान में दिख सकती है. उन्हें जगह देना सत्तारूढ़ पार्टी के लिए नई चुनौती बन सकता है.

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लखनऊ: जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के वरिष्ठ नेताओं के बेटे-बेटियां राज्य भर में अपनी सार्वजनिक सक्रियता बढ़ा रहे हैं. इससे उनके चुनाव लड़ने की संभावनाओं को लेकर चर्चाएं तेज़ हो गई हैं.

लखनऊ से लेकर गाजीपुर और बरेली से अमेठी तक, नेताओं की नई पीढ़ी स्थानीय कार्यक्रमों में हिस्सा ले रही है, जनसंपर्क अभियान चला रही है और उन क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी मजबूत कर रही है, जो भविष्य में उनकी राजनीतिक शुरुआत का मंच बन सकते हैं. कुछ संगठन में पद चाहते हैं, जबकि कुछ को 2027 के विधानसभा चुनाव के संभावित उम्मीदवार के रूप में देखा जा रहा है.

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि यह मुद्दा अब काफी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि राज्य संगठन की नई सूची पिछले कुछ हफ्तों में घोषित होने की उम्मीद थी.

उनका कहना है कि सूची में देरी की एक वजह यह है कि पार्टी नेतृत्व इस बात को लेकर दुविधा में है कि किसे संगठन में जगह दी जाए और किसे चुनावी राजनीति के लिए तैयार किया जाए.

नीरज सिंह: राजनाथ सिंह के छोटे बेटे

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के छोटे बेटे नीरज सिंह पिछले कुछ समय से राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चा में हैं.

हालांकि, वह कई वर्षों से लखनऊ में सक्रिय हैं और अपने पिता की अनुपस्थिति में अक्सर सार्वजनिक कार्यक्रमों और पार्टी आयोजनों में उनका प्रतिनिधित्व करते रहे हैं, लेकिन अब चर्चा इस बात की हो रही है कि उन्हें उत्तर प्रदेश बीजेपी में कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है.

उनके करीबी लोगों का कहना है कि नीरज के लिए लखनऊ की एक विधानसभा सीट पर विचार किया गया है. साथ ही यह भी चर्चा है कि अगर उन्हें चुनाव नहीं लड़ाया गया, तो पार्टी संगठन में जगह दी जा सकती है.

यूनाइटेड किंगडम की University of Leeds से स्नातक नीरज सोशल मीडिया पर खुद को “समर्पित BJP कार्यकर्ता” बताते हैं.

उनकी एक्स प्रोफाइल में संगठन के लिए दो दशक से अधिक समय तक काम करने का भी जिक्र है. वह खुद को लखनऊ का जमीनी नेता दिखाना पसंद करते हैं और अपने एक्स हैंडल में भी इसका उल्लेख करते हैं.

लखनऊ में उन्हें राजनाथ सिंह तक पहुंचने के लिए “गो-टू पर्सन” माना जाता है.

उत्तर प्रदेश बीजेपी के एक पदाधिकारी ने बताया कि नीरज के लिए लखनऊ पूर्व विधानसभा सीट पर चर्चा चल रही है.

हालांकि, इस बात को लेकर अभी भी कुछ अनिश्चितता है कि क्या बीजेपी नेतृत्व एक ही परिवार के तीसरे सदस्य (राजनाथ सिंह और पंकज सिंह के बाद) को चुनावी राजनीति में हरी झंडी देगा या नहीं.

अभिनव सिन्हा: मनोज सिन्हा के बेटे

अभिनव सिन्हा, जो मनोज सिन्हा के बेटे हैं, एक बार फिर पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में चर्चा का विषय बने हुए हैं.

उनके चुनावी राजनीति में आने की अटकलें 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले भी लगी थीं, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. अब राज्य बीजेपी के पदाधिकारियों का कहना है कि अगर पार्टी उन्हें चुनाव लड़ाने का फैसला करती है, तो गाजीपुर सदर सीट एक संभावित विकल्प हो सकती है.

पेशे से टेक्नोक्रेट अभिनव ने सामाजिक और संगठनात्मक गतिविधियों के जरिए धीरे-धीरे अपनी सार्वजनिक पहचान बढ़ाई है. वह अक्सर जिला स्तरीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों, स्वच्छता अभियान और पार्टी कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं.

