Sunday, 3 July, 2022
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भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सिपहसालार बिल पास कराने से लेकर चुनाव जीतने में करते हैं मदद

अमित शाह दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा को विश्वस्त सहयोगियों की अपनी टीम की मदद से संभालते हैं.

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नई दिल्ली: जब संसद के पिछले सत्र के अंतिम दिनों में अमित शाह अनुच्छेद 370 को निरस्त करने वाले ऐतिहासिक विधेयक का मसौदा तैयार कर रहे थे तो भाजपा पार्टी संगठन के सिर्फ तीन लोगों की इसकी जानकारी थी, जिनमें से एक थे शाह के निकट सहयोगी और भाजपा महासचिव भूपेंद्र यादव.

धर्मेंद्र प्रधान, अनिल जैन और केरल से आने वाले संसदीय मामलों के राज्यमंत्री वी मुरलीधरन के साथ अमित शाह की क्रैक टीम में शामिल थे, जिन्हें राज्यसभा में विधेयक को सुचारू रूप से पारित कराने की जिम्मेदारी दी गई थी. याद रहे कि राज्यसभा में सत्तारूढ़ एनडीए को बहुमत नहीं है. इसी टीम ने संसद के मानसून सत्र में तीन तलाक विधेयक को पारित कराने की जिम्मेदारी भी संभाली थी.

अमित शाह दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा को विश्वस्त सहयोगियों की अपनी टीम की मदद से संभालते हैं. आइए शाह की टीम के प्रमुख सदस्यों और उनकी भूमिका पर एक नज़र डालते हैं.

जे पी नड्डा

भाजपा के कार्याकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा | फोटो : विकीपीडिया कॉमन्स

दिसंबर में अमित शाह से भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा निश्चय ही शाह और प्रधानमंत्री मोदी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी हैं. मई में गृहमंत्री बनने के बाद शाह ने पार्टी संगठन के नियमित क्रियाकलापों की जिम्मेदारी नड्डा को सौंप दी थी. हालांकि, वो अब भी नड्डा से रोज बात कर पार्टी गतिविधियों पर नज़र रखते हैं.

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के दिनों में निकट संबंधों के कारण नड्डा शुरू से ही मोदी के पसंदीदा हैं. भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने इस बारे में बताया, ‘वह न सिर्फ प्रधानमंत्री के बल्कि आरएसएस के भी पसंदीदा हैं. वह संघ की जमात में राजनाथ सिंह के समान ही एक सर्वप्रिय नेता हैं.’

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2014 में उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 73 सीटों पर जीत दिलाने के बाद अमित शाह ने मोदी के आग्रह पर राजनाथ सिंह से भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारी हासिल की थी, वरना उस समय जेपी नड्डा ही अध्यक्ष पद के लिए आरएसएस की पसंद थे. पार्टी में नड्डा का उदय 2010 में ही शुरू हो गया था, जब तत्कालीन पार्टी प्रमुख नितिन गडकरी ने मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल से खटपट के बाद नड्डा को महासचिव के रूप में अपनी टीम में शामिल किया था. गडकरी के बाद वह राजनाथ सिंह की टीम में भी शामिल रहे और 2014 में मोदी ने उन्हें स्वास्थ्य मंत्री के रूप में अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया.


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भूपेंद्र यादव

Bhupendra Yadav
भाजपा नेता भूपेंद्र यादव | फोटो : फेसबुक

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘भूपेंद्र यादव अमित शाह के सबसे भरोसेमंद आदमी हैं. वह अमित शाह के आंख-कान हैं. अमित शाह अपनी योजना की रूपरेखा बनाते हैं और भूपेंद्र उसे शाह की अपेक्षानुरूप कार्यान्वित करते हैं.’

पार्टी में उनका असल उभार शाह के कार्यकाल में ही हुआ. राजनाथ सिंह के कार्यकाल में भूपेंद्र और अनिल जैन- पार्टी महासचिव और शाह के विश्वस्तों में से एक– राष्ट्रीय सचिव मात्र थे, जबकि राजीव प्रताप रूडी, वरुण गांधी और तापिर गाव अध्यक्ष के बाद दूसरे सर्वाधिक प्रभावशाली महासचिव के पद पर अमित शाह, अनंत कुमार, जेपी नड्डा और धर्मेंद्र प्रधान के साथ आसीन थे.

