नई दिल्ली: भारत के किसी बड़े अस्पताल में ब्रेस्ट कैंसर का इलाज करा रही एक महिला की पैथोलॉजी रिपोर्ट एक डॉक्टर के पास हो सकती है, रेडियोलॉजी स्कैन किसी दूसरे डॉक्टर के पास, ब्लड मार्कर के नतीजे किसी अलग फाइल में और उसकी मेडिकल हिस्ट्री ऐसे ऑन्कोलॉजिस्ट (कैंसर विशेषज्ञ) के पास हो सकती है, जिसके पास भीड़भाड़ वाले ओपीडी में हर मरीज के लिए सिर्फ कुछ मिनट ही होते हैं. बहुत कम ऐसा होता है कि किसी एक डॉक्टर को एक ही नज़र में मरीज की पूरी जानकारी मिल जाए.
समस्या सिर्फ तेज़ी की नहीं, बल्कि सही और भरोसेमंद नतीजे तक पहुंचने की भी है. कैंसर की पहचान के लिए अक्सर कई विशेषज्ञों को अलग-अलग तरह के सबूतों और रिपोर्टों को समझना पड़ता है. कई बार उनकी राय में अंतर होने से इलाज शुरू करने का फैसला लेने में देरी हो जाती है. कैंसर जैसी बीमारी में, जहां सही समय पर और सही तरीके से पहचान होना बहुत जरूरी होता है, ऐसी देरी बड़ा फर्क पैदा कर सकती है.
इसी समस्या को दूर करने के लिए Centre for Development of Advanced Computing (सी-डैक), पुणे और All India Institute of Medical Sciences (एम्स), नई दिल्ली के शोधकर्ता iOncology.ai नाम का एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) प्लेटफॉर्म विकसित कर रहे हैं.
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) की फंडिंग से तैयार यह प्लेटफॉर्म फिलहाल परीक्षण और शोध के चरण में है. इसे भारत की सुपरकंप्यूटिंग व्यवस्था पर बनाया गया है और इसे भारतीय मरीजों के डेटा पर प्रशिक्षित किया जा रहा है.
फिलहाल यह ब्रेस्ट और ओवेरियन (अंडाशय) कैंसर पर केंद्रित है. ये दोनों भारतीय महिलाओं में होने वाले सबसे आम और सबसे घातक कैंसरों में शामिल हैं, जिनकी पहचान अक्सर बीमारी के काफी बढ़ जाने के बाद होती है.
यह प्लेटफॉर्म मरीज की सभी मेडिकल रिपोर्ट और रिकॉर्ड को एक AI आधारित डैशबोर्ड पर एक साथ लाता है, जिससे पैथोलॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट और ऑन्कोलॉजिस्ट एक ही समय पर एक जैसी जानकारी देख सकते हैं.
यह पैथोलॉजी रिपोर्ट, मेडिकल इमेजिंग डेटा, लैब टेस्ट के नतीजे और मरीज की मेडिकल हिस्ट्री को जोड़ता है. इसके बाद यह पूरे डेटा का विश्लेषण करके ऐसे पैटर्न पहचानता है, जो सामान्य तौर पर नज़रअंदाज़ हो सकते हैं. इसका उद्देश्य डॉक्टरों को तेजी से और ज्यादा भरोसे के साथ फैसला लेने में मदद करना है.
प्रोजेक्ट के प्रमुख शोधकर्ता और एम्स नई दिल्ली के बायोकैमिस्ट्री विभाग में अतिरिक्त प्रोफेसर अशोक शर्मा ने कहा, “कई बार ऐसा होता है कि दो पैथोलॉजिस्ट एक ही स्लाइड को देखते हैं और कैंसर की गंभीरता (ग्रेड) को लेकर उनकी राय अलग-अलग होती है.”
उन्होंने कहा, “जब सारी जानकारी इस सॉफ्टवेयर में डाली जाती है, तो यह कई विशेषज्ञों की राय को एक साथ जोड़ता है, मॉडल के जरिए उसका विश्लेषण करता है और फिर एक सुझाव देता है. हालांकि अंतिम फैसला हमेशा डॉक्टर ही लेते हैं.”
ब्रेस्ट कैंसर इस समय भारतीय महिलाओं में सबसे आम कैंसर है. देश में महिलाओं में होने वाले कुल कैंसर मामलों में इसकी हिस्सेदारी लगभग 27 प्रतिशत है. यह महिलाओं में कैंसर से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण बन चुका है और सर्वाइकल कैंसर को पीछे छोड़ चुका है.