बीजेपी सूत्रों का कहना है कि गाजीपुर सदर उन सीटों में से एक है, जहां से अभिनव चुनावी शुरुआत कर सकते हैं. यह सीट फिलहाल समाजवादी पार्टी के जयकिशन साहू के पास है. वहीं, 2022 में बीजेपी उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने वाली संगीता बलवंत 2024 में राज्यसभा पहुंच गईं. ऐसे में बीजेपी इस सीट पर नए चेहरे तलाश रही है.

स्थानीय लोगों के सुख-दुख में शामिल होते हुए अभिनव की तस्वीरें नियमित रूप से सोशल मीडिया पर साझा की जाती हैं. उनकी एक वेबसाइट भी है, जिसमें उन्हें एक समर्पित कार्यकर्ता और युवा नेता बताया गया है. इसके अलावा वह अक्सर जिला स्तरीय पार्टी प्रशिक्षण कार्यक्रमों, स्वच्छता अभियान और जनसंपर्क गतिविधियों में दिखाई देते हैं.

करण महाना: यूपी विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना के बेटे

एक और चर्चित नाम करण महाना का है, जो उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना के बेटे हैं.

व्यवसायी और बीजेपी युवा मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य करण, अपने पिता की विधानसभा सीट महाराजपुर में लगातार सक्रिय होते जा रहे हैं. बीजेपी सूत्रों का कहना है कि सतीश महाना ने 2024 लोकसभा चुनाव लड़ने की संभावना पर विचार किया था. अगर ऐसा होता, तो उपचुनाव के जरिए उनके बेटे की चुनावी शुरुआत का रास्ता खुल सकता था. हालांकि, यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी.

अब सबकी नज़र विधानसभा चुनाव पर है, जहां पार्टी को यह तय करना होगा कि सीट पर करण को मौका दिया जाए या वरिष्ठ महाना को ही बनाए रखा जाए.

श्रुति गंगवार: संतोष गंगवार की बेटी

बरेली जिले में श्रुति गंगवार, जो झारखंड के राज्यपाल और वरिष्ठ बीजेपी नेता संतोष गंगवार की बेटी हैं, ने अपनी राजनीतिक सक्रियता काफी बढ़ा दी है.

2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी श्रुति को संभावित दावेदार माना जा रहा था, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला.

इस बार राजनीतिक जानकारों की नज़र बहेड़ी सीट पर है, जहां हालिया राजनीतिक परिस्थितियों के बाद बीजेपी एक नए कुर्मी चेहरे की तलाश में है. मुस्लिम और कुर्मी बहुल इस सीट से 2022 में छत्रपाल गंगवार ने विधानसभा चुनाव लड़ा था और अब वह बरेली से लोकसभा सांसद हैं. ऐसे में बीजेपी इस सीट के लिए नया कुर्मी चेहरा तलाश रही है.

रोहिलखंड क्षेत्र में संतोष गंगवार का प्रभाव अब भी काफी मजबूत माना जाता है. ऐसे में श्रुति की सार्वजनिक कार्यक्रमों और जनसंपर्क अभियानों में बढ़ती मौजूदगी ने उनके चुनाव लड़ने की संभावनाओं को लेकर चर्चाओं को और तेज़ कर दिया है.

उनकी सोशल मीडिया गतिविधियां भी दिखाती हैं कि वह लगातार लोगों के बीच सक्रिय हैं. पिता की अनुपस्थिति में वह अक्सर बरेली में उन कार्यक्रमों और आयोजनों में पहुंचती हैं, जहां संतोष गंगवार को आमंत्रित किया जाता है.

शालिनी सिंह: बृजभूषण की बेटी

शालिनी सिंह, जो पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह की बेटी हैं, नोएडा में एक प्रमुख राजनीतिक चेहरा बनकर उभरी हैं.

वकील, लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता शालिनी ने खुलकर चुनावी राजनीति में आने की इच्छा जताई है. वह नोएडा सिटीजन फोरम (NCF) की कार्यकारी अध्यक्ष हैं और अक्सर नागरिक समस्याओं को उठाती हैं तथा सरकारी अधिकारियों से संवाद करती हैं.

हाल ही में उनकी कविता संग्रह पुस्तक ‘बेबाक हूं, बेअदब नहीं’ प्रकाशित हुई है. यह उनकी अब तक की पांचवीं किताब है. पुस्तक के लॉन्च के बाद दिए गए पॉडकास्ट इंटरव्यू में उन्होंने चुनाव लड़ने और सक्रिय राजनीति में आने की इच्छा जाहिर की.

हालांकि उनका रास्ता आसान नहीं हो सकता, क्योंकि नोएडा सीट का प्रतिनिधित्व फिलहाल पंकज सिंह कर रहे हैं, जो राजनाथ सिंह के बड़े बेटे हैं.

