Thursday, 8 December, 2022
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UP उपचुनाव, मुर्मू, और अब धनखड़- ‘भाजपा को समर्थन’ के पीछे आखिर मायावती की मंशा क्या है

बसपा प्रमुख मायावती ने ऐसे कई फैसले लिए हैं जो समाजवादी पार्टी को कमजोर करने वाले और लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा का भरोसा हासिल करने की दोतरफा रणनीति अपनाने का संकेत देते हैं.

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नई दिल्ली: बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती ने बुधवार को जब भाजपा-नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जगदीप धनखड़ को अपनी पार्टी के समर्थन की घोषणा की, तो उनके इस कदम पर किसी को बहुत ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ.

पिछले दो महीनों में, यह तीसरा मौका है जब बसपा नेता ने भाजपा के प्रति अपना दोस्ताना रुख दिखाया है.

पहला उदाहरण, जून में यूपी के आजमगढ़ और रामपुर के लोकसभा उपचुनाव थे, जो दोनों सीटें समाजवादी पार्टी (सपा) की गढ़ थीं. माना जाता है कि बसपा ने रामपुर में चुनाव नहीं लड़कर (संभवत: दलित वोटों के विभाजन से बचने के लिए) इन सीटों पर भाजपा की जीत सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और आजमगढ़ में एक मुस्लिम उम्मीदवार को खड़ा किया, जाहिर तौर पर सपा के वोट काटने के लिए.

दूसरा उदाहरण, जब मायावती ने राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू का समर्थन किया. अपनी 25 जून की घोषणा में, मायावती ने दावा किया कि आदिवासी समुदाय—जिससे मुर्मू ताल्लुक रखती हैं—‘बसपा के आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा’ है. अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), और धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व के पार्टी के इरादे का एक संकेत.

3 अगस्त को मायावती ने इसी तरह की लाइन अपनाई जब उन्होंने ट्विटर पर घोषित किया कि बसपा व्यापक ‘जनहित और पार्टी के अपने आंदोलन’ के मद्देनजर धनखड़ को समर्थन देगी.’ उपराष्ट्रपति चुनाव 6 अगस्त को होने हैं.

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ऐसी अटकलों के बीच कि मायावती 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के साथ गठबंधन की कोशिश कर रही हैं, बसपा नेताओं ने पुरजोर तरीके से कहा है कि ऐसा कुछ नहीं है.

बसपा सांसद मलूक नागर ने दिप्रिंट से बातचीत में कहा कि उनकी पार्टी ने धनखड़ का समर्थन किया क्योंकि वह एक ‘पिछड़े’ वर्ग से आते हैं. (धनखड़ जाट समुदाय के हैं).

नागर ने कहा, ‘यह पिछड़े वर्गों, दलितों और आदिवासियों को समर्थन के बसपा आंदोलन का हिस्सा है. इसलिए हमने पहले राष्ट्रपति पद पर एक आदिवासी महिला को और फिर अब उपराष्ट्रपति के तौर पर एक ओबीसी को समर्थन दिया. वंचित समूहों का समर्थन करना हमारा सिद्धांत है और इसका भाजपा से कोई लेना-देना नहीं है. हमारा समर्थन ऐसे समुदायों के सशक्तिकरण और राष्ट्रीय हित में है.’

हालांकि, बसपा के एक अन्य नेता ने कहा कि अगले साल राजस्थान विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी की नजर जाट मतदाताओं पर है. बसपा ने राज्य में 2018 के चुनावों (190 प्रत्याशी उतारे) में छह सीटें जीती थी, हालांकि सभी विधायक बाद में कांग्रेस में चले गए.

इस बीच, राजनीतिक पर्यवेक्षक मान रहे हैं कि मायावती के इरादों से जाहिर है कि वह एक तीर से दो शिकार करने की कोशिश कर रही हैं: सपा को कमजोर करना और भाजपा का भरोसा हासिल करना.