भाजपा अध्यक्ष का पद संभालने के बाद शाह ने पदाधिकारियों का सारा क्रम बदल डाला और भूपेंद्र को महासचिव नियुक्त कर दिया. वह अब उन तमाम राज्यों के प्रभारी हैं जहां कि शाह को लगता है कि विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है. वह 2013 में राजस्थान विधानसभा चुनाव के, 2014 में झारखंड, 2015 में बिहार, 2017 में गुजरात चुनाव के प्रभारी थे, और अब महाराष्ट्र में चुनाव के प्रभारी बनाए गए हैं.

नड्डा की नियुक्ति के समय ये बात भी उठी थी कि यदि नड्डा को पद नहीं मिला तो भूपेंद्र अगले अध्यक्ष बन सकते हैं.

बी एल संतोष

महासचिव (संगठन) बी एल संतोष भी पार्टी के भरोसेमंद लोगों में शुमार किए जाते हैं. रामलाल के बाद अमित शाह ने कम उम्र और अनुभव के बावजूद वी सतीश की जगह बीएल संतोष को चुना- उनसे अच्छे तालमेल तथा संगठन के कार्यों से निपटने में उनकी कुशाग्रता और दृढ़ता के कारण.

अनिल जैन

कभी दिल्ली के अपोलो अस्पताल में डॉक्टर रहे अनिल जैन का ग्राफ अमित शाह के समानांतर ही ऊपर उठा है. राजनाथ सिंह के कार्यकाल में वह भूपेंद्र यादव के साथ पार्टी में सचिव थे और गडकरी के कार्यकाल में तो उनके कुछ वर्ष गुमनामी में ही बीते. आडवाणी तब गडकरी की टीम में अनिल जैन को शामिल किए जाने के खिलाफ थे, पर शाह ने उन्हें महासचिव बना दिया और अब वे पार्टी में शाह की योजना को लागू करने वाले भरोसेमंद लोगों में से हैं.


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संसद में अनिल जैन, भूपेंद्र यादव और अनिल बलूनी हमेशा शाह के साथ होते हैं. अनिल जैन और भूपेंद्र यादव प्रमुख राज्यों की जिम्मेदारी संभालने के साथ-साथ राजनीतिक संकट से निपटने का काम भी करते हैं. जैन के पास छत्तीसगढ़ और हरियाणा की जिम्मेदारी है, साथ ही वह अन्य राज्यों में भी बड़े घटनाक्रमों को देखते हैं.

अरुण सिंह

पार्टी महासचिव और राजनाथ सिंह के रिश्तेदार अरुण सिंह भाजपा मुख्यालय के आधार स्तंभ हैं. हर तरह की व्यवस्थाएं करना उन्हीं की जिम्मेदारी है. वह पार्टी अध्यक्ष और अन्य नेताओं के कार्यक्रमों को संभालते हैं तथा चुनावों और रैलियों आदि से संबंधित इंतजामों को देखते हैं. शाह और नड्डा के संदेशों को राज्य इकाइयों तक पहुंचाने और उनसे तालमेल करने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की है. उन्हें 2018 में राज्यसभा नहीं भेजा गया लेकिन निकट भविष्य में ऐसा किए जाने की संभावना है.

अनिल बलूनी

भाजपा नेता अनिल बलूनी | फोटो : फेसबुक

कभी पत्रकार रहे अनिल बलूनी अब राज्यसभा सांसद और भाजपा के मीडिया प्रकोष्ठ के प्रभारी हैं. उन्हें शाह और मोदी दोनों का ही विश्वास प्राप्त है. मोदी से उनका संबंध उनके गुजरात के दिनों में ही बन गया था. तब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और सुंदर सिंह भंडारी जब गुजरात के राज्यपाल बन कर आए तो बलूनी उनके ओएसडी थे.