इसके अलावा, शालिनी के एक भाई पहले से विधायक हैं और दूसरे सांसद हैं. ऐसे में पार्टी के कई नेता मानते हैं कि परिवार के एक और सदस्य को मौका देने का विरोध हो सकता है.

मयंक जोशी: रीता बहुगुणा के बेटे

मयंक जोशी, जो पूर्व उत्तर प्रदेश मंत्री रीता बहुगुणा जोशी के बेटे हैं, भी हाल के महीनों में राजनीतिक चर्चाओं में बने हुए हैं.

2022 विधानसभा चुनाव से पहले मयंक लखनऊ कैंट सीट से बीजेपी टिकट चाहते थे. टिकट न मिलने पर उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया, जबकि रीता बहुगुणा जोशी बीजेपी में ही बनी रहीं.

अब बताया जा रहा है कि वह अपने बेटे के लिए बीजेपी टिकट दिलाने की कोशिश कर रही हैं. हालांकि मयंक ने अभी तक औपचारिक रूप से समाजवादी पार्टी नहीं छोड़ी है. ऐसे में उनके सपा के टिकट पर चुनाव लड़ने की संभावना भी बनी हुई है.

सपा नेताओं का दावा है कि अखिलेश यादव के बहुगुणा परिवार से अच्छे संबंध हैं, इसलिए मयंक को वहां से टिकट मिलने की संभावना काफी अधिक है.

रीता बहुगुणा जोशी के करीबी सूत्रों का कहना है कि वह इस बार मौका गंवाना नहीं चाहतीं. उनके मुताबिक, मयंक उस पार्टी से चुनाव लड़ सकते हैं जो उन्हें टिकट दे.

2024 लोकसभा चुनाव में खुद रीता बहुगुणा जोशी को टिकट नहीं मिला था. सूत्रों का कहना है कि अब वह हर हाल में अपने बेटे को विधानसभा तक पहुंचाना चाहती हैं.

गौरतलब है कि रीता बहुगुणा जोशी ने 2017 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़कर बीजेपी जॉइन की थी.

आकांक्षा सिंह: संजय सिंह की बेटी

अमेठी में आकांक्षा सिंह, जो पूर्व सांसद संजय सिंह की बेटी हैं, राज्य की सबसे सक्रिय राजनीतिक उत्तराधिकारियों में से एक बनकर उभरी हैं.

पेशे से सुप्रीम कोर्ट की वकील आकांक्षा अपनी मां अमिता सिंह के साथ क्षेत्र के लोगों से लगातार मुलाकात कर रही हैं. परिवार का कहना है कि अमेठी का प्रतिनिधित्व कौन करेगा, इसका फैसला आखिरकार जनता करेगी.

सार्वजनिक बैठकों में अमीता सिंह ने माना है कि पिछले कुछ वर्षों में परिवार की राजनीतिक मौजूदगी कम हुई है. उन्होंने इसके लिए राजनीतिक परिस्थितियों को जिम्मेदार बताया.

संजय सिंह 2019 लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी में शामिल हुए थे और 2022 विधानसभा चुनाव में अमेठी से चुनाव हार गए थे. पार्टी सूत्रों का कहना है कि अब वह अपनी बेटी को चुनावी राजनीति में देखना चाहते हैं.

बीजेपी के सामने नई चुनौती

राजनीतिक परिवारों के उत्तराधिकारियों की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं ने बीजेपी नेतृत्व के सामने एक नाजुक स्थिति पैदा कर दी है.

एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने दिप्रिंट से कहा, “राज्य के कई वरिष्ठ नेता चाहते हैं कि उनके बेटे या बेटियां सक्रिय राजनीति में आएं. ज्यादातर लोग अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय हो चुके हैं और चुनाव से पहले राजनीतिक आधार बनाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन सभी को मौका देना संभव नहीं है.”

उन्होंने कहा कि सिर्फ पारिवारिक संबंधों के आधार पर टिकट देना पार्टी कार्यकर्ताओं को नाराज कर सकता है, जिन्होंने वर्षों तक बिना किसी राजनीतिक सहारे के काम किया है.

उन्होंने कहा, “नेतृत्व को संतुलन बनाना होगा. सभी को टिकट नहीं दिया जा सकता, लेकिन उन्हें नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है, क्योंकि उनमें से कई अपने क्षेत्रों में पहले ही अच्छी पहचान बना चुके हैं.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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