वहीं, ओवेरियन कैंसर सबसे घातक कैंसरों में से एक माना जाता है क्योंकि इसकी पहचान अक्सर बहुत देर से होती है.
प्रोफेसर शर्मा ने कहा, “सर्वाइकल कैंसर के लिए अब प्रभावी वैक्सीन उपलब्ध हैं, लेकिन ब्रेस्ट और ओवेरियन कैंसर अभी भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं क्योंकि ये अक्सर बिना किसी स्पष्ट संकेत के विकसित होते हैं.”
उन्होंने कहा, “इनके लक्षण हल्के हो सकते हैं, स्पष्ट नहीं होते या आसानी से नजरअंदाज किए जा सकते हैं. खासकर ओवेरियन कैंसर की पहचान ज्यादातर मामलों में बीमारी के काफी बढ़ जाने के बाद होती है. तब तक यह बीमारी गंभीर रूप ले चुकी होती है. यही मुख्य वजह है कि हमने इस परियोजना के पहले चरण में ब्रेस्ट और ओवेरियन कैंसर पर ध्यान केंद्रित किया है.”
टूल का वर्क और भारतीय डेटा की ज़रूरत
अपने मूल रूप में iOncology.ai एक ऐसा एकीकृत क्लिनिकल डैशबोर्ड है, जहां मरीज की सारी जरूरी जानकारी एक ही जगह पर देखी जा सकती है.
एक पैथोलॉजिस्ट ट्यूमर के टिश्यू की तस्वीरें अपलोड कर सकता है, रेडियोलॉजिस्ट सीटी स्कैन, एमआरआई या मैमोग्राम की रिपोर्ट जोड़ सकता है और डॉक्टर लैब टेस्ट के नतीजे तथा मरीज की मेडिकल हिस्ट्री इसमें डाल सकता है. यह सारी जानकारी एक ही सिस्टम में रहती है और सभी विशेषज्ञ एक साथ इसे देख सकते हैं.
इसके बाद यह प्लेटफॉर्म पूरे डेटा का विश्लेषण करता है और ट्यूमर के ग्रेड, बीमारी के स्टेज और संभावित इलाज के विकल्पों के बारे में सुझाव देता है.
प्रोफेसर शर्मा ने कहा, “डैशबोर्ड में भूमिका के आधार पर एक्सेस दिया जाता है, ताकि हर विशेषज्ञ सिर्फ अपने काम से जुड़ी जानकारी देख सके. हालांकि इलाज कर रहे ऑन्कोलॉजिस्ट (कैंसर विशेषज्ञ) का अंतिम फैसला ही मान्य होता है.”
उन्होंने बताया कि यह टूल आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) से भी जुड़ा हुआ है. इससे मरीजों के रिकॉर्ड एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक आसानी से पहुंच सकते हैं और विभागों के बीच खोने की संभावना कम हो जाती है. आमतौर पर किसी मरीज को कैंसर की पुष्टि होने से पहले कई जिला अस्पतालों, राज्य स्तरीय रेफरल केंद्रों और बड़े अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ते हैं.
फौज़िया सिराज, जो भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के कैंसर पैथोलॉजी केंद्र में साइंटिस्ट-ई और पैथोलॉजी विभाग की प्रमुख हैं, ने कहा, “पारंपरिक चिकित्सा व्यवस्था में कैंसर की पूरी और पक्की पहचान होने में 7 से 10 दिन तक लग सकते हैं.”
सिराज इस प्लेटफॉर्म के लिए पैथोलॉजी स्लाइड्स को एनोटेट करने के काम से जुड़ी रही हैं. इसमें डिजिटल टिश्यू इमेज में कैंसर वाली और सामान्य कोशिकाओं को चिन्हित किया जाता है, ताकि एआई मॉडल उन्हें सही तरीके से पहचानना सीख सके.
उन्होंने कहा कि एआई की मदद से होने वाला विश्लेषण इस समय को काफी कम कर सकता है, खासकर उन मामलों में जहां बीमारी स्पष्ट नहीं होती और दूसरी राय या अतिरिक्त जांच की ज़रूरत पड़ती है.
लेकिन एआई मॉडल किस डेटा से सीखता है, यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि वह क्या काम करता है.
प्रोफेसर शर्मा ने बताया कि जब टीम ने शुरुआत में iOncology.ai को ओपन-सोर्स डेटा पर प्रशिक्षित किया, जो ज्यादातर पश्चिमी देशों की आबादी से लिया गया था, तब इसकी सटीकता करीब 49 प्रतिशत थी.
