नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी के बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ने की तस्वीर दिल्ली में दिख रही है, लेकिन इसका असर पंजाब में ज्यादा होगा, क्योंकि यही एक राज्य है जहां पार्टी की सरकार है.
शुक्रवार को AAP छोड़कर बीजेपी में जाने वाले सात सांसदों में से चार पंजाब से हैं—हरभजन सिंह, विक्रमजीत सिंह साहनी, अशोक मित्तल और संदीप पाठक. अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव हैं, ऐसे में यह संकट बीजेपी के लिए फायदा बन सकता है.
राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर चंद्रचूड़ सिंह ने दिप्रिंट से बात करते हुए कहा, “पंजाब में इसके राजनीतिक असर काफ़ी अहम होंगे, क्योंकि राज्यसभा के जिन सांसदों ने पार्टी छोड़ी है, उनमें से ज़्यादातर इसी राज्य के हैं. भारतीय जनता पार्टी इस स्थिति का फ़ायदा उठाकर राज्य में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर सकती है.”
विशेषज्ञों का मानना है कि इन सांसदों के पार्टी छोड़ने से राष्ट्रीय राजधानी में भी इसका असर देखने को मिल सकता है—जहां आम आदमी पार्टी की मौजूदगी अभी भी है, लेकिन पार्टी की स्थिति और कमज़ोर होने पर दिल्ली नगर निगम (MCD) और यहां तक कि विधायकों के बीच से भी और ज़्यादा लोग पार्टी छोड़ सकते हैं. राघव चड्ढा और स्वाति मालीवाल—जो कभी अरविंद केजरीवाल के करीबी लोगों में शामिल थे—के पार्टी छोड़ने से, और भी लोगों के पार्टी छोड़ने की प्रक्रिया तेज़ हो सकती है.
प्रोफेसर चंद्रचूड़ सिंह ने आगे कहा, “हमें न केवल पंजाब में, बल्कि दिल्ली में भी दलबदल के और भी कई मामले देखने को मिलेंगे. MCD के और भी कई पार्षद, और विधानसभा के विधायक भी सत्ता के केंद्र—यानी BJP—के करीब जाने के लिए अपनी पार्टी छोड़ने के बारे में सोच सकते हैं.”
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि AAP के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो सकता है.
राजनीति विज्ञानी राहुल वर्मा ने दिप्रिंट को बताया: “दिल्ली के विपरीत, जहां पार्टी शासन के एक मॉडल का हवाला दे सकती है, पंजाब से ऐसा कोई तुलनीय सकारात्मक नैरेटिव सामने नहीं आ रहा है. पार्टी के प्रदर्शन को लगातार आलोचना का सामना करना पड़ा है, और आरोप लगाए जा रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल एक ‘सुपर CM’ की तरह काम कर रहे हैं, जबकि भगवंत मान को किनारे कर दिया गया है; इसके अलावा, गिनाने लायक कोई खास ठोस विकास भी नज़र नहीं आता.”
उन्होंने कहा, “अगर पंजाब भी हाथ से गया तो अगले चार साल बहुत मुश्किल होंगे. दिल्ली में वापसी हो सकती है, लेकिन वह 2030 में ही संभव है.”
AAP में नेताओं के जाने का सिलसिला नया नहीं है. 2015 से अब तक योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, आशुतोष और शाजिया इल्मी जैसे कई बड़े नेता पार्टी छोड़ चुके हैं.
दिप्रिंट से बात करते हुए शाज़िया इल्मी ने कहा, “मैं उन पहले लोगों में से थी जिन्होंने पार्टी छोड़ी थी. अरविंद केजरीवाल—जो अपनी सुविधा के हिसाब से चलने वाले इंसान हैं—ने एक बार कसम खाई थी कि यह कभी भी एक आम राजनीतिक पार्टी नहीं बनेगी, और हम सब एक बड़े मकसद का हिस्सा हैं. लेकिन उस समय किसी ने मेरी बात पर यकीन नहीं किया; बल्कि, मुझे ही बदनाम किया गया.”
“इस व्यवस्था के भीतर लोगों के साथ—खासकर महिलाओं के साथ—जिस तरह का बर्ताव किया जाता है, वह बेहद समस्याग्रस्त है. इसे लेकर गंभीर चिंताएं थीं. पार्टी का ढांचा स्वार्थी और जोड़-तोड़ करने वाला बन गया; केजरीवाल को जब लगता है कि किसी का काम निकल गया है, तो वे उसे किनारे लगा देते हैं,” उन्होंने आगे कहा.
AAP के पूर्व नेता आशुतोष ने भी दिप्रिंट से बात करते हुए इसी तरह के एक ट्रेंड की ओर इशारा किया. उन्होंने कहा, “AAP एक ‘वन-मैन पार्टी’ है, जिसका कोई असली ढांचा या संगठनात्मक व्यवस्था नहीं है. नाराज़ नेताओं और कार्यकर्ताओं की चिंताओं को दूर करने के लिए पार्टी में कोई व्यवस्था नहीं है. यह पार्टी पूरी तरह से अरविंद केजरीवाल के इर्द-गिर्द घूमती है. वह टीम बनाने वाले व्यक्ति नहीं हैं.”
उन्होंने कहा कि कमजोर संगठन और केजरीवाल का तानाशाही रवैया नेताओं के जाने की बड़ी वजह है.
पूर्व मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने कहा, “केजरीवाल बदले की भावना रखने वाले व्यक्ति हैं. उनके साथ लंबे समय तक काम करना मुश्किल है. वह दूसरों की बात नहीं सुनते. SC, ST, OBC और अल्पसंख्यकों को सही प्रतिनिधित्व नहीं मिलता.”
हालांकि AAP के नेता बाहर से मजबूत दिखने की कोशिश कर रहे हैं. राघव चड्ढा के जाने के बाद संजय सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्हें और बाकी नेताओं को “गद्दार” कहा.
उन्होंने कहा, “बीजेपी ने सरकारी ताकत का इस्तेमाल कर डर पैदा किया और ऑपरेशन लोटस चलाया. पंजाब के लोग इन गद्दारों को कभी नहीं भूलेंगे.”
AAP के सूत्रों ने कहा कि वे अभी भी “सकारात्मक” हैं. उनका मानना है कि यह समय पार्टी के लिए अच्छा भी हो सकता है, क्योंकि केजरीवाल को शराब नीति मामले में राहत मिल सकती है.
सूत्रों ने यह भी बताया कि हालांकि ये लोग पार्टी छोड़कर चले गए, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण था, लेकिन यह कोई चौंकाने वाली बात नहीं थी. उन्होंने दिप्रिंट को बताया, “हमारे पास ऐसे काफ़ी लोग हैं जिन्होंने पार्टी के लिए अपना खून-पसीना बहाया है; संभावित नेताओं की कोई कमी नहीं है.”
उन्होंने कहा, “मनीष सिसोदिया पंजाब में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, चीजें बदल रही हैं. हमें भरोसा है कि इसका ज्यादा असर नहीं होगा.”
हालांकि, पॉलिटिकल साइंटिस्ट राहुल वर्मा ने इतने सारे MPs के दल-बदल को “अभूतपूर्व” बताया.
उन्होंने कहा, “पार्टी को झटका लगा है. उन्हें चड्ढा के जाने की उम्मीद थी, लेकिन राज्यसभा के दो-तिहाई सांसदों के जाने की नहीं.”
अब AAP के पास राज्यसभा में सिर्फ तीन सांसद बचे हैं—एन. डी. गुप्ता, बलबीर सिचेवाल और संजय सिंह.
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