अपने गांधीनगर प्रवास के दौरान बलूनी ने मोदी के साथ मेलजोल बढ़ाना शुरू कर दिया और अगले कुछ वर्षों के भीतर वह मोदी के पसंदीदा लोगों में शामिल हो चुके थे. शाह के 2014 में अध्यक्ष बनने के बाद बलूनी को पार्टी प्रवक्ता और मीडिया प्रकोष्ठ का प्रमुख बनाया गया. बताते हैं कि तत्कालीन ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में तब किसी से पूछा था कि ये अनिल बलूनी कौन है? हालांकि, जल्दी ही उन्हें बलूनी की प्रधानमंत्री से तालमेल का अहसास हो गया.

बलूनी शाह के लिए कान का काम करते हैं. वह मीडिया संबंधी कार्यों को देखते हैं, शाह और मोदी के मीडिया संबंधी कार्यक्रमों का प्रबंधन करते हैं तथा दिन-प्रतिदिन के ख़बरों पर नज़र रखते हैं और ज़रूरत पड़ने पर हस्तक्षेप भी करते हैं. पार्टी की छवि के खिलाफ कोई बात जाने पर वह स्थिति संभालने के लिए पार्टी प्रवक्ताओं या वरिष्ठ मंत्रियों को काम पर लगाते हैं.


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भाजपा के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि सत्ता के गलियारे में बलूनी का प्रभाव उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुकाबले कहीं अधिक है.

हिमांशु देव

हिमांशु देव सारे संपर्क कार्यक्रमों और उम्मीदवारों के चयन के लिए किए जाने वाले सर्वेक्षणों के सूत्रधार हैं. 2014 में चुनाव प्रचार संभालने वाली पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (पैक), जिसने चाय पर चर्चा और 3डी प्रचार जैसी पहल की थी, से प्रशांत किशोर के बाहर निकलने के बाद वही अब इस कमेटी को संभालते हैं.

वह सीटों पर सर्वे करने, ज़मीनी स्तर पर फीडबैक जुटाने और जनता के मूड को समझने की कवायद करते हैं और संबंधित रिपोर्ट नियमित रूप से पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को सौंपते हैं.

दीपक पटेल – एसोसिएशन ऑफ बिलियन माइंड्स

गुजराती व्यवसायी दीपक पटेल ने मैकिंजी में सलाहकार रहे हिमांशु सिंह के साथ 100 से ज़्यादा आईआईटी इंजीनियरों और अन्य पेशेवर युवाओं की सहायता से अमित शाह की व्यक्तिगत चुनाव परामर्श इकाई एसोसिएशन ऑफ बिलियन माइंड्स (एबीएम) को आरंभ किया.

एबीएम ने ‘नेशन विद नमो’ और ‘मैं भी चौकीदार’ जैसे पार्टी के कई सफल अभियान चलाए हैं. इसके कार्यों में फेसबुक पेजों का प्रबंधन, किसी खास कंटेंट को वायरल करना और जनता के इरादों को जानने के लिए सर्वे करने के काम शामिल हैं. अमित शाह एबीएम की रिपोर्टों पर बहुत भरोसा करते हैं.

जब दिसंबर 2018 में भाजपा को तीन राज्यों में पराजय का सामना करना पड़ा तो एबीएम टीम को अलग से हार के कारणों का पता लगाने का काम सौंपा गया था. एबीएम को अपने सर्वे से पता चला कि किसानों की कर्जमाफी का कांग्रेस का वायदा प्रभावी रहा था और इसी आधार पर लोकसभा चुनावों से पहले मोदी ने 6000 रुपये की सालाना सहायता वाली किसान समृद्धि योजना की शुरुआत की थी.

अमित मालवीय

Amit Malviya
अमित मालवीय | फोटो : ट्विटर

अरविंद गुप्ता के बाद पार्टी के आईटी प्रकोष्ठ की जिम्मेदारी संभालने वाले अमित मालवीय पार्टी अध्यक्ष और अन्य बड़े नेताओं के सोशल मीडिया अकाउंट को देखते हैं. उनकी जिम्मेदारियों में पार्टी के प्रचार अभियानों को तैयार करने तथा सोशल मीडिया पर सक्रिय हज़ारों कार्यकर्ताओं और पैसे पर काम करने वाले पेशेवरों की सहायता से विरोधियों को बेअसर करने के काम शामिल हैं.

