पश्चिम बंगाल में बीजेपी की एक रैली, प्रतीकात्मक तस्वीर | फोटो- ANI
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नई दिल्ली/कोलकाता: मूलत: बांग्लादेश से जुड़े एक अल्पसंख्यक दलित हिंदू समूह मतुआ बहुल इलाके वाली सीटों में भगवा पार्टी की तुलना में तृणमूल कांग्रेस का बेहतर प्रदर्शन बताता है कि नागरिकता (संशोधन) अधिनियम नियमों को लागू करने और उसे अधिसूचित करने में मोदी सरकार की देरी पश्चिम बंगाल के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को महंगी पड़ी है.

नॉर्थ 24 परगना और नादिया, जहां मतुआ फैक्टर निर्णायक या वर्चस्व वाला है, की 32 सीटों में से भाजपा ने 12 में जीत हासिल की है, जबकि 20 सीटें तृणमूल कांग्रेस के खाते में आई हैं.

हालांकि राजबंशी, जो कि अपेक्षाकृत छोटा समूह है और जिसमें आंशिक तौर पर बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थी शामिल हैं, भाजपा के साथ खड़ा रहा, जिसने उत्तर बंगाल में इस दलित समुदाय के प्रभाव वाली 11 सीटों में से नौ पर जीत हासिल की है.

इस बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि यह बंगाल के मूल निवासी और सीमा पार से आए दो समुदायों के बीच ‘प्रतिद्वंद्विता’ का नतीजा हो सकता है. दोनों गुट चाहते हैं कि सीएए जल्द लागू हो लेकिन इसके कारण अलग-अलग हैं.

जादवपुर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और राजबंशी आबादी और उनके राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ रूप कुमार बर्मन के मुताबिक, उत्तर बंगाल के राजबंशियों में एक मूल निवासी धड़ा और एक बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों का समूह शामिल है.

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उन्होंने आगे कहा, ‘राजबंशी और अन्य नामसूद्र समूह, जिनकी जलपाईगुड़ी, कूचबिहार और दार्जिलिंग जिलों में कम से कम 40 लाख की आबादी है, दो गुटों में बंटे हुए हैं. मूल निवासी समूह चाहता है कि सीएए और एनआरसी (नागरिकता का राष्ट्रीय रजिस्टर) के तहत शरणार्थी समूह की पहचान की जाए. वहीं शरणार्थी समूह नागरिकता के लिए सीएए चाहता है.’

उन्होंने कहा, ‘उनके बीच एक प्रतिद्वंद्विता है…इसलिए, पिछले छह-सात सालों से भाजपा के साथ खड़ी पूरी राजबंशी आबादी ने उन्हें एकजुट होकर वोट दिया.’

बर्मन ने आगे कहा कि इस बारे में गणना करना काफी जटिल है कि भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया है.

2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस एक स्पष्ट विजेता बनकर उभरी है, जिसके नतीजे गत रविवार को ही घोषित किए गए थे. भाजपा दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है.


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सीएए में देरी

मतुआ विभाजन के समय और उसके बाद के कुछ वर्षों में भारत आए थे. हालांकि, सटीक आंकड़े तो उपलब्ध नहीं हैं लेकिन अनुमानत: पश्चिम बंगाल की कुल आबादी में एक फीसदी मतुआ हैं. कम से कम छह संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में उनकी मौजूदगी खास मायने रखती है.

इस चुनाव में भाजपा ने गायघाटा, कृष्णानगर उत्तर, बोंगांव उत्तर, बोंगांव दक्षिण, राणाघाट जैसे क्षेत्रों में जीत हासिल की और नादिया और नॉर्थ 24 परगना के अलावा हाबड़ा, अशोकनगर, स्वरूपनगर और मध्यग्राम आदि जिलों में उसे हार का सामना करना पड़ा.

उन क्षेत्रों में जहां चुनाव नतीजों में मतुआ निर्णायक भूमिका निभाते हैं, सीएए को लागू किए जाने में देरी समुदाय में आक्रोश के तौर पर साफ नजर आती है, जिसे वे स्थायी नागरिकता संबंधी अपनी दशकों पुरानी मांग से जोड़कर देखते हैं.

सीएए के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे मुस्लिम बहुल देशों से 31 दिसंबर 2014 के पूर्व भारत आए छह अल्पसंख्यक समुदायों—हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई—के सदस्यों के लिए भारतीय नागरिकता को आसान बनाने का वादा किया गया है.

माना जाता है कि भाजपा की तरफ से सीएए मुद्दा उभारना ही 2019 के लोकसभा चुनावों में प्रमुख मतुआ परिवार के सदस्य सांतनु ठाकुर की जीत का कारण बना था.

2019 में भाजपा ने नादिया और नॉर्थ 24 परगना जिलों के 19 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की थी, जहां मतुआ निर्णायक भूमिका निभाते हैं. भाजपा ने 2019 में बंगाल में 18 सीटें जीती थी जबकि 2014 में उसके पास मात्र दो सीटें थीं.

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की सफलता में मतुआ समुदाय ने अहम भूमिका निभाई थी. उनके वोटों के कारण ही भाजपा को कई सीटें, खासकर कूच बिहार, उत्तरी मालदा, बर्धवान-दुर्गापुर आदि क्षेत्रों में, जीतने में मदद मिली थी.

सीएए को 9 दिसंबर 2019 को लोकसभा और 11 दिसंबर 2019 को राज्यसभा में पारित किया जा चुका है. यह 10 जनवरी 2020 से प्रभावी भी हुआ, लेकिन इस पर अमल संबंधी नियम अभी भी तैयार किए जा रहे हैं.

सीएए को लागू करने में देरी से मतुआ आबादी के गढ़ ठाकुरनगर और अन्य क्षेत्रों में नाराजगी काफी बढ़ी है.

‘एक बाध्यता’

बंगाल में अपनी चुनावी रैलियों के दौरान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सीएए में देरी के लिए कोविड महामारी को जिम्मेदार ठहराया और राज्य में पार्टी के सत्ता में आते ही इस पर अमल का वादा किया.

सीएए में देरी के लिए एक और वजह को भी जिम्मेदार माना जा सकता है क्योंकि असम, जहां भाजपा की फिर से जीत दांव पर लगी थी और उसने सफलता हासिल भी की, में कई मूल निवासी समुदाय इस कानून के खिलाफ हैं.

भाजपा के एक अन्य वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘इसने भाजपा के लिए एक बाध्यता की स्थिति ला दी और तय किया गया कि असम घोषणा पत्र में इसका जिक्र नहीं होगा जबकि भाजपा ने पश्चिम बंगाल में इस मुद्दे को उठाने में कसर नहीं छोड़ी.

शाह ने भाजपा के घोषणा पत्र का हिस्सा बनाने के अलावा इस मुद्दे को रैलियों में भी उठाया और इसे पहली कैबिनेट बैठक में ही पारित करने का वादा किया.

मार्च में बांग्लादेश की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने समुदाय के सदस्यों से मुलाकात की थी.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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