लेकिन जब मॉडल को एम्स नई दिल्ली के भारतीय मरीजों के लगभग 3,800 मामलों के डेटा पर दोबारा प्रशिक्षित किया गया, जिसमें पुराने और नए दोनों तरह के मामले शामिल थे, तब इसकी सटीकता बढ़कर लगभग 79 प्रतिशत हो गई.
शर्मा ने कहा, “भारतीय मरीजों का डेटा पश्चिमी देशों के डेटा से पूरी तरह अलग है. इसलिए हमारा अपना डेटा हमारे लिए ज्यादा उपयुक्त है.”
उन्होंने बताया कि यूरोप या उत्तरी अमेरिका के डेटा पर प्रशिक्षित एल्गोरिद्म भारतीय मरीजों पर हमेशा अच्छा प्रदर्शन नहीं करते, क्योंकि बीमारी के लक्षण, आनुवंशिक विशेषताएं और जनसंख्या से जुड़े पैटर्न काफी अलग हो सकते हैं.
उदाहरण के लिए, भारतीय ब्रेस्ट कैंसर मरीजों में ट्यूमर की बनावट, आकार और कोशिकाओं की विशेषताएं हमेशा उन पैटर्न जैसी नहीं होतीं, जो वैश्विक डेटा सेट में ज्यादा दिखाई देती हैं.
Lakshmi Panat, जो C-DAC के AI और क्वांटम टेक्नोलॉजी समूह की प्रोग्राम डायरेक्टर हैं, ने iOncology.ai को “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस” नहीं बल्कि “ऑगमेंटेड इंटेलिजेंस” का टूल बताया.
उन्होंने कहा, “हमने स्क्रीनिंग, निदान, इलाज और निगरानी के लिए अलग-अलग मॉडल तैयार किए हैं.” उन्होंने जोर देकर कहा कि यह प्लेटफॉर्म डॉक्टरों की जगह लेने के लिए नहीं, बल्कि उनकी मदद करने के लिए बनाया गया है.
उन्होंने कहा, “हमारे यहां मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा है, जबकि डॉक्टरों की संख्या उसके मुकाबले काफी कम है.”
यह प्लेटफॉर्म Param AIRAWAT (AI Research Analytics and Knowledge Dissemination Platform) सिस्टम पर चलता है, जो भारत का सबसे शक्तिशाली सुपरकंप्यूटर है. इसे C-DAC ने राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन के तहत विकसित किया है.
वह डेटा समस्या जिसका पूरा समाधान अभी तक नहीं मिला
भारत में कैंसर के इलाज में AI को लेकर होने वाली लगभग हर चर्चा के पीछे एक बड़ी समस्या छिपी है, जिसका समाधान अभी तक न तो सरकारी संस्थान और न ही निजी स्टार्टअप पूरी तरह कर पाए हैं. भारत में पर्याप्त मात्रा में व्यवस्थित, सही तरीके से चिन्हित (एनोटेटेड) और नैतिक रूप से जुटाया गया क्लिनिकल इमेजिंग डेटा उपलब्ध नहीं है.
भारत में मेडिकल रिकॉर्ड लंबे समय तक हाथ से लिखे जाते रहे हैं. वे अलग-अलग जगहों पर बिखरे हुए और बिना किसी एक समान मानक के रखे गए हैं.
डॉ. सिराज ने कहा कि 2017 के बाद से स्वास्थ्य रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण बढ़ा है और आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) भी व्यवस्थित स्वास्थ्य रिकॉर्ड तैयार करने में मदद कर रहा है. इसके बावजूद भारत में उच्च गुणवत्ता वाले और सही तरीके से चिन्हित मेडिकल इमेजिंग डेटा की कमी बनी हुई है. ऐसे डेटा के बिना AI मॉडल उतनी सटीकता हासिल नहीं कर सकते, जितनी अस्पतालों में इस्तेमाल के लिए ज़रूरी है.
निजी क्षेत्र भी इसी समस्या का सामना कर रहा है.
AI बेस्ड डायग्नोस्टिक स्टार्टअप Diagno+ के संस्थापक प्रणय अग्रवाल ने दिप्रिंट को बताया कि उन्होंने ब्रेन ट्यूमर के लिए वैश्विक ओपन-सोर्स डेटा पर 99 प्रतिशत सटीकता हासिल कर ली थी.
