Wednesday, 1 February, 2023
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‘आक्रांता और संरक्षक’- उद्धव की राजनीतिक प्राथमिकताओं के बारे में क्या कहता है उनका भाषण

एकनाथ शिंदे से लेकर अमित शाह तक, सब पर हमला करते हुए शिवसेना प्रमुख ने ये दिखाने का प्रयास किया कि उन्होंने किस तरह मराठी ‘मानुष’ के साथ विश्वासघात किया. एक दूसरा विषय ये था कि मुंबई किस तरह ठाकरे परिवार के लिए महत्वपूर्ण है.

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मुंबई: मराठी वोटों को संगठित करना, गैर-मराठियों और मुसलमानों से अपील करना, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को आक्रांता और शिवसेना को संरक्षक के रूप में दिखाना और सेना की पुरानी आक्रामकता की एक उदार खुराक देकर पार्टी काडर में जांन फूंकना.

ये कुछ अलग-अलग बिंदु थे जिन्हें शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने, महानगर में बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के महत्वपूर्ण चुनावों की तैयारी में अपनी पार्टी के मुंबई ‘गट प्रमुखों’ (समूह प्रमुखों) के सामने, अपने पहले संबोधन में छूने की कोशिश की.

शिवसेना के दो फाड़ हो जाने के बाद, जिसमें एकनाथ शिंदे ने बागियों के एक गुट का नेतृत्व करते हुए बीजेपी के साथ हाथ मिलाकर महाराष्ट्र में एक नई सरकार बना ली थी, ठाकरे का अपने पार्टी काडर के सम्मुख पहला सार्वजनिक संबोधन था.

कथित रूप से अपने पिता बाल ठाकरे की विचारधारा को छोड़ देने की वजह से अकसर शिंदे गुट की आलोचना का निशाना बनने वाले उद्धव ने सुनिश्चित किया कि उनके भाषण में इसके पर्याप्त उल्लेख हों, कि उनकी पार्टी किस तरह शिवसेना संस्थापक से मिली सीख का पालन कर रही है.

बाल ठाकरे के अंदाज़ तक को अपनाते हुए उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों को अपमानजनक उप-नाम दे दिए- शिंदे के लिए ‘मिंधे गट’, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ब्रांड की राजनीति के लिए ‘शाह-नीति’. मराठी शब्द ‘मिंधा’ का मतलब ऐसा व्यक्ति होता है जो अहसानों से दबा हो, जिसमें परोक्ष आरोप था कि शिंदे गुट बीजेपी के नियंत्रण में है.

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उसी सांस में उद्धव ने बीजेपी पर निशाना साधा और उसे ‘कमला बाई’ बताते हुए कहा कि बाल ठाकरे इसी शब्द से इस पार्टी का उल्लेख किया करते थे. भाषण के बिंदुओं का सेना प्रमुख का चयन उनकी प्राथमिकताओं को दिखाता है, जब वो अपने गढ़ मुंबई को बचाने की तैयारी कर रहे हैं.


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मराठी वोटों को बचाना

मुंबई में शिवसेना का वोट बैंक मराठी आबादी रही है, जिसके साथ पार्टी ने प्रारंभ से ही बड़े एहतियात के साथ संबंध बढ़ाए, जब उसने उत्तर भारतीयों, दक्षिण भारतीयों और गुजरातियों की ‘बाहरी’ कहते हुए आलोचना की, जो महाराष्ट्र के लोगों की नौकरियां छीन लेते हैं.

पिछले दो दशकों में इस जनाधार पर बहुत से दावे रहे हैं. सबसे पहले राज ठाकरे की अगुवाई वाली महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (एमएनएस) ने सेंध लगाई और बाद में 2014 में सेना से अलग होने के बाद बीजेपी ने विकास के वादों के साथ मराठी आबादी को अपनी ओर झुकाने की कोशिश की.

अब, शिंदे गुट के रूप में एक नए दावेदार के साथ, भले वो मुंबई में अपेक्षाकृत कमज़ोर हो, उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना को अपने परंपरागत वोट बैंक पर अपनी पकड़ और कसनी होगी.

इसका ज़िक्र करते हुए उद्धव ने आरोप लगाया कि जनसंघ ने मुंबई के लिए संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन को तोड़ने की कोशिश की थी. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने काडर से कहा, ‘जनसंघ पहली पार्टी थी जिसने संयुक्त महाराष्ट्र कमेटी और मराठी ‘मानुष’ को तोड़ने की कोशिश की थी. ये (बीजेपी) उन्हीं की औलाद है. दुर्भाग्य से हम इनके साथ गठबंधन में शामिल हो गए और अपने राजनीतिक जीवन के 25 साल सड़ते रहे’.


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गैर-मराठियों से भावनात्मक अपील

शिवसेना, जो कभी मुंबई की मराठी आबादी का पर्याय मानी जाती थी और जिसने प्रवासी-विरोधी एजेंडा के साथ शुरुआत की थी, पिछले 25 साल से बीएमसी पर कब्जा किए हुए है. लेकिन मुंबई की जनसंख्या में महानगरीय मतदाताओं की संख्या में वृद्धि का असर, मुंबई में शिवसेना की राजनीति और चुनाव अभियानों में भी नज़र आता है.

