हैदराबाद: तेलंगाना में कांग्रेस सरकार ने उन जिलों में पार्टी दफ्तर बनाने के लिए सरकारी जमीन देने की मंजूरी दे दी है, जहां अभी पार्टी का अपना कार्यालय नहीं है.
सरकारी सूत्रों ने बताया कि यह फैसला सोमवार को राज्य सचिवालय में हुई कैबिनेट बैठक में सभी मंत्रियों से चर्चा के बाद लिया गया.
इस फैसले से सवाल उठ सकते हैं, क्योंकि यह पहले की भारत राष्ट्र समिति यानी बीआरएस सरकार द्वारा तय की गई राजनीतिक रूप से संवेदनशील नीति में बदलाव करता है और कर्नाटक की कांग्रेस सरकार से जुड़ी एक समान विवाद से तुलना की जा रही है.
मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी की अध्यक्षता में हुई तेलंगाना कैबिनेट बैठक में कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई. इनमें लार्सन एंड टुब्रो से मेट्रो रेल संचालन अपने हाथ में लेना और तेलंगाना के सभी सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों को दुर्घटना बीमा देना शामिल था.
सरकार द्वारा जारी एक नोटिस, जिसे दिप्रिंट ने देखा, में कहा गया है कि कांग्रेस को जमीन देने का फैसला पिछले सरकारों द्वारा जिलों में राजनीतिक दलों के दफ्तर बनाने के लिए बनाई गई नीतियों और दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है.
दिप्रिंट से बात करते हुए एमएलसी और कांग्रेस प्रवक्ता डॉ. वेंकट बालमूर ने इस फैसले का बचाव किया.
उन्होंने कहा, “सत्ता में रहने वाली हर पार्टी अपने दफ्तर बनाती है. बीआरएस की तरह हम सभी जिला मुख्यालयों में कीमती जमीन नहीं ले रहे हैं. हम सिर्फ उन जिलों में दफ्तर बनाएंगे जहां अभी हमारा कार्यालय नहीं है. साथ ही जमीन हमारे गांधी ट्रस्ट को दी जाएगी, जो पार्टी की सभी गतिविधियों को देखता है. इसलिए जमीन आवंटन में पूरी पारदर्शिता रहेगी.”
ध्यान देने वाली बात यह है कि मुख्य विपक्षी दल बीआरएस ने तेलंगाना सरकार के इस फैसले पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है और चुप्पी साध रखी है, क्योंकि उसने खुद 2018 में पार्टी दफ्तरों के लिए जमीन तय की थी.
जब दिप्रिंट ने पार्टी से प्रतिक्रिया मांगी तो उसके एक प्रमुख प्रवक्ता ने यह कहते हुए टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि वह हैदराबाद से बाहर हैं.
बीजेपी ने कैबिनेट के इस फैसले की आलोचना की है. विधानसभा में उसके फ्लोर लीडर और निर्मल के विधायक अल्लेटी महेश्वर रेड्डी ने दिप्रिंट से कहा कि “जब विधानसभा सत्र शुरू होगा तो हम भी अपने पार्टी दफ्तरों के लिए इसी तरह जमीन देने की मांग करेंगे.”
उन्होंने कहा, “जो शर्तें उन पर लागू होती हैं, वही बिना किसी भेदभाव के हम पर भी लागू होनी चाहिए. हालांकि, जब राजस्व विभाग जमीन आवंटन की घोषणा करेगा, तब हम इस मामले पर अंदरूनी चर्चा करेंगे.”
कांग्रेस दफ्तरों के लिए कितनी जमीन दी जाएगी, इसका फैसला अभी तेलंगाना के राजस्व विभाग को करना है. यह फैसला ऐसे समय आया है जब एक हफ्ते पहले कर्नाटक में कांग्रेस को नगरपालिका और स्थानीय निकायों के दफ्तर दिए जाने के आरोप लगे थे.
कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने राज्य भर में 100 कांग्रेस भवन बनाने का ऐलान किया है. वहीं कर्नाटक विधान परिषद में विपक्ष के नेता चलावड़ी नारायणस्वामी ने कांग्रेस पर नए पार्टी दफ्तर बनाने के लिए 31 जगह “गैरकानूनी” तरीके से हासिल करने का आरोप लगाया है.
2018 बीआरएस नीति
2018 में तत्कालीन बीआरएस सरकार, जिसकी अगुवाई मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव कर रहे थे, ने एक नीति को मंजूरी दी थी. इसके तहत हर जिला मुख्यालय में राजनीतिक दलों के दफ्तर के लिए एक एकड़ तक जमीन 100 रुपये प्रति वर्ग गज की नाममात्र दर पर देने का फैसला किया गया था. साथ ही सभी जिलों में बीआरएस के पार्टी दफ्तरों के लिए जमीन देने का निर्णय लिया गया था. कैबिनेट के इस फैसले में इन दफ्तरों को संपत्ति कर से छूट देने का प्रावधान भी शामिल था.
फिलहाल बीआरएस का मुख्यालय तेलंगाना भवन हैदराबाद के पॉश इलाके बंजारा हिल्स में स्थित है और पार्टी के पास शहर के कोकापेट में लगभग 11 एकड़ की कीमती जमीन है.
सरकारी जमीन पार्टी दफ्तरों के लिए देने के खिलाफ तेलंगाना हाई कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई थीं. 2024 में हाई कोर्ट ने नलगोंडा में बीआरएस कार्यालय के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था और कहा था कि इसे नगरपालिका की पूर्व अनुमति के बिना अवैध रूप से बनाया गया है. इस पर 1 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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