कैलाश विजयवर्गीय

कैलाश विजयवर्गीय | फोटो : सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

जब कैलाश विजयवर्गीय को 2015 में मध्यप्रदेश से दिल्ली लाया गया था, तो उस समय वह राज्य की शिवराज सिंह चौहान सरकार में दूसरे नंबर के नेता और पीडब्ल्यूडी मंत्री हुआ करते थे. उस समय कई भाजपा नेताओं ने शिवराज सिंह चौहान को खुलकर काम करने देने की वकालत की थी.


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कैलाश विजयवर्गीय को जब दिल्ली लाया गया तो शाह ने उनके लिए काम तय कर रखे थे. सबसे पहले उन्हें हरियाणा में कांग्रेस के गढ़ को ध्वस्त करने की जिम्मेदारी दी गई. जब उन्होंने शाह को हरियाणा जीत कर दे दिया, तब उन्हें पश्चिम बंगाल में तृणमूल के गढ़ को जीतने की जिम्मेदारी सौंपी गई. भाजपा के एक नेता के अनुसार, ‘कैलाश ने 2019 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में 18 सीटें जीतकर अपनी कुशलता साबित कर दी है और अब शाह उन पर आंख मूंदकर भरोसा करते हैं.’

वह शाह के इस कदर विश्वासपात्र हैं कि उनके बेटे आकाश विजयवर्गीय के खिलाफ प्रधानमंत्री मोदी के असंतोष जताने के बावजूद कोई आकाश के खिलाफ कार्रवाई करने को तैयार नहीं हुआ.

प्रधान, गोयल और शेखावत

A file photo of Dharmendra Pradhan
धर्मेंद्र प्रधान | फोटो : वीकीपीडिया कॉम्नस

पार्टी संगठन के नेताओं के अलावा शाह तीन मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को अक्सर संगठन के काम में झोंकते हैं. ये मंत्री हैं धर्मेंद्र प्रधान, पीयूष गोयल और हाल ही में मंत्रिमंडल में शामिल गजेंद्र सिंह शेखावत. प्रधान बिहार के पार्टी प्रभारी थे जहां 2014 में एनडीए को 40 में से 31 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. शाह को उनकी संगठन क्षमता पर भरोसा है और वह उनके नज़रिए को पसंद करते हैं.

एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि धर्मेंद्र प्रधान एक ऐसे व्यक्ति हैं जो राजनाथ, जेटली, और गडकरी को पसंद थे और अब शाह एवं मोदी के भी पसंदीदा हैं. वह हनुमान की तरह हैं और बिना श्रेय लिए अधिकतम काम करते हैं. ओडिशा के मामलों में उनकी राय अंतिम मानी जाती है. हाल ही में शाह ने उन्हें और गजेंद्र सिंह शेखावत को अनुच्छेद 370 पर राष्ट्रव्यापी अभियान की जिम्मेदारी सौंपी थी.


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अमित शाह की टीम में शेखावत देर से शामिल हुए, पर वह बड़ी तेज़ी से उभर रहे हैं. शाह ने पहले वसुंधरा राजे के असर को कम करने के लिए उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल करवाया और अब वह पार्टी अध्यक्ष की टीम का अहम हिस्सा बन चुके हैं.

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने अमित शाह की टीम के सदस्यों और उनके कार्यों को इन शब्दों में व्यक्त किया, ‘शाह रणनीति बनाते हैं और उनके विश्वस्त सहयोगी उन्हें कार्यान्वित करते हैं. पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाले अरुण सिंह जैसे नेता इन रणनीतियों को लागू करने के लिए सारे ज़रूरी इंतजाम करते हैं.’

दो महीने बाद जेपी नड्डा मौजूदा पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की जगह भाजपा की कमान संभालने वाले हैं. ये देखना दिलचस्प होगा कि वो शाह के सारे विश्वस्तों को अपनी टीम में जगह देते हैं या अपनी खुद की छाप छोड़ने की पहल करते हैं.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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