2017 में, जब बीजेपी बीएमसी को उनकी पार्टी से छीनने के करीब थी और उनकी 84 सीटों से सिर्फ दो सीट पीछे थी, तो उद्धव ने परोक्ष रूप से गैर-मराठी मतदाताओं को दोष देकर, इसे एक भावनात्मक मुद्दा बना दिया था.

सेना के मुखपत्र सामना को दिए एक इंटरव्यू में उद्धव ने कहा कि गैर-मराठी मतदाताओं ने ‘इसका सम्मान नहीं किया कि 1992-93 के दंगों के दौरान, शिवसेना ने उनकी जानें बचाई थीं’. उन्होंने ये चेतावनी भी दी कि अगर ऐसी स्थिति फिर पैदा होती है, तो एक औसत शिवसैनिक उनके लिए फिर से अपनी जान जोखिम में नहीं डालेगा.

बुधवार को उद्धव ने वही भावनात्मक अपील की. उन्होंने कहा, ‘आज, गैर-मराठी आबादी भी हमारे साथ है. गुजराती, उत्तर प्रदेशी…हर कोई हमारे साथ है क्योंकि कोविड के दौरान सीएम के नाते मैंने बिना किसी भेदभाव के इन सब लोगों की जानें बचाई हैं’.


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बालासाहेब की शिवसेना और मुसलमान

बीजेपी और शिवसेना का शिंदे गुट उद्धव पर अपने हिंदुत्व रुख को ‘हल्का’ करने के लिए हमले बोल रहे हैं. बुधवार को शिंदे ने इस पर भी सवाल उठा दिया कि क्या ठाकरे की सेना ‘सेक्युलर’ बन गई है.

उद्धव इस बात पर ज़ोर दे रहे थे कि उनके अंतर्गत शिवसेना की कथित धर्मनिर्पेक्ष राजनीति, उससे बिल्कुल अलग नहीं है जो बाल ठाकरे का रुख हुआ करता था.

उन्होंने कहा, ‘1992-93 में जब गद्दारों ने हंगामा बरपा किया, तो मेरे शिवसैनिकों ने दरगाहों की भी चौकसी की थी. मेरे पिता और मेरे दादा की यही सीख है. शिवसेना प्रमुख (बाल ठाकरे) ने कभी नहीं कहा कि सभी मुसलमान गद्दार हैं. आज शिवसेना और उसका हिंदुत्व क्या है, ये वो लोग (मुसलमान) भी जानते हैं. इसलिए वो भी हमारे साथ हैं’.

2017 में, शिवसेना ने पांच मुसलमान उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे थे, जिनमें से दो विजयी रहे थे और मुस्लिम-बहुल सीटों पर उनका वोट शेयर बीजेपी की तुलना में कहीं बेहतर था.

मुंबई के मुस्लिम समुदाय के साथ शिवसेना का एक विवादित इतिहास रहा है. दिसंबर 1992-जनवरी 1993 के सांप्रदायिक दंगों की जांच के लिए बनाए गए श्रीकृष्णा पैनल ने, हिंसा भड़काने में शिवसेना की भूमिका की व्याख्या करते हुए, बाल ठाकरे को दोषी ठहराया था.

उद्धव ने आरोप लगाया कि ये बीजेपी और उसकी ‘शाह-नीति’ है, जो मराठियों और गैर-मराठियों तथा हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दरार पैदा करने की कोशिश कर रही है.


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आक्रांता बनाम संरक्षक

शिवसेना का एक पारंपरिक राजनीतिक दावा रहा है कि गुजराती कारोबारियों ने मुंबई से पैसा बनाया है.

बुधवार को, उद्धव ने उसी नैरेटिव को फिर से जगाने की कोशिश की लेकिन एक महीन अंदाज़ में, जब उन्होंने वेदांता-फॉक्सकॉन और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र जैसे बड़े निवेश, गुजरात ले जाने के लिए बीजेपी की आलोचना की, जिसने गुजरात को ‘आपका राज्य’ कहा.

उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि बीजेपी के लिए मुंबई बेचने के लिए बस ‘एक वर्ग फुट ज़मीन’ हो सकता है, लेकिन उनके लिए ये उनकी ‘मातृभूमि’ है. सेना प्रमुख ने बीजेपी को उन आक्रांताओं की तरह बताया, जो मराठा योद्धा राजा छत्रपति शिवाजी से लड़ रहे थे, जो एक ‘स्वराज्य’ स्थापित करना चाहते थे.

उद्धव ने कहा, ‘हम शिव सैनिक हैं जो छत्रपति शिवाजी महाराज का इतिहास पढ़कर बड़े हुए हैं. स्वराज्य की स्थापना करने के दौरान बहुत सारे विरोधी थे- आदिल शाही, निज़ाम शाही…’ उन्होंने आगे कहा, ‘और अब एक अमित शाह हैं’.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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