लखनऊ स्थित बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी में भारतीय राजनीति के प्रोफेसर शशि कांत पांडे ने दिप्रिंट को बताया कि उनका मानना है कि मायावती की ‘पहली प्राथमिकता’ उत्तर प्रदेश में सपा से लड़ना है, जो रुख भाजपा को भी ‘सूट’ करता है.

पांडे ने कहा, ‘सपा उत्तर प्रदेश में दूसरी सबसे बड़ी ताकत है, और बसपा और भाजपा दोनों की दुश्मन है. 2022 के विधानसभा चुनावों में सपा को पश्चिमी और पूर्वी यूपी में गैर-यादव ओबीसी और दलित वोटों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मिला. राष्ट्रपति पद पर एक आदिवासी, और बतौर उपराष्ट्रपति एक जाट को अपना समर्थन देकर, और मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारकर मायावती इन समुदायों को 2024 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर एक संदेश भेज रही हैं.’

उन्होंने कहा, एक अन्य वजह यह भी हो सकती है कि वह भाजपा की गुड बुक में बनी रहना चाहती हों, जिस पर बार-बार विपक्षी नेताओं के खिलाफ केंद्रीय जांच एजेंसियों के इस्तेमाल का आरोप लगता रहा है.

पांडे ने कहा कि यह देखते हुए कि मायावती पहले ही अपने छोटे भाई आनंद कुमार और भतीजे आकाश आनंद को पार्टी के शीर्ष पदों पर नियुक्त करके ‘उत्तराधिकारी पर अपना रुख’ साफ कर चुकी हैं, वह ‘एजेंसियों का कोप भाजन बनने जोखिम नहीं उठाना चाहती’, खासकर ये देखते हुए कि भाजपा के विरोध का नतीजा क्या होगा, इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता.’

और भाजपा को भी उनके रुख से कोई शिकायत नहीं है.

भाजपा के एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर दिप्रिंट को बताया, ‘हम विपक्षी एकता तोड़कर उपराष्ट्रपति चुनाव में अधिक समर्थन पाने की कोशिश कर रहे हैं, जैसा हमने राष्ट्रपति चुनाव में भी किया था. जहां तक बसपा के समर्थन की बात है, तो यह भाजपा के लिए अच्छा ही है.’

उपराष्ट्रपति चुनाव में भाजपा के पास पहले से ही 395 वोट—लोकसभा और राज्यसभा सांसद मिलाकर—हैं, जो 388 के जीत के निशान से काफी आगे हैं.

बसपा के लोकसभा में 10 सदस्य हैं और राज्यसभा में एक सांसद हैं. यूपी और मध्य प्रदेश में इसके एक-एक विधायक हैं.


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2024 के मद्देनजर परस्पर फायदे?

माना जा रहा है कि मायावती की तरफ से भाजपा को स्पष्ट तौर पर ‘समर्थन’ देना कहीं न कहीं 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले सियासी समीकरण साधने की बसपा की रणनीति का हिस्सा हो सकता. खासकर यह देखते हुए कि बसपा पिछले कुछ सालों में लगातार चुनावी मैदान में अपना जनाधार खोती जा रही है.

यूपी में जून में हुए उपचुनावों में मायावती के फैसलों ने भाजपा की जीत आसान कर दी और एक तरह से बसपा की राजनीतिक प्रासंगिकता भी बढ़ी है. समाजवादी पार्टी नेता आजम खान का गढ़ माने जाने वाले रामपुर में बसपा ने कोई उम्मीदवार नहीं उतारा था, जिसके चलते सपा और भाजपा के बीच सीधी टक्कर हुई.

आजमगढ़ में, बसपा ने एक मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारा, जिसने सपा के मुस्लिम वोट को काटा और भाजपा उम्मीदवार को फायदा हुआ. भाजपा के दोनों विजयी उम्मीदवार ओबीसी समुदायों के थे.

पांडे ने कहा, ‘मायावती जानती हैं कि वह सिर्फ जाटव-दलित वोटों के सहारे चुनाव नहीं जीत सकतीं. दलितों में से अधिकांश गैर-जाटव भाजपा में चले गए हैं. विधानसभा चुनावों से पहले ब्राह्मणों तक पहुंच की उनकी रणनीति कारगर नहीं हो पाई, इसलिए उन्हें प्रासंगिक बने रहने के लिए अन्य जाति समूहों के साथ की जरूरत है.’

पांडे ने कहा कि लोकसभा चुनाव नजदीक आते जाने के साथ मायावती का लक्ष्य मुस्लिम वोटों को विभाजित कर सपा को कमजोर करना भी है.

ऊपर उद्धृत भाजपा नेता का मानना है कि बसपा ओबीसी और मुस्लिम वोटबैंक में सेंध लगाकर खासकर सपा का खेल बिगाड़ने वाली साबित हो सकती है.

उन्होंने कहा, ‘अगर हम 2024 के राजनीतिक अंकगणित को देखें, तो सपा के मुस्लिम और ओबीसी वोटों को विभाजित करने के लिए बसपा का प्रासंगिक रहना महत्वपूर्ण है. बसपा का जनाधार पूरे यूपी में है…यह चुनावों को त्रिकोणीय मुकाबला बना सकती है.’

हालांकि, मलूक नागर का कहना है कि बसपा की मंशा भाजपा को लुभाने की नहीं रही है, बल्कि उसका इरादा हाशिए के समुदायों को समर्थन देकर ‘पार्टी की रणनीति’ पर टिके रहने की है.

मायावती का ‘समर्थन’ कोई नई बात नहीं

पिछले कुछ सालों में, मायावती विभिन्न तरीकों से भाजपा का समर्थन करती दिखी हैं.

जुलाई 2019 में जब मोदी सरकार ने संसद में तीन तलाक विधेयक पेश किया, तो बसपा ने मतदान से किनारा कर लिया. अगस्त 2019 में, मायावती ने अनुच्छेद 370 को खत्म करने के केंद्र सरकार के फैसले का समर्थन किया.

इस साल के शुरू में यूपी विधानसभा चुनावों के दौरान, बसपा ने सपा के वोट काटने के प्रयास के रूप में 88 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था. बसपा इन सभी सीटों पर हार गई, लेकिन वह वोटों को विभाजित करने में सफल रही और इनमें से कई निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा ने जीत हासिल की.

मायावती का चुनाव अभियान भी मौन तरीके से चला था—उन्होंने केवल 18 सार्वजनिक रैलियों को संबोधित किया. उनके गैर-आक्रामक रुख और जाहिर तौर पर गैर-जाटव दलितों के उनसे अलग होने की वजह से उन्हें विधानसभा में सिर्फ एक सीट से संतोष करना पड़ा.

जी.बी. पंत सोशल इंस्टीट्यूट, इलाहाबाद में प्रोफेसर बद्री नारायण ने कहा, ‘बसपा के सिकुड़ते जनाधार ने वास्तव में भाजपा की मदद ही की है.’

उन्होंने कहा, ‘मोदी की कल्याणकारी योजनाओं से लाभान्वित दलित समूहों के बसपा का साथ छोड़ने की प्रमुख वजह यह भी रही कि जहां दलित मुद्दों पर मायावती में आक्रामकता की कमी नजर आई, वहीं भाजपा-आरएसएस के उन्हें लुभाने के लिए आक्रामक दृष्टिकोण अपनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.’

ऐसा लगता है कि बसपा के मैत्रीपूर्ण रवैये के बदले में भाजपा उसे कुछ फायदा भी दिला रहा है. उदाहरण के तौर पर, नवंबर 2020 के राज्यसभा चुनाव में भाजपा अपने सहयोगियों की मदद से यूपी में नौ सीटें जीत सकती थी, लेकिन उसने केवल आठ उम्मीदवार ही उतारे. नतीजतन, बसपा के रामजी गौतम एक सीट जीतने में सफल रहे.

वहीं, यूपी चुनावों के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ने एक इंटरव्यू के दौरान बसपा के प्रति उदार रुख दर्शाते हुए कहा कि, उनका मानना है कि पार्टी को ‘वोट मिलेगा’ चाहे ये सीटों में परिवर्तित हो या नहीं.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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