हालांकि, उन्होंने कहा कि यह डेटा JPEG फॉर्मेट में था, जिसे प्रोसेस करना क्लिनिकल एमआरआई मशीनों से मिलने वाली फाइलों की तुलना में कहीं आसान होता है. साथ ही, इसका भारतीय मरीजों पर परीक्षण नहीं हुआ था.
उन्होंने कहा, “मैं पिछले डेढ़ साल से इस पर काम कर रहा हूं, लेकिन अब भी नैतिक तरीके से डेटा जुटाने में संघर्ष कर रहा हूं.”
कई निजी स्टार्टअप एआई बेस्ड कैंसर जांच और मेडिकल इमेजिंग टूल्स पर काम कर रहे हैं. लेकिन इनमें से ज्यादातर अपने मॉडल को वैश्विक ओपन-सोर्स डेटा पर प्रशिक्षित करते हैं. यह डेटा जैसे प्लेटफॉर्मों से लिया जाता है, जैसे The Cancer Imaging Archive (TCIA), The Cancer Genome Atlas (TCGA) और अन्य अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक डेटा भंडार.
‘डिजिटल ट्विन’ और सटीक इलाज की ओर
iOncology.ai का मौजूदा संस्करण पैथोलॉजी, रेडियोलॉजी और मरीज की क्लिनिकल जानकारी को संभालता है. लेकिन शोधकर्ताओं का अगला लक्ष्य इससे कहीं अधिक बड़ा है.
अगले चरण में इसमें मल्टी-ओमिक्स (Multi-Omics) डेटा को जोड़ा जाएगा. इसमें जीनोमिक, एपिजीनोमिक और प्रोटिओमिक जानकारी शामिल होगी, जो पहले से मौजूद डेटा के साथ जोड़ी जाएगी.
सरल शब्दों में कहें तो यह प्लेटफॉर्म सिर्फ स्कैन या माइक्रोस्कोप में ट्यूमर कैसा दिखता है, यह देखने तक सीमित नहीं रहेगा. यह उस मरीज के कैंसर की पूरी जैविक और आनुवंशिक (जेनेटिक) तस्वीर को समझने की कोशिश करेगा.
डॉ. सिराज ने कहा, “जब जीनोमिक, एपिजीनोमिक और प्रोटिओमिक डेटा एक साथ जुड़ता है, तो इसे मल्टी-ओमिक्स दृष्टिकोण कहा जाता है. यही भविष्य है.”
टीम आगे चलकर जिस दिशा में काम कर रही है, उसे वे “डिजिटल ट्विन” कहते हैं. यह किसी मरीज का कंप्यूटर पर तैयार किया गया एक डिजिटल मॉडल होगा.
इसका विचार यह है कि किसी इलाज को चुनने से पहले डॉक्टर एक तरह का वर्चुअल परीक्षण कर सकेंगे. प्लेटफॉर्म मरीज की पूरी क्लिनिकल, आणविक (मॉलिक्यूलर) और आनुवंशिक जानकारी का विश्लेषण करेगा और हजारों समान मरीजों के नतीजों के आधार पर यह अनुमान लगाएगा कि वह मरीज किसी खास दवा या इलाज पर कैसी प्रतिक्रिया देगा.
प्रोफेसर शर्मा ने कहा, “इलाज शुरू करके उसके परिणाम का इंतजार करने के बजाय, पहले उसे वर्चुअल रूप में देखा जाएगा. कंप्यूटर के पास पहले से हजारों मरीजों का डेटा होगा. वह आपके मरीज की प्रोफाइल से उसका मिलान करेगा और बताएगा कि इस तरह के मरीज, इस तरह के कैंसर और इस इलाज में किसके जीवित रहने की संभावना अधिक रही और किसमें दुष्प्रभाव कम रहे.”
उन्होंने बताया कि यह सोच कैंसर-आधारित इलाज से आगे बढ़कर व्यक्ति-विशेष और उसकी जैविक स्थिति के अनुसार इलाज की ओर ले जाती है. अभी आम तौर पर एक ही तरह के कैंसर वाले मरीजों को लगभग एक जैसा इलाज दिया जाता है.
उन्होंने कहा, “इसे ही ऑन्कोलॉजिस्ट ‘प्रिसिजन मेडिसिन’ यानी सटीक और व्यक्ति-विशेष के अनुसार इलाज कहते हैं. दुनिया भर में कैंसर इलाज का क्षेत्र इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है.”
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