Monday, 24 January, 2022
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ई-रैली में भाजपा से बराबरी संभव नहीं, बिहार की विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग से पारंपरिक रैलियों की इज़ाजत मांगी

बिहार में ज्यादातर विपक्षी दलों के पास वर्चुअल रैलियों के लिए धन और लोगों, दोनों की ही कमी है. यदि पारंपरिक रैलियां प्रतिबंधित रहीं तो इसका मतलब होगा 'अमीर पार्टियों का फायदे में रहना'.

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पटना: बिहार में विपक्षी दल इस साल के अंत में होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार के दौरान पारंपरिक रैलियों को प्रतिबंधित करने के किसी भी कदम के खिलाफ हैं.

इसकी वजह है कोविड संकट के मद्देनज़र लोगों के साथ संवाद बढ़ाने का माध्यम बनीं भाजपा की वर्चुअल रैलियों को लेकर विपक्ष का संशकित होना, क्योंकि अधिकांश दलों के पास ऐसी रैलियों के लिए संसाधनों की कमी है. यदि पारंपरिक रैलियां प्रतिबंधित रहती हैं तो सीधा मतलब होगा कि अमीर राजनीतिक दल फायदे में रहेंगे.

सीपीएम स्टेट सेक्रेटैरिएट कमेटी के सदस्य सर्वोदय शर्मा का कहना है, ‘9 जून को (केंद्रीय गृह मंत्री) अमित शाह के लिए आयोजित वर्चुअल रैली पर करोड़ों रुपये खर्च हुए थे’.

कोविड संकट के बीच विधानसभा चुनावों के दौरान अपनाए जाने वाले सुरक्षा उपायों पर चर्चा को लेकर शुक्रवार को राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एच.आर. श्रीनिवास की अध्यक्षता में हुई सर्वदलीय बैठक के दौरान विपक्ष की बेचैनी स्पष्ट नजर आई.

‘रैली के दौरान सामाजिक दूरी सुनिश्चित करने को तैयार’

बैठक में राज्य के भाजपा प्रमुख संजय जायसवाल, जदयू के लल्लन सिंह, राजद के जगदानंद सिंह, कांग्रेस के बीपी मुनान और सीपीएम के सर्वोदय शर्मा व अन्य प्रतिनिधि मौजूद थे.

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चुनावों के लिए वर्चुअल रैलियों के आयोजन के मुद्दे पर भाजपा-जदयू गठबंधन और अन्य दलों के बीच स्पष्ट मतभेद नज़र आया.

यद्यिप गठबंधन के सहयोगियों ने वर्चुअल रैलियों पर जदयू का समर्थन किया लेकिन साथ ही कहा कि उम्मीदवारों को घर-घर जाकर प्रचार अभियान चलाने से रोका नहीं जाना चाहिए, वहीं विपक्षी दलों का स्पष्ट रुख था कि पारंपरिक रैलियों की अनुमति दी जानी चाहिए.


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शर्मा ने कहा, ‘हम रैलियों में सामाजिक दूरी के पालन के साथ मास्क और सैनेटाइजर का इस्तेमाल सुनिश्चित करने के लिए तैयार हैं’.

इस बीच, पूर्व भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने शनिवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा, ‘वर्चुअल कैंपेंन दरअसल वर्चुअल धोखेबाजी है’.

उन्होंने कहा, ‘वर्चुअल अभियान के माध्यम से कोई व्यक्ति 5,000 लोगों को संबोधित करता है और दावा करता है कि इसे एक करोड़ लोगों ने सुना है. मैं चुनाव आयोग से अपील करूंगा कि वह चुनाव प्रचार के पारंपरिक तरीकों पर प्रतिबंध न लगाए. वर्चुअल अभियान अव्याहारिक है और अमीर पार्टियों को फायदा पहुंचाने वाला है’.

भाजपा ने व्यापक स्तर पर अभियान शुरू किया

इस माह के शुरू में बिहार में शाह की वर्चुअल रैली के आयोजन की घोषणा ने विपक्षी दलों के बीच तूफान मचा दिया था.

राजद नेता तेजस्वी यादव ने कहा था कि महामारी के दौरान चुनाव प्रचार करना राजनीतिक कुठाराघात है और आरोप लगाया कि भाजपा ने रैली के लिए 100 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं.

लेकिन राज्य भाजपा अध्यक्ष संजय जायसवाल ने इस आंकड़े से इनकार करते हुए कहा कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी हो या फिर तेजस्वी यादव इनके जेब खर्च से भी कम पैसा खर्च हुआ था.

