मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की फाइल फोटो. (Twitter/ @ChouhanShivraj)
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नई दिल्ली: मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव में मुख्य मुकाबला सत्ताधारी बीजेपी और विपक्षी कांग्रेस के बीच है. मध्य प्रदेश में भाजपा और शिवराज सिंह चौहान पिछले तीन विधानसभा चुनाव जीत कर सत्ता में काबिज रहे हैं. शिवराज ‘मामा’ चौथी बार सत्ता में आने के लिए चुनाव लड़े हैं.

राज्य में 28 नवंबर को एक चरण में वोट डाले गए थे और नतीजे छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना और मिज़ोरम के साथ 11 दिसंबर को आएंगे. मध्य प्रदेश विधानसभा की 230 सीटें हैं.

मध्य प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में इस बार लगभग तीन प्रतिशत अधिक मतदान दर्ज किया गया है जिसका चुनावी नतीजों पर क्या असर होगा, इसपर कयास लगाए जा रहे हैं. राज्य विधानसभा के 2013 के चुनाव में मतदान का प्रतिशत 72.13 रहा था.


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राज्य में इस बार 2899 उम्मीदार चुनाव मैदान में थे. इनमें से 1094 निर्दलीय उम्मीदवार हैं. राज्य में 5.04 करोड़ मतदाता हैं.

कांग्रेस ने हालांकि मुख्यामंत्री पद के लिए किसी उम्मीदवार का नाम घोषित नहीं किया था पर चुनाव प्रचार का मुख्य जिम्मा कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने संभाली. वहीं भाजपा का चेहरा शिवराज सिंह चौहान ही रहे.

इस बार चुनावों में मुख्य मुद्दे कृषि संकट

2013 के चुनावों में भाजपा को 230 में से 143 सीटें मिली थीं और कांग्रेस के खाते में 71 सीटें आई थीं. उनका वोट शेयर 38 प्रतिशत और 32 प्रतिशत रहा.

पर माना जा रहा है कि इस बार शिवराज चौहान के लिए सबसे कड़ी लड़ाई है और तीन बार से सत्ता में रहने के कारण वे एंटी इंकंबेन्सी भी झेल रहे हैं. स्वयं वे अब भी लोकप्रिय हैं और पार्टी के लिए उपयोगी हैं. लेकिन वोटर उदासीनता और विपक्ष का अच्छा कैंपेन दोनों उनके लिए मुश्किल बने हुए हैं. ये चुनाव उनकी मज़बूत नेता होने की छवि को और मज़बूत कर सकता है या बिगाड़ सकता है.


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मोदी शाह की जोड़ी के लिए भी हार, लोकसभा के पहले बहुत बड़ा झटका होगा. वहीं कांग्रेस भी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. अब नहीं तो कब. पार्टी का राज्य में वनवास लंबा खिंच गया है. मध्य प्रदेश की जीत पार्टी में नई जान फूंकेगी और उनकी हार मोदी नेतृत्व के अजेय होने को पुख्ता करेगी जो कि भाजपा को 2019 के आम चुनाव में मदद कर सकता है.

मुख्य कारक

इस बार मध्य प्रदेश में बदलाव की बहुत बातें होती रहीं. वोटर में मानो एक ही सरकार से ऊब का माहौल है. अब सवाल ये है कि क्या कांग्रेस इस मूड को भुना पाएगी. तो ये चुनाव शायद हर उम्मीदवार पर निर्भर करे. किसान और व्यापारी समुदाय में जीएसटी और नोटबंदी से शिकायत से भाजपा को जूझना पड़ेगा.

पर कांग्रेस बिना चेहरे के चुनाव लड़ रही है और कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने हालांकि एकजुटता दिखाई है और दिग्विजय सिंह चुनावों में उतने सक्रिय नहीं रहे, फिर भी कांग्रेस को ये सवाल झेलना पड़ा कि शिवराज बनाम कौन.

2013 में चार सीटें जीतने वाली बहुजन समाज पार्टी जो अकेले चुनाव लड़ रही है, या सपाक्स जो सरकारी कर्मचारियों के संगठन से राजनीतिक दल के रूप में उभरा है, की भी अहम भूमिका होगी. कुछ क्षेत्रों में बसपा चुनाव दर चुनाव अपना वोट प्रतिशत बचाए रख पाई है.


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