दिप्रिंट से बातचीत में उन्होंने सवाल उठाया, ‘इंटरनेट का इस्तेमाल करने पर आपको कितना खर्च करना पड़ता है?’

9 जून से भाजपा और जदयू दोनों ही लगातार वर्चुअल रैलियां कर रहे हैं. भाजपा जहां हर रोज जिलेवार रैलियां कर रही है, वहीं जदयू भी अपने नेताओं आरसीपी सिन्हा, संजय झा और लल्लन सिंह आदि के साथ 3-4 दिन के अंतराल पर रैलियां कर रही है.

भाजपा प्रवक्ता रजनी रंजन पटेल ने बताया कि आगे के चरण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की संयुक्त वर्चुअल रैलियों के आयोजन की भी संभावना है.


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विपक्षी दलों के लिए असमान लड़ाई

इसके ठीक उलट, विपक्षी राजद, कांग्रेस और वामपंथी दलों की तरफ से अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि वे वर्चुअल रैलियां करेंगे.

राजद के एक विधायक ने अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा, ‘बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए तेजस्वी यादव के भाषण की व्यवस्था करने के लिए हमारे पास संसाधन और यहां तक कार्यकर्ताओं की भी कमी है. यह एक असमान लड़ाई है’.

तेजस्वी ने हाल ही में विरोध जताने और लोगों से जुड़ने के लिए कुछ पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल किया जिसमें पटना के जलभराव वाले इलाकों में जाना, किसानों से मिलना और ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी के खिलाफ साइकिल मार्च निकालना शामिल है. उन्होंने अपने सरकारी आवास पर पार्टी कार्यकर्ताओं से मिलना भी शुरू कर दिया है.

लेकिन तेजस्वी की तरफ से अभी कोई वर्चुअल रैली नहीं की गई है और राजद कार्यकर्ताओं को लगता है कि अगर चुनाव आयोग ने पारंपरिक रैलियां प्रतिबंधित की तो पार्टी घाटे में रह सकती है.

भाजपा प्रवक्ता पटेल ने कहा, ‘कुछ अजीब कारणों से विपक्ष खासकर राजद नई तकनीक सीखने का अनिच्छुक रहा है. जब आईटी का आगाज हुआ तो लालूजी ने एक बयान दिया- ‘ये आईटी वाईटी क्या होता है’. जब ट्विटर आया तो उन्होंने मजाक उड़ाया कि एक चिड़िया चहक रही है. बाद में, पार्टी को खुद को आईटी और ट्विटर दोनों के अनुकूल बनाना पड़ा. यह उनकी परिपाटी है, पहले इसका मजाक बनाओ और बाद में अपना लो.

लोजपा, जो एनडीए का ही हिस्सा है, भी वर्चुअल रैलियों की परिकल्पना को लेकर असहज होने वाली पार्टी का एक और उदाहरण है.

लोजपा की तरफ से जारी एक बयान के मुताबिक, मुख्य निर्वाचन अधिकारी के साथ बैठक के दौरान पार्टी ने जानना चाहा कि चुनाव आयोग यह स्पष्ट करे कि वर्चुअल रैली पर आने वाली लागत के मसले से कैसे निपटा जाएगा.

हालांकि, कांग्रेस चुनाव प्रचार के लिए प्रौद्योगिकी को अपनाने की आवश्यकता से अवगत नजर आई.

कांग्रेस नेता बीपी मुनान ने कहा, ‘प्रचार के पारंपरिक तरीकों पर पूरी तरह पाबंदी नहीं लगाई जा सकती. आखिरकार, कोई उस आबादी तक कैसे पहुंचेगा जिसकी स्मार्टफोन या इंटरनेट तक पहुंच नहीं है? लेकिन साथ ही सरकार (बिहार) को सभी पार्टियों को ब्लॉक और जिला स्तरों पर अपने सांगठनिक ढांचे तक पहुंचने देना चाहिए जहां पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधाएं उपलब्ध हैं. टीवी और रेडियो के जरिये जनसंवाद के लिए संबोधनों की संख्या भी बढ़ाई जानी चाहिए’.


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मौजूदा समय में राजनीतिक दलों को चुनाव के दौरान तीन बार दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो के माध्यम से जनता को संबोधित करने की अनुमति है.

बैठक के दौरान सभी राजनीतिक दलों ने बिहार में मतदान केंद्रों की संख्या दोगुनी करने की वकालत की ताकि वहां मतदाताओं की संख्या 1,000 के बजाय 500 ही रहना सुनिश्चित हो सके. वहीं, मतदान के घंटे बढ़ाने का भी सुझाव